ई बनारस है भईया — जहाँ की गलियां तंग हैं, पर दिल चौड़े

वाराणसी के घाटों और तंग गलियों का दृश्य, गंगा किनारे आरती, नावें और बनारस की जीवंत संस्कृति

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हरीश चन्द्र गुप्ता की खास रपट

“ई बनारस है भईया…”—यह चार शब्द किसी शहर का साधारण परिचय नहीं हैं।
यह एक भाव है, एक स्वीकार है और जीवन को देखने का एक अलग नज़रिया भी।
जब तर्क कम पड़ने लगते हैं और अनुभव अपने आप बोलने लगता है,
तब यही वाक्य बनारसी ज़ुबान से सहज निकल पड़ता है।
बनारस को समझाने के लिए लंबे उपदेशों की ज़रूरत नहीं,
बस इतना कह देना काफ़ी है—ई बनारस है भईया।

यह शहर न तो सीधा है और न ही सरल।
इसकी गलियां उलझी हुई हैं, रास्ते बार-बार मोड़ लेते हैं,
कभी लगता है कि मंज़िल भटक गई,
लेकिन अगले ही मोड़ पर कोई पुराना मंदिर, कोई चाय की दुकान
या कोई अनजान मुस्कान रास्ता थाम लेती है।
बनारस आपको जल्दी में रहना नहीं सिखाता,
वह आपको ठहरना सिखाता है—देखने के लिए, सुनने के लिए और सोचने के लिए।
यहाँ समय घड़ी की सुइयों से नहीं, अनुभवों की गहराई से मापा जाता है।

बनारस की संस्कृति किसी एक रंग में नहीं बंधी।
यह बहुरंगी है, बहुध्वनित है और बहुआयामी भी।
सुबह की शुरुआत घाटों पर स्नान करती देहों से होती है—
कोई श्रद्धा से, कोई परंपरा से, कोई सिर्फ गंगा को निहारने के लिए।
दिन चढ़ते-चढ़ते गलियों में रौनक बढ़ जाती है।
पान की दुकानों पर बहसें चलती हैं—
राजनीति पर, धर्म पर, संगीत पर और कभी-कभी जीवन के अर्थ पर।
इन बहसों का कोई अंतिम निष्कर्ष ज़रूरी नहीं होता,
क्योंकि बनारस में संवाद अपने आप में एक उपलब्धि है।

संगीत बनारस की रगों में बहता है।
यहाँ शास्त्रीय संगीत किसी मंच तक सीमित नहीं,
बल्कि रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा है।
किसी पुराने मकान से निकलती रियाज़ की आवाज़,
किसी मंदिर से उठता भजन,
या किसी गली में गूंजती ठुमरी—
सब मिलकर इस शहर को सुरों में पिरो देते हैं।
बनारस संगीत को सजावट नहीं बनाता,
वह उसे सांसों की तरह सहज रहने देता है।

धार्मिक दृष्टि से बनारस का महत्व अनन्य है।
यहाँ धर्म भय नहीं, बल्कि स्वीकार का भाव देता है।
जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी यहाँ बहुत कम महसूस होती है।
घाटों पर जलती चिताएँ किसी को डराती नहीं,
बल्कि यह एहसास कराती हैं कि जीवन क्षणभंगुर है
और शायद इसी कारण अत्यंत मूल्यवान भी।
यह शहर मृत्यु को छुपाता नहीं,
वह उसे जीवन के समानांतर रख देता है—
बिना किसी बनावटी पर्दे के।

शायद इसी कारण बनारस में रहने वाले लोग
जीवन को कुछ हल्केपन के साथ लेते हैं।
यहाँ लोग जानते हैं कि अंत निश्चित है,
इसलिए अहंकार को बहुत भारी नहीं बनने देते।
यह शहर आपको सिखाता है कि
हर जीत अंतिम नहीं और हर हार स्थायी नहीं।
जीवन यहाँ किसी दौड़ की तरह नहीं,
बल्कि एक प्रवाह की तरह बहता है।

बनारस की खास बात उसकी अव्यवस्था है—
या यूँ कहें, अव्यवस्था में छिपी हुई व्यवस्था।
तंग गलियाँ, अचानक खुलते चौक,
सामने से आती साइकिल,
पीछे से आता ठेला,
और बीच में पैदल चलता इंसान—
सब एक साथ चलते हैं,
लेकिन यह शहर टकराव के बजाय
सहअस्तित्व का अभ्यास कराता है।
यहाँ नियमों से ज़्यादा व्यवहार काम करता है।

खान-पान भी बनारस के स्वभाव का हिस्सा है।
यहाँ स्वाद दिखावे के लिए नहीं,
परंपरा और संवाद के लिए है।
कचौड़ी-सब्ज़ी, टमाटर चाट, मलाईयो और पान—
ये सब सिर्फ खाने की चीज़ें नहीं,
बल्कि बैठकर बात करने के बहाने हैं।
खाने के साथ कहानियाँ चलती हैं,
और कहानियों के साथ स्मृतियाँ बनती हैं।

