‘मैं ठाकुर हूं’ कहने का हक़ है , मगर बैंक काउंटर पर?
— HDFC कर्मचारी के बयान ने आत्मसम्मान और सार्वजनिक मर्यादा को आमने-सामने खड़ा किया

कानपुर के HDFC बैंक में विवाद के दौरान महिला कर्मचारी और ‘मैं ठाकुर हूं’ बयान से जुड़ा वायरल दृश्य

✍️दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट
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‘मैं ठाकुर हूं’</strong— यह वाक्य सिर्फ एक व्यक्ति की पहचान नहीं, बल्कि भारतीय समाज में सदियों से चली आ रही जातीय चेतना, सामाजिक वर्चस्व और सत्ता-बोध का प्रतिनिधि बन चुका है। हाल के दिनों में कानपुर सिटी के पनकी सेक्टर-2 स्थित HDFC Bank से जुड़ा एक वायरल वीडियो इसी वाक्य के कारण राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। वीडियो में बैंक की महिला कर्मचारी आस्था सिंह कथित रूप से एक महिला पर अभद्र भाषा का प्रयोग करती दिखती हैं और इसी क्रम में वह कहती हैं— “हां, मैं ठाकुर हूं, मुझे अपनी जाति पर गर्व है।” यह बयान न केवल सोशल मीडिया पर आग की तरह फैला, बल्कि उसने यह सवाल भी खड़ा कर दिया कि क्या सार्वजनिक सेवा में बैठा व्यक्ति अपनी जातीय पहचान का इस तरह प्रदर्शन कर सकता है?

समाचार सार: वायरल वीडियो के बाद आस्था सिंह ने सफाई देते हुए कहा कि बयान उकसावे की प्रतिक्रिया थी, न कि जातीय घमंड का प्रदर्शन। मगर सवाल यह है कि निजी अपमान और सार्वजनिक आचरण की सीमा कहां तय होती है?

वायरल वीडियो: क्या दिखा और क्यों भड़का आक्रोश

सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में आस्था सिंह कथित रूप से एक महिला पर गुस्से में चिल्लाती नजर आती हैं। वीडियो के कुछ अंशों में वह गाली-गलौज करती दिखती हैं और अपनी जातीय पहचान को एक तरह के जवाब या ढाल की तरह पेश करती हैं। यही वह बिंदु था, जिसने इस पूरे प्रकरण को एक साधारण बैंक विवाद से निकालकर सामाजिक विमर्श के केंद्र में ला दिया। लोगों ने सवाल उठाया कि क्या किसी निजी बैंक की कर्मचारी को अपने पद और जाति दोनों का इस तरह प्रयोग करने का अधिकार है?

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आस्था सिंह की सफाई: आत्मरक्षा या तर्कपूर्ण बचाव?

विवाद बढ़ने के बाद आस्था सिंह सामने आईं और उन्होंने पूरे घटनाक्रम को एकतरफा पेश किए जाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि यह वीडियो 6 जनवरी का है और किसी ग्राहक से नहीं, बल्कि बैंक की पूर्व महिला कर्मचारी के पति से जुड़ा हुआ है। आस्था के अनुसार, उस व्यक्ति ने उनके डेस्क पर आकर न केवल बदतमीजी की, बल्कि उनकी जाति पूछते हुए धमकी भरे शब्दों का प्रयोग किया— “तेरी सारी गर्मी निकाल दूंगा।” आस्था का कहना है कि ऐसे उकसावे के बाद उनका प्रतिक्रिया देना स्वाभाविक था।

गलत शब्द बनाम गलत परिस्थिति

आस्था सिंह ने यह भी स्वीकार किया कि उनके शब्द गलत थे और उन्हें सार्वजनिक सेवा में बैठे व्यक्ति के रूप में संयम बरतना चाहिए था। यह स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहीं से इस पूरे विवाद की असली परतें खुलती हैं। सवाल यह नहीं है कि आस्था सिंह ठाकुर हैं या नहीं, सवाल यह है कि क्या बैंक काउंटर किसी की जातीय पहचान के प्रदर्शन का मंच हो सकता है? निजी अपमान कितना भी गहरा क्यों न हो, क्या उसकी प्रतिक्रिया सार्वजनिक भाषा और आचरण को तोड़ने का लाइसेंस बन जाती है?

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जाति का सवाल: गर्व, पीड़ा और सत्ता का मनोविज्ञान

भारत में जाति केवल सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि शक्ति, स्मृति और संघर्ष का प्रतीक भी है। जब कोई कहता है “मुझे अपनी जाति पर गर्व है”, तो वह कथन अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन जब वही कथन सार्वजनिक संस्थान के भीतर, गुस्से और धमकी के स्वर में सामने आता है, तो वह गर्व से अधिक वर्चस्व का संकेत देने लगता है। यही कारण है कि यह वीडियो दलित-पिछड़े वर्गों के बीच असुरक्षा की भावना को भी हवा देता है।

बैंकिंग सेक्टर और व्यवहार की अपेक्षा

बैंक केवल लेन-देन की जगह नहीं होते, वे भरोसे और तटस्थता के प्रतीक होते हैं। ग्राहक यह अपेक्षा करता है कि काउंटर के उस पार बैठा व्यक्ति उसे उसकी जाति, वर्ग या पृष्ठभूमि के आधार पर नहीं, बल्कि एक नागरिक के रूप में देखेगा। ऐसे में किसी बैंक कर्मचारी का इस तरह की भाषा का प्रयोग करना संस्था की साख पर भी सवाल खड़े करता है।

पुलिस की चुप्पी और सिस्टम का इंतजार

फिलहाल पुलिस ने यह कहकर कार्रवाई से इनकार किया है कि किसी भी पक्ष की ओर से लिखित शिकायत नहीं दी गई है। यह स्थिति अपने आप में भारतीय व्यवस्था की एक परिचित तस्वीर पेश करती है— जब तक मामला औपचारिक शिकायत की चौखट तक नहीं पहुंचता, तब तक सिस्टम मूकदर्शक बना रहता है। लेकिन सोशल मीडिया की अदालत में फैसला पहले ही सुनाया जा चुका है।

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सोशल मीडिया ट्रायल: न्याय या भीड़ का दबाव?

इस प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल उठाया है कि क्या सोशल मीडिया न्याय का विकल्प बनता जा रहा है? वीडियो के कुछ सेकंड के आधार पर किसी व्यक्ति की पूरी छवि तय कर देना कितना उचित है? वहीं दूसरी ओर, यह भी सच है कि ऐसे वायरल वीडियो ही कई बार संस्थानों को जवाबदेह बनने पर मजबूर करते हैं।

हक़ सबका, मर्यादा भी सबकी

‘मैं ठाकुर हूं’ कहने का अधिकार आस्था सिंह को उतना ही है, जितना किसी और को अपनी पहचान पर गर्व करने का। लेकिन बैंक काउंटर पर बैठकर यह सवाल अप्रासंगिक हो जाता है कि आप कौन हैं— वहां केवल यह मायने रखता है कि आप कैसे पेश आते हैं। यह मामला किसी एक महिला कर्मचारी का नहीं, बल्कि उस पतली रेखा का है, जहां व्यक्तिगत अपमान और सार्वजनिक जिम्मेदारी आमने-सामने खड़ी हो जाती हैं।

Hook Point: सवाल यह नहीं कि आस्था सिंह क्या हैं, सवाल यह है कि क्या हम सार्वजनिक संस्थानों को अपनी निजी पहचान की लड़ाइयों का अखाड़ा बनने दे सकते हैं?

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