‘चमक उठी सन् सत्तावन में…’
जब कविता इतिहास बन गई — सुभद्रा कुमारी चौहान की पुण्यतिथि पर स्मरण

सुभद्रा कुमारी चौहान का चित्र और घोड़े पर सवार झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम और कविता के प्रतीक के रूप में

✍️ अंजनी कुमार त्रिपाठी
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कुछ पंक्तियाँ किताबों में नहीं रहतीं, वे स्मृति बन जाती हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता
‘झांसी की रानी’ भी ऐसी ही एक अमर स्मृति है, जो आज़ादी, स्त्री-संकल्प और राष्ट्रबोध को एक साथ
जगा देती है।

“चमक उठी सन् सत्तावन में… खूब लड़ी मरदानी वह तो, झांसी वाली रानी थी”—ये पंक्तियाँ केवल कविता नहीं,
भारतीय चेतना का हिस्सा हैं। हिंदी साहित्य में कुछ स्वर ऐसे होते हैं जो समय की सीमाओं को तोड़कर
पीढ़ियों तक गूंजते हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान उन्हीं विरल रचनाकारों में हैं, जिनकी लेखनी ने
इतिहास को भावनाओं की भाषा दी और कविता को जनस्मृति का माध्यम बनाया।

कविता से इतिहास तक की यात्रा

सुभद्रा कुमारी चौहान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने कविता को केवल सौंदर्य-बोध तक सीमित
नहीं रखा। उनकी कविताएँ इतिहास को जीवंत कर देती हैं। ‘झांसी की रानी’ पढ़ते समय पाठक केवल पढ़ता
नहीं, बल्कि उस संघर्ष को महसूस करता है। कविता यहां वर्णन नहीं करती, दृश्य रचती है; वह सूचना
नहीं देती, चेतना को जगाती है।

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स्त्री-संवेदना और राष्ट्रबोध का संतुलन

सुभद्रा जी की कविता में स्त्री न तो करुणा की प्रतिमा बनती है और न ही केवल वीरता का प्रतीक।
उनकी रानी लक्ष्मीबाई निर्णयशील है, आत्मसम्मानी है और संघर्षशील है। यह संतुलन उनकी कविता को
कालजयी बनाता है। वे स्त्री-शक्ति को भावुकता नहीं, संकल्प के रूप में प्रस्तुत करती हैं।

भाषा की सरलता, प्रभाव की गहराई

उनकी भाषा की शक्ति उसकी सादगी में है। न क्लिष्टता, न आडंबर—सीधी, प्रवाहपूर्ण और लोक-संवेदना से
जुड़ी हुई भाषा। यही कारण है कि उनकी कविताएँ बच्चों से लेकर विद्वानों तक समान रूप से अपनाई गईं।
यह भाषा समाज के हर वर्ग से संवाद करती है।

कविता एक सार्वजनिक उत्तरदायित्व

आज जब साहित्य को निजी अनुभूतियों तक सीमित किया जा रहा है, सुभद्रा कुमारी चौहान याद दिलाती हैं
कि कविता एक सार्वजनिक कर्म भी हो सकती है। स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी और
देशभक्ति से भरी रचनाएँ बताती हैं कि उनके लिए कविता संघर्ष का माध्यम थी, केवल आत्म-अभिव्यक्ति नहीं।

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लोककाव्य के रूप में ‘झांसी की रानी’

‘झांसी की रानी’ एक ऐसी कविता है जो पाठ्यक्रम से निकलकर लोकजीवन में बस गई। मंचों, सभाओं,
विद्यालयों और आंदोलनों में यह कविता बार-बार दोहराई गई। यही लोककाव्य की शक्ति है—वह संस्थानों
का मोहताज नहीं होता, वह जनमानस में जीवित रहता है।

बाल-साहित्य और मानवीय करुणा

सुभद्रा जी को केवल वीर-रस की कवयित्री मानना अधूरा मूल्यांकन होगा। उनकी बाल-कविताएँ और करुणा से
भरी रचनाएँ उनके मानवीय पक्ष को उजागर करती हैं। उनकी करुणा दया नहीं, बल्कि सहानुभूति है—जो
मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है।

आज के समय में उनकी प्रासंगिकता

आज जब राष्ट्रबोध अक्सर शोर में बदल जाता है, सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता संयम और गरिमा सिखाती
है। वे बताती हैं कि सच्ची देशभक्ति आत्मसम्मान से जन्म लेती है और आत्मसम्मान बिना मानवीय मूल्यों
के संभव नहीं।

लेख सार: सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता केवल साहित्य नहीं, भारतीय चेतना का
अभिन्न हिस्सा है। उनकी रचनाएँ स्त्री-संकल्प, राष्ट्रबोध और मानवीय संवेदना का ऐसा संतुलन
रचती हैं, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में था।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

सुभद्रा कुमारी चौहान को कालजयी कवयित्री क्यों कहा जाता है?

क्योंकि उनकी कविताएँ समय की सीमाओं से परे जाकर आज भी समान प्रभाव और प्रासंगिकता रखती हैं।

‘झांसी की रानी’ कविता की विशेषता क्या है?

यह कविता इतिहास को भावनात्मक और लोकभाषा में प्रस्तुत करती है, जिससे वह जनस्मृति का हिस्सा बन गई।

आज के संदर्भ में उनकी कविता क्यों महत्वपूर्ण है?

क्योंकि वह शोर नहीं, संतुलन सिखाती है और राष्ट्रबोध को मानवीय मूल्यों से जोड़ती है।

Meta Description: सुभद्रा कुमारी चौहान की पुण्यतिथि पर साहित्यिक आलेख—झांसी की रानी की कवयित्री,उनकी कविता, स्त्री-संकल्प, राष्ट्रबोध और आज के समय में उनकी प्रासंगिकता पर गहन दृष्टि।

“हम साहित्य को चीख नहीं बनाते,
उसे अनुभूति बनाकर पाठक तक पहुँचाते हैं।”


साहित्य में “नयन कटार” और “विरहिन का विष”
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