
नाम में ‘तवायफ’—यह शब्द उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक गांव के लिए केवल एक नाम नहीं, बल्कि दशकों से ढोई जा रही सामाजिक पीड़ा का प्रतीक बन चुका है। अंग्रेज़ी हुकूमत के दौर में पड़ा यह नाम आज़ादी के 75 साल बाद भी गांव वालों के जीवन से चिपका हुआ है। गांव का नाम है रूपवार तवायफ, और इसी नाम की वजह से यहां के लोग रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अपमान, संकोच और सामाजिक असहजता झेलने को मजबूर हैं।
एक ऐसा गांव, जहां पहचान बताना भी लोगों को शर्मिंदा करता है, और शादी-ब्याह से लेकर रोज़गार तक—नाम ही सबसे बड़ी रुकावट बन गया है।
बलिया के सिकंदरपुर तहसील में बसा है ‘रूपवार तवायफ’
रूपवार तवायफ गांव बलिया जिले की सिकंदरपुर तहसील में स्थित है और यह खड़सरा ग्राम पंचायत के अंतर्गत आता है। जिला मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर दूर बसे इस गांव की आबादी करीब एक हजार के आसपास है। भौगोलिक रूप से यह गांव सामान्य ग्रामीण इलाकों जैसा ही है, लेकिन नाम ने इसे असामान्य पीड़ा का केंद्र बना दिया है।
नाम ने बना दी सामाजिक दीवार
ग्रामीणों का कहना है कि जब भी वे किसी सरकारी दफ्तर, शैक्षणिक संस्थान या बाहरी जगहों पर जाते हैं और उनसे गांव का नाम पूछा जाता है, तो उन्हें झिझक महसूस होती है। कई बार मज़ाक उड़ाया जाता है, तो कई बार सीधे-सीधे अपमानजनक टिप्पणियां सुननी पड़ती हैं। सबसे गंभीर असर गांव के युवाओं और बेटियों के भविष्य पर पड़ा है। शादी-ब्याह के मामलों में जैसे ही गांव का नाम सामने आता है, रिश्ते टूट जाते हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, यह केवल भावनात्मक समस्या नहीं है, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ा सवाल है। एक ऐसा नाम, जो किसी ऐतिहासिक गलती का नतीजा है, आज की पीढ़ी को क्यों ढोना पड़े—यही सवाल गांववाले लगातार उठा रहे हैं।
अंग्रेज़ों की दी हुई पहचान, आज़ाद भारत की विरासत?
बताया जाता है कि गांव का यह नाम अंग्रेज़ी शासनकाल के दौरान राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किया गया था। उस दौर में स्थानीय सामाजिक-सांस्कृतिक संवेदनाओं की कोई परवाह नहीं की जाती थी। देश आज़ाद हो गया, शासन बदले, लेकिन गांव का नाम जस का तस रह गया। ग्रामीणों का कहना है कि यह विडंबना ही है कि आज़ाद भारत में भी उन्हें औपनिवेशिक मानसिकता की एक पहचान ढोनी पड़ रही है।
‘देवपुर’ रखने की मांग, वर्षों से जारी संघर्ष
गांववालों की मांग है कि रूपवार तवायफ का नाम बदलकर देवपुर किया जाए। इस मांग को लेकर ग्रामीण पिछले लगभग एक दशक से लगातार प्रशासनिक और संवैधानिक स्तर पर प्रयास कर रहे हैं। गांव के लोगों ने जिला प्रशासन, राज्य सरकार ही नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक को पत्र भेजे हैं।
कब-कब लिखी गई चिट्ठियां?
हाल ही में 18 मार्च 2025 को गांववालों ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर नाम परिवर्तन की अपील की थी। इससे पहले 25 मई 2023, 30 नवंबर 2023 और 3 फरवरी 2024 को भी राज्यपाल और प्रधानमंत्री को पत्र भेजे गए। वर्ष 2026 में ग्रामीणों ने बलिया के जिलाधिकारी और सिकंदरपुर के एसडीएम को भी औपचारिक प्रार्थना-पत्र सौंपा, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं हो सका है।
प्रधान प्रतिनिधि का दर्द
खड़सरा ग्राम पंचायत के प्रधान प्रतिनिधि पीयूष गुप्ता का कहना है कि गांव के लोग पिछले करीब दस वर्षों से नाम बदलने की मांग कर रहे हैं। इस संबंध में उन्होंने तत्कालीन मंत्री रामगोविंद चौधरी से भी मुलाकात की थी, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ। उनका कहना है कि जब प्रदेश में कई स्थानों के नाम बदले जा चुके हैं, तो उनके गांव के साथ भेदभाव क्यों?
पीयूष गुप्ता बताते हैं कि ‘तवायफ’ शब्द केवल बोलचाल तक सीमित नहीं है, बल्कि भू-राजस्व अभिलेखों में भी यही नाम दर्ज है। यही वजह है कि प्रशासनिक स्तर पर भी गांव को बार-बार वही पहचान झेलनी पड़ती है।
पहले बदले जा चुके हैं नाम
प्रधान प्रतिनिधि ने उदाहरण देते हुए बताया कि उनकी ही ग्राम पंचायत में एक गांव का नाम पहले ‘पूरा’ था। जब तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल वोरा खड़सरा आए और उन्हें इस विषय में अवगत कराया गया, तो उस गांव का नाम बदलकर ‘सैय्यदपूरा’ कर दिया गया। ग्रामीणों का कहना है कि इसी तर्ज पर रूपवार तवायफ से भी आपत्तिजनक शब्द हटाया जाना चाहिए।
नाम नहीं बदला तो पीढ़ियां ढोएंगी बोझ
ग्रामीणों का मानना है कि अगर समय रहते इस गांव का नाम नहीं बदला गया, तो आने वाली पीढ़ियां भी इसी सामाजिक बोझ के साथ जीने को मजबूर होंगी। यह सिर्फ एक नाम बदलने का सवाल नहीं, बल्कि सम्मान, पहचान और समानता का मुद्दा है। गांववाले उम्मीद लगाए बैठे हैं कि जिस तरह देश और प्रदेश में ऐतिहासिक भूलों को सुधारा गया है, उसी तरह उनके गांव को भी इस अपमानजनक पहचान से मुक्ति मिलेगी।
समाचार सार: बलिया का रूपवार तवायफ गांव नाम की वजह से सामाजिक अपमान झेल रहा है। ग्रामीण वर्षों से नाम बदलकर ‘देवपुर’ करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस फैसला नहीं हुआ।
“हम खबर को चीखने नहीं देंगे,
असर छोड़ने देंगे।”