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राजनीतिक दृष्टि से भी बनारस साधारण शहर नहीं है।
यहाँ की राजनीति घोषणाओं और नारों तक सीमित नहीं रहती।
यह परंपरा, आस्था और पहचान से गहराई से जुड़ी होती है।
यह शहर सत्ता को बहुत करीब से देखता है,
इसीलिए उससे सवाल करने का साहस भी रखता है।
यहाँ की जनता भावनात्मक ज़रूर है,
लेकिन भोली नहीं।
वह संकेत समझती है और प्रतीकों को पढ़ना जानती है।

बनारस का राजनीतिक महत्व इस बात में भी है
कि यहाँ होने वाली हर हलचल
राष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित करती है।
यह शहर केवल चुनावी गणित नहीं,
बल्कि सांस्कृतिक संदेश भी देता है।
यहाँ की चुप्पी भी कई बार
लंबे भाषणों से ज़्यादा असर छोड़ जाती है।

समय के संदर्भ में बनारस रेखीय नहीं है।
यहाँ अतीत, वर्तमान और भविष्य
एक-दूसरे में घुले रहते हैं।
पुराने मकानों के बीच नई इमारतें खड़ी हो जाती हैं,
लेकिन पुराना अपना प्रभाव नहीं खोता।
आधुनिकता यहाँ आती है,
लेकिन अपनी शर्तों पर।
यह शहर बदलता है,
पर अपनी आत्मा छोड़े बिना।

इसीलिए जब कोई बनारसी हल्की मुस्कान के साथ कहता है—
“ई बनारस है भईया…”
तो उसमें गर्व भी होता है,
अपनापन भी और थोड़ा-सा व्यंग्य भी।
यह वाक्य दरअसल एक संकेत है—
कि इस शहर को केवल समझने की कोशिश मत कीजिए,
इसे महसूस कीजिए।

बनारस कोई पाठ्यक्रम नहीं,
जिसे पढ़कर पूरा कर लिया जाए।
यह एक यात्रा है,
जो हर बार नए अर्थ देती है।
यहाँ गलियां तंग ज़रूर हैं,
लेकिन दिल सच में चौड़े हैं।
और शायद यही वजह है
कि यह शहर हर आने वाले को
थोड़ा-सा अपना बना लेता है,
और जाते-जाते उसके भीतर
हमेशा के लिए ठहर जाता है।


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ई बनारस है भईया : पाठकों के सवाल, बनारस के जवाब

❓ “ई बनारस है भईया” कहने का वास्तविक अर्थ क्या है?

यह वाक्य बनारस की आत्मा का मौखिक रूप है। इसका अर्थ केवल स्थान विशेष नहीं,
बल्कि जीवन को सहजता से स्वीकार करने की बनारसी प्रवृत्ति है—जहाँ अव्यवस्था भी
स्वाभाविक लगती है और हर सवाल का जवाब ज़रूरी नहीं माना जाता।

❓ बनारस की गलियां इतनी तंग क्यों हैं?

बनारस की गलियां ऐतिहासिक विकास का परिणाम हैं। ये गलियां सिर्फ रास्ते नहीं,
बल्कि सामाजिक संपर्क की जगह हैं, जहाँ लोग एक-दूसरे के बेहद करीब रहते हैं—
शारीरिक रूप से भी और भावनात्मक रूप से भी।

❓ क्या बनारस सिर्फ धार्मिक शहर है?

नहीं। बनारस धार्मिक होने के साथ-साथ सांस्कृतिक, साहित्यिक, संगीतात्मक
और राजनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण शहर है। यहाँ धर्म जीवन का
एक हिस्सा है, पूरा जीवन नहीं।

❓ बनारस में मृत्यु को लेकर दृष्टिकोण अलग क्यों है?

बनारस में मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि मुक्ति की प्रक्रिया माना जाता है।
यही कारण है कि यहाँ मृत्यु डर नहीं पैदा करती,
बल्कि जीवन को अधिक अर्थपूर्ण बना देती है।

❓ राजनीति में बनारस का विशेष महत्व क्यों है?

बनारस केवल एक लोकसभा सीट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतीक है।
यहाँ की राजनीतिक गतिविधियाँ राष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित करती हैं
और सत्ता के लिए संदेशवाहक का काम करती हैं।

❓ बनारस आज भी आधुनिक शहरों से अलग क्यों दिखता है?

क्योंकि बनारस आधुनिकता को आँख बंद करके नहीं अपनाता।
वह बदलाव को स्वीकार करता है,
लेकिन अपनी परंपरा और आत्मा को छोड़े बिना।

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