मां जगत जननी प्रवेश द्वार लोकार्पण एवं साहित्य संगम कार्यक्रम
नेऊरहा (रहीमपुर) में आस्था, संस्कृति और शब्दों का विराट संगम

मां जगत जननी प्रवेश द्वार लोकार्पण एवं साहित्य संगम कार्यक्रम के दौरान नेऊरहा रहीमपुर देवरिया में मुख्य अतिथि एवं ग्रामीणों की उपस्थिति का दृश्य

✍️इरफान अली लारी की रिपोर्ट
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मां जगत जननी प्रवेश द्वार लोकार्पण एवं साहित्य संगम कार्यक्रम देवरिया जिले की भाटपार रानी तहसील के अंतर्गत नेऊरहा ग्राम पोस्ट रहीमपुर में अत्यंत गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। यह आयोजन न केवल एक धार्मिक संरचना के लोकार्पण तक सीमित रहा, बल्कि इसमें साहित्य, संस्कृति, सामाजिक चेतना और लोकसंवेदना का ऐसा समन्वय देखने को मिला, जिसने पूरे क्षेत्र को वैचारिक रूप से समृद्ध किया। गांव की मिट्टी में बसे विश्वास, शब्दों की गरिमा और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना इस कार्यक्रम के केंद्र में रही।

समाचार सार : नेऊरहा (रहीमपुर) में मां जगत जननी धाम के भव्य प्रवेश द्वार का लोकार्पण,
वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति, और साहित्य संगम के माध्यम से विचार, संस्कृति व सामाजिक
संवेदनाओं का सशक्त संवाद।

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भव्य लोकार्पण समारोह : आस्था और पहचान का प्रतीक

मां जगत जननी धाम के नव-निर्मित प्रवेश द्वार का लोकार्पण गांव के लिए केवल एक स्थापत्य उपलब्धि नहीं,
बल्कि सांस्कृतिक पहचान का विस्तार भी है। इस भव्य प्रवेश द्वार का लोकार्पण जिला पंचायत अध्यक्ष
पंडित गिरीश चंद तिवारी
के कर-कमलों द्वारा किया गया। इस अवसर पर कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि पूर्व सालेमपुर सांसद
रवींद्र कुशवाहा
तथा उनके भाई गुड्डन कुशवाहा
की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन को विशेष महत्व प्रदान किया।

प्रवेश द्वार का स्वरूप न केवल सौंदर्यबोध को दर्शाता है, बल्कि यह क्षेत्र की धार्मिक चेतना और
सामूहिक आस्था का स्थायी प्रतीक बनकर उभरा है। ग्रामीणों ने इसे अपनी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में
स्वीकार किया और भावनात्मक जुड़ाव के साथ इस क्षण के साक्षी बने।

साहित्य संगम : शब्दों के माध्यम से सामाजिक संवाद

मां जगत जननी प्रवेश द्वार लोकार्पण एवं साहित्य संगम कार्यक्रम का दूसरा महत्वपूर्ण
आयाम साहित्यिक सत्र रहा। इस सत्र का कुशल संचालन वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि
मकसूद भपतपुरी
द्वारा किया गया। साहित्य संगम में कविता, व्यंग्य, लोकसंवेदना और सामाजिक यथार्थ से जुड़े विचारों
की प्रभावशाली प्रस्तुति हुई, जिसने श्रोताओं को भावनात्मक और वैचारिक दोनों स्तरों पर जोड़ा।

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इस अवसर पर रचनाकार जियाउल्लाह अंसारी जिया,
हास्य कवि बादशाह तिवारी,
रविंद्र सिंह रवि,
दिनेश सिंह मामा,
श्याम सुंदर यादव,
अबू नसर राजा झारखंडी
सहित अनेक साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं से वातावरण को जीवंत कर दिया।

सामाजिक सहभागिता और आयोजन की भूमिका

इस आयोजन को सफल बनाने में समाजसेवी
जटाशंकर सिंह,
संयोजक एवं संस्थापक प्रदीप मौर्या
तथा प्रमोद चौधरी
की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कार्यक्रम की व्यवस्थाओं से लेकर अतिथियों के स्वागत तक,
हर स्तर पर सामूहिक प्रयास और अनुशासन स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।

प्रशासनिक, साहित्यिक और सामाजिक हस्तियों की गरिमामयी उपस्थिति

कार्यक्रम में भाटपार रानी के एसडीएम
रत्नेश तिवारी,
निर्भीक समाजसेविका गिरिजा त्रिपाठी,
पूर्व प्रधानाचार्य एवं साहित्यकार
आद्या प्रसाद मिश्र,
थाना अध्यक्ष खापपार
प्रदीप अस्थान,
थाना अध्यक्ष श्रीरामपुर
डॉ महेंद्र चौधरी
सहित अनेक विशिष्टजन उपस्थित रहे।

इसके अतिरिक्त कथावाचक पंडित घनश्याम ओझा,
चिकित्सा अधिकारी
डॉ आशुतोष कुमार सिंह,
कथावाचक पंडित वेद प्रकाश मिश्र,
संपादक डॉ जनार्दन सिंह
एवं अन्य गणमान्य जनों की उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा को और बढ़ाया।

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ग्रामीण संस्कृति, आस्था और साहित्य का संगम

यह आयोजन इस बात का उदाहरण बना कि ग्रामीण परिवेश में भी यदि सोच व्यापक हो,
तो संस्कृति और साहित्य कितनी सशक्त भूमिका निभा सकते हैं।
मां जगत जननी प्रवेश द्वार लोकार्पण एवं साहित्य संगम कार्यक्रम
ने यह संदेश दिया कि आस्था केवल पूजा तक सीमित नहीं,
बल्कि विचार और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़कर ही पूर्ण होती है।

संपादकीय संकेत : जब गांव में प्रवेश द्वार आस्था का बने,
और मंच साहित्य का—तो समाज केवल आगे नहीं बढ़ता,
वह सोच में भी समृद्ध होता है।


“हम खबर को चीखने नहीं देंगे,
असर छोड़ने देंगे।”


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