पहचान की राजनीति में फँसा जीवन —
क्या हम सच में जीवन जी रहे हैं?

राम और कृष्ण के प्रतीकों के बीच प्रकाश की ओर बढ़ता मनुष्य, जीवनमय होने की वैचारिक यात्रा को दर्शाती कलात्मक पेंटिंग


✍️अनिल अनूप

पहचान की राजनीति में फँसा जीवन—
देवताओं से बड़ा सवाल: क्या हम सच में जीवन जी रहे हैं?

जीवन को न राममय और न ही कृष्णमय बनाएं, जीवन को बस ‘जीवनमय’ बनाएं… सब मिल जाएंगेअपने भीतर एक ऐसी गंभीर, शांत और बहुअर्थी चेतावनी समेटे हुए है, जो आज के समय में किसी शोरगुल वाले नारे से कहीं ज़्यादा असरदार है।
यह पंक्ति न तो धर्म का निषेध करती है, न आस्था का अपमान; बल्कि यह हमें उस बिंदु पर ले जाकर खड़ा कर देती है जहाँ जीवन, विचार और विवेक—तीनों एक-दूसरे से प्रश्न पूछने लगते हैं।

आज का संकट: जीवन से पहले पहचान

हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ जीवन जीने से पहले उसकी पहचान तय कर दी जाती है। आप कौन हैं—यह पूछने से पहले यह जानना ज़्यादा ज़रूरी हो गया है कि आप किसके हैं।

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राममय या कृष्णमय—ये शब्द अब केवल आध्यात्मिक नहीं रहे। ये राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक पहचान बन चुके हैं। समस्या यहाँ से शुरू होती है।

जब जीवन किसी एक प्रतीक, किसी एक ध्वज, किसी एक विचारधारा में सिमट जाता है—
तो वह जीवन नहीं, एक तयशुदा स्क्रिप्ट बन जाता है।

राम और कृष्ण: प्रतीक या सीमा?

राम और कृष्ण भारतीय चेतना के दो महान शिखर हैं। एक मर्यादा का प्रतीक, दूसरा रस और संघर्ष का। लेकिन सवाल यह है—क्या जीवन को पूरी तरह किसी एक प्रतीक में ढाल देना संभव है?

राम भी वनवास गए, मौन रहे, टूटे— कृष्ण भी युद्धभूमि में द्वंद्व में फँसे, रिश्तों में उलझे। दोनों पूर्ण नहीं, बल्कि संघर्षशील मनुष्य के आदर्श रूप हैं।

जब हम कहते हैं—“जीवन को राममय बनाओ” या “जीवन को कृष्णमय बनाओ”, तो हम अनजाने में यह मान लेते हैं कि जीवन किसी एक मॉडल में फिट हो सकता है।
यहीं गलती है।

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जीवनमय होना: कोई नारा नहीं, एक साधना

“जीवनमय” होना—कोई धार्मिक घोषणा नहीं, कोई वैचारिक ब्रांडिंग नहीं, बल्कि जीवन को उसके पूरे सच के साथ स्वीकार करना है।

जीवनमय होने का अर्थ है—सुख में अतिरेक नहीं, दुःख में पलायन नहीं, विश्वास में अंधापन नहीं, तर्क में अहंकार नहीं।

यह वह अवस्था है जहाँ इंसान न किसी देवता की नकल करता है, न किसी विचारधारा का प्रचारक बनता है।

वह बस जिम्मेदार होता है

…और यहीं से जीवनमय होने का असली अर्थ खुलता है।

तो फिर सच ही तो है—मिल गया न सबकुछ!

❓ पाठकों के सवाल

जीवनमय होने का मूल अर्थ क्या है?

जीवन को पहचान और प्रतीकों से ऊपर रखकर जिम्मेदारी के साथ जीना।

क्या यह विचार धर्म-विरोधी है?

नहीं, यह धर्म से पहले जीवन को रखने का आग्रह है।

यह विचार आज असहज क्यों लगता है?

क्योंकि यह पहचान की राजनीति से बाहर सोचने को मजबूर करता है।

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“हम शब्दों को शोर नहीं बनने देते,
उन्हें सोच,
संवेदना और
ज़िम्मेदारी के साथ पाठक तक पहुँचाते हैं।”


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