ब्रजरज का टीका, फूलों की होली और आस्था का रंग —
हरि कृपा आश्रम में उमड़ा श्रद्धालुओं का सागर

कामवन स्थित हरिकृपा आश्रम में महाराज द्वारा गुलाल व पुष्पों के साथ मनाया जा रहा भव्य होली उत्सव


✍️ हिमांशु मोदी की रिपोर्ट
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देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु कामवन स्थित हरि कृपा आश्रम पहुंचे। ब्रजरज का टीका लगाकर और गुलाब-गेंदे के पुष्पों की वर्षा के बीच दिव्य व विशाल होलिकोत्सव मनाया गया।

कामवन। ब्रजभूमि के पावन क्षेत्र कामवन स्थित हरि कृपा आश्रम में आयोजित विराट धर्म सम्मेलन एवं होलिकोत्सव के अवसर पर देश-विदेश से हजारों श्रद्धालुओं का प्रतिदिन ताँता लगा हुआ है। उसी क्रम में होली मिलन समारोह तथा विशाल फूलों की होली का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें श्रद्धालुओं ने गुलाब और गेंदे के फूलों की वर्षा के बीच भक्तिभाव से होली खेली और गुलाल उड़ाकर वातावरण को रंगमय बना दिया।

आश्रम के संस्थापक एवं पीठाधीश्वर हरि चैतन्य पुरी महाराज ने श्रद्धालुओं पर पुष्प वर्षा करते हुए और भक्तों द्वारा अर्पित पुष्पों को स्वीकार करते हुए समस्त देशवासियों और विश्व भर के लोगों को होली की शुभकामनाएँ दीं। इस अवसर पर पूरा आश्रम परिसर रंग, भक्ति और उल्लास के अद्भुत संगम से सराबोर दिखाई दिया।

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नास्तिकता पर आस्तिकता की विजय का पर्व है होली

अपने उद्बोधन में हरि चैतन्य पुरी महाराज ने कहा कि युगों-युगों से यह पावन पर्व मानव मात्र को प्रेम, एकता और सद्भाव का संदेश देता आया है। होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि विभिन्न संकीर्णताओं, मतभेदों और मनभेदों को भुलाकर एक दूसरे को अपनाने की प्रेरणा देता है।

उन्होंने कहा कि होली नास्तिकता पर आस्तिकता की विजय का पर्व है, अन्याय पर न्याय की विजय और अत्याचार पर सदाचार की विजय का प्रतीक है। यही कारण है कि सामाजिक उत्सव होने के साथ-साथ यह पर्व आज राष्ट्रीय महत्व का भी बन चुका है। फागुन का यह पर्व बसंत के आगमन के साथ आनंद और उत्साह तो लाता ही है, साथ ही भारतीय संस्कृति के मूल्यों — सदाचार, न्याय और धर्मपूर्ण जीवन — का संदेश भी देता है।

भक्त प्रह्लाद की कथा देती है अटूट आस्था का संदेश

महाराज श्री ने अपने प्रवचनों में भक्तराज प्रह्लाद की कथा का उल्लेख करते हुए कहा कि इतिहास साक्षी है कि मिथ्या अहंकार में डूबे हिरण्यकश्यप ने अपने ही पुत्र प्रह्लाद पर अनेक अत्याचार किए, लेकिन उसका अपराध केवल इतना था कि उसने परमात्मा का नाम लेना नहीं छोड़ा।

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उन्होंने कहा कि प्रभु की कृपा जिस पर होती है उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। विष भी अमृत बन जाता है, शत्रु भी मित्र बन जाते हैं, अग्नि शीतल हो जाती है और असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। यही संदेश प्रह्लाद की कथा हमें देती है कि सच्चे भक्त की सदैव रक्षा होती है और अंततः सत्य और धर्म की ही विजय होती है।

भक्ति और उल्लास से गूंज उठा पूरा आश्रम परिसर

महाराज श्री के ओजस्वी और धाराप्रवाह प्रवचनों से उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। आश्रम परिसर में “श्री गुरु महाराज”, “कामां के कन्हैया” और “लाठी वाले भैया” के जयकारों से वातावरण गूंज उठा। भक्तजन “हरिबोल” की धुन पर झूमते हुए भक्ति और उत्साह के रंग में रंग गए।

उन्होंने ब्रजभूमि की महिमा का उल्लेख करते हुए कहा कि इस पावन भूमि की धूल भी भक्तों के लिए वरदान समान है। इसी कारण होलिकोत्सव की शुरुआत सबसे पहले आश्रम स्थित श्री रघुनाथ जी मंदिर और श्री चैतन्येश्वर महादेव को गुलाल अर्पित कर की गई।

ब्रजरज का टीका लगाकर शुरू हुआ होलिकोत्सव

महाराज श्री ने कहा कि इस पवित्र पर्व की शुरुआत ब्रजरज का टीका लगाकर करनी चाहिए। उन्होंने स्वयं अपने पास सादर रखी ब्रजधूलि का टीका अपने मस्तक पर लगाया और उपस्थित श्रद्धालुओं को भी ब्रजरज का टीका लगाकर स्वयं को कृतार्थ करने का संदेश दिया।

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इसके बाद आश्रम परिसर में जयकारों की गूंज के बीच भक्तों ने भी अपने मस्तक पर ब्रजरज का टीका लगाया और एक मर्यादित तथा आदर्श परंपरा के साथ होलिकोत्सव का शुभारंभ हुआ।

इस दौरान पूरे आश्रम में पुष्प वर्षा, गुलाल और भक्ति गीतों के बीच ऐसा दृश्य बना जिसने ब्रजभूमि की आध्यात्मिक परंपरा और सांस्कृतिक गरिमा को जीवंत कर दिया। भक्तों ने इसे विश्व में अपनी तरह का अनोखा और मर्यादित होली उत्सव बताया।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: हरि कृपा आश्रम में होलिकोत्सव कैसे मनाया गया?
उत्तर: आश्रम में हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में गुलाब और गेंदे के फूलों की होली, गुलाल उत्सव और भक्ति सम्मेलन का आयोजन किया गया।
प्रश्न 2: ब्रजरज का टीका लगाने की परंपरा क्या है?
उत्तर: ब्रजभूमि की पावन धूल को माथे पर लगाना भक्तों के लिए आस्था और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
प्रश्न 3: महाराज श्री ने अपने प्रवचन में क्या संदेश दिया?
उत्तर: उन्होंने कहा कि होली प्रेम, एकता और सद्भाव का संदेश देने वाला पर्व है तथा यह नास्तिकता पर आस्तिकता की विजय का प्रतीक है।


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