प्लान B पर सपा–कांग्रेस , फिर भी यूपी में भाजपा का नैरेटिव क्यों मजबूत?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा–कांग्रेस और भाजपा के बीच रणनीतिक टकराव दर्शाता कोलाज, योगी आदित्यनाथ और नरेंद्र मोदी बनाम विपक्ष

✍️दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट
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उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 से पहले हलचल तेज़ है। सपा-कांग्रेस के कथित प्लान B, भीतरखाने की रणनीतियों और जातीय गणित के बीच एक सवाल सबसे अहम है—क्या भाजपा का स्थापित नैरेटिव वाकई डगमगा रहा है, या विपक्ष की सारी कोशिशें उसी मज़बूत दीवार से टकरा रही हैं?

प्लान B पर सपा–कांग्रेस, फिर भी यूपी में भाजपा का नैरेटिव क्यों मजबूत? इस सवाल के इर्द-गिर्द इस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति घूमती नज़र आ रही है। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीतिक बिसात बिछाने में जुटे हैं। खास तौर पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर सामने आ रही खींचतान ने राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं को और तेज़ कर दिया है।

भाजपा के राजनीतिक इकोसिस्टम में इस खींचतान को महज़ स्वाभाविक असहमति नहीं, बल्कि एक प्रायोजित रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा के एक पूर्व विधायक ने दावा किया है कि यह सब भाजपा को हराने के लिए रचा गया एक बड़ा राजनीतिक षड्यंत्र है, जिसमें सपा और कांग्रेस की कथित अलग-अलग चालें अंततः एक ही लक्ष्य की ओर बढ़ती दिखती हैं।

‘मुद्दों का अभाव और वोट बैंक की रणनीति’

पूर्व भाजपा विधायक और वरिष्ठ नेता बृजेश मिश्र सौरभ का कहना है कि उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस के पास गठबंधन के रूप में भाजपा से लड़ने के लिए कोई ठोस मुद्दा शेष नहीं बचा है। उनके अनुसार, सपा-कांग्रेस की सारी उम्मीद इस बात पर टिकी है कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा के पक्ष में गोलबंद हिंदू मतों को किसी तरह विभाजित किया जाए।

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बृजेश मिश्र का दावा है कि इसी रणनीति के तहत सपा और कांग्रेस आपसी दुश्मनी का सार्वजनिक प्रदर्शन कर सकती हैं और अलग-अलग चुनाव लड़ने का संदेश दे सकती हैं। इसके पीछे की मंशा भाजपा और एनडीए प्रत्याशियों के खिलाफ सवर्ण, पिछड़े और दलित वर्ग से वैकल्पिक उम्मीदवार उतारकर वोटों का बिखराव करना है, ताकि प्रत्यक्ष रूप से सपा-कांग्रेस को नहीं, बल्कि परोक्ष रूप से भाजपा को नुकसान पहुंचे।

2029 की तैयारी और कांग्रेस की भूमिका

पूर्व विधायक का यह भी कहना है कि कांग्रेस विशेष रूप से सवर्ण चेहरों के सहारे भाजपा के पारंपरिक मतदाता आधार में सेंध लगाने की कोशिश कर सकती है। इस पूरी कवायद को 2029 के लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ राहुल गांधी के लिए ज़मीन तैयार करने की दीर्घकालिक योजना की चर्चा है।

बृजेश मिश्र सौरभ ने बिहार का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां राष्ट्रीय जनता दल के साथ कांग्रेस के गठबंधन से कोई विशेष लाभ नहीं मिला। यूपी में भी कांग्रेस का स्वतंत्र जनाधार सीमित है, ऐसे में विधानसभा चुनाव में वह सपा की मददगार भूमिका में दिख सकती है, ताकि भाजपा को किसी भी सूरत में रोका जा सके।

सपा का पलटवार: ‘अफवाह और भ्रम की राजनीति’

हालांकि, इन तमाम दावों को समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता फ़खरुल हसन चांद ने सिरे से खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि इस तरह की चर्चाएं केवल भ्रम फैलाने के लिए की जा रही हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि 2027 में सपा और कांग्रेस एक साथ चुनाव लड़ेंगी और सीटों का बंटवारा दोनों दलों का शीर्ष नेतृत्व मिलकर तय करेगा।

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फ़खरुल हसन चांद के अनुसार, जिसे जो सीट मिलेगी, वह उसी सीट से चुनाव लड़ेगा और अलग-अलग चुनाव लड़ने की कोई योजना नहीं है। उनके मुताबिक, भाजपा की ओर से इस तरह के नैरेटिव गढ़े जा रहे हैं ताकि विपक्ष की एकजुटता पर सवाल खड़े किए जा सकें।

भाजपा खेमे की चिंता और ‘प्लान B’ की चर्चा

हाल की कुछ घटनाओं के बाद भाजपा के भीतर यह चर्चा तेज़ हो गई है कि सपा-कांग्रेस हिंदू मतों में विभाजन की कोशिशों में पूरी ताकत झोंक रही हैं। भाजपा के रणनीतिकार मानते हैं कि विपक्ष का असली लक्ष्य 2027 में जातीय समीकरणों को किसी भी तरह ध्वस्त करना है।

भाजपाई हलकों में यह भी माना जा रहा है कि सपा और कांग्रेस का अलग-अलग चुनाव लड़ना, दरअसल गठबंधन के औपचारिक स्वरूप से बाहर रहते हुए भाजपा विरोधी वोटों को साधने का प्लान B हो सकता है। हालांकि, यह भी स्वीकार किया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में मौजूदा राजनीतिक संतुलन को तोड़ना आसान नहीं है।

अविमुक्तेश्वरानंद विवाद और प्रायोजित नैरेटिव

चुनाव से पहले हिंदुत्व से जुड़े मुद्दों को हवा दिए जाने को भी इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। बनारस में मणिकर्णिका, अविमुक्तेश्वरानंद विवाद और कथित ब्राह्मण नाराजगी को विपक्षी दलों की रणनीतिक योजना का हिस्सा बताया जा रहा है।

इस पूरे प्रकरण में कांग्रेस ने अजय राय और अविनाश पांडे के नेतृत्व में खुलकर मोर्चा संभाला, जबकि समाजवादी पार्टी भी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में खड़ी दिखाई दी। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह सब उस बड़े नैरेटिव का हिस्सा है, जिसके जरिए भाजपा के हिंदुत्व आधारित राजनीतिक आधार को चुनौती देने की कोशिश की जा रही है।

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‘तुष्टीकरण बनाम एकजुटता’ का विमर्श

बृजेश मिश्र सौरभ का कहना है कि तुष्टीकरण की राजनीति के चलते हिंदू समाज आज भी भाजपा के पक्ष में एकजुट है। उनके अनुसार, सपा-कांग्रेस की तमाम कोशिशों का असली निशाना यही एकजुटता है, लेकिन योगी आदित्यनाथ की सरकार के दौरान ऐसा कोई दूसरा बड़ा मुद्दा खड़ा नहीं हो सका, जिसके दम पर विपक्ष चुनाव जीतने का सपना देख सके।

नाराजगी के छोटे दायरे और सीमित असर

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रमेश तिवारी का मानना है कि कुछ इलाकों में सवर्ण और पिछड़े वर्गों के छोटे-छोटे समूह भाजपा से नाराज ज़रूर दिखे हैं। विपक्ष स्वाभाविक रूप से इसका फायदा उठाने की कोशिश करेगा, लेकिन इससे व्यापक राजनीतिक बदलाव की उम्मीद कम है।

उनके अनुसार, उत्तर प्रदेश की राजनीति का मूल नैरेटिव 2014 में ही तय हो गया था। 2024 के लोकसभा चुनाव में ‘संविधान खतरे में है’ जैसे मुद्दों से यह नैरेटिव कुछ हद तक कमजोर ज़रूर पड़ा, लेकिन अब उसका असर लगभग समाप्त हो चुका है। यही वजह है कि तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद भाजपा का नैरेटिव अभी भी मजबूत बना हुआ है।

प्लान B पर सपा–कांग्रेस, फिर भी यूपी में भाजपा का नैरेटिव क्यों मजबूत? 2027 चुनाव से पहले रणनीति, जातीय समीकरण और हिंदुत्व राजनीति का विश्लेषण


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