कल तक हम ख़बर लिखते थे —
आज रंग ने हमें ख़बर बना दिया।

होली के रंगों के बीच खड़ा आधा रंगा संपादक, पीछे नाचता गाता समाज और सामने रखी गुलाल की थालियाँ, ढोल और समाचार पत्र का प्रतीकात्मक दृश्य।


✍️ अनिल अनूप, प्रधान संपादक
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हूक पॉइंट : होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि समाज, संबंध और आत्ममंथन का क्षण है। यह संपादकीय उसी रंगीन विराम में जीवन को नए सिरे से पढ़ने का आमंत्रण है।

होली केवल एक त्योहार नहीं है; यह भारतीय आत्मा का वह क्षण है जब वह अपने संकोचों की खिड़कियाँ खोल देती है। वर्ष भर जो समाज अपने नियमों, मर्यादाओं, संघर्षों और चिंताओं के बोझ तले चलता है, वही समाज फागुन के आते ही अचानक रंगों में भीगकर हल्का हो जाता है। जैसे किसी गंभीर ग्रंथ के बीच अचानक कोई लोकगीत गूँज उठे—वैसी ही है होली।

संपादकीय लिखते समय अक्सर शब्द संयमित रहते हैं। वे संतुलन साधते हैं, तथ्यों की कसौटी पर चलते हैं और भावनाओं को नियंत्रित रखते हैं। पर आज, इस होली के दिन, शब्द भी रंग मांगते हैं। वे सूखे नहीं रहना चाहते। वे भीगना चाहते हैं—गुलाल में, हँसी में, ठिठोली में, और उस सामूहिक उल्लास में जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है।

फागुन की दस्तक और मन का दरवाज़ा

फागुन केवल कैलेंडर का महीना नहीं है; यह मन का मौसम है। खेतों में सरसों की पीली चादर बिछती है तो लगता है धरती स्वयं होली खेलने को तैयार है। हवा में एक अलग सी महक होती है—कच्चे आम की बौर, पलाश के फूल और दूर कहीं ढोलक की थाप। गाँवों की गलियों से लेकर शहरों की सड़कों तक एक अनकही प्रतीक्षा फैल जाती है।

हमारे भीतर भी एक बच्चा है जो साल भर अनुशासन में बँधा रहता है। वह बच्चा होली पर बाहर आता है। वही बच्चा पिचकारी उठाता है, वही बच्चा रंगों से चेहरा भर देता है, और वही बच्चा बेफिक्र होकर गाता है—“अरे रंग बरसे…”

होली दरअसल उस भीतरी बच्चे का उत्सव है।

रंगों का समाजशास्त्र

रंग केवल रंग नहीं होते; वे प्रतीक होते हैं। लाल केवल उत्साह नहीं, जीवन की तीव्रता भी है। पीला केवल बसंत नहीं, आशा का रंग भी है। हरा केवल प्रकृति नहीं, संतुलन और विश्वास का प्रतीक है। और नीला—गहराई का, विस्तार का, आकाश की अनंतता का।

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जब हम किसी को रंग लगाते हैं, तो केवल उसके चेहरे को नहीं छूते; हम उसके अस्तित्व को स्वीकार करते हैं। हम कहते हैं—“तुम मेरे हो, मैं तुम्हारा हूँ, इस क्षण हम अलग नहीं हैं।”

होली का यह सामूहिक रंग हमारे सामाजिक ढाँचे को भी कुछ देर के लिए नरम बना देता है। जो दूरी साल भर बनी रहती है, वह इस दिन हल्की पड़ जाती है। बड़े-छोटे, अमीर-गरीब, जाति-धर्म की दीवारें—सब कुछ कुछ समय के लिए रंग की एक ही परत में ढक जाता है।

क्या यह स्थायी समाधान है? शायद नहीं। पर क्या यह एक स्मरण है कि हम अलग नहीं हैं? निस्संदेह।

हँसी की राजनीति

हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हम हँसना भूलते जा रहे हैं। गंभीरता का एक कृत्रिम आवरण हमने ओढ़ लिया है। हर बात में विचारधारा, हर संवाद में आरोप, हर मतभेद में कटुता। ऐसे समय में होली एक सांस्कृतिक विराम है। यह हमें याद दिलाती है कि जीवन केवल बहस नहीं, उत्सव भी है।

होलिका दहन की अग्नि केवल पौराणिक प्रतीक नहीं; वह हमारे भीतर की कटुता, ईर्ष्या और द्वेष को जलाने का अवसर भी है। प्रश्न यह है कि क्या हम सचमुच अपने भीतर के अहंकार को उस अग्नि में समर्पित कर पाते हैं? या केवल लकड़ियाँ जलाकर लौट आते हैं?

यदि होली केवल रंग लगाने तक सीमित रह जाए तो वह आधी होली है। पूरी होली तब है जब हम अपने भीतर के अंधकार को भी जलाएँ।

गीतों की थाप पर समाज

ढोलक की थाप में एक लोकतंत्र छिपा होता है। जब “फाग” गाया जाता है तो कोई अकेला नहीं गाता; स्वर मिलते हैं, लय जुड़ती है, और सामूहिकता का एक संगीत बनता है। लोकगीतों की खुली पंक्तियाँ कभी-कभी शरारती भी होती हैं, पर उनमें अश्लीलता नहीं, सहजता होती है। वहाँ संवाद है, हँसी है, और जीवन की स्वीकृति है।

आज जब हम शहरी जीवन में सीमित हो गए हैं, तब भी होली हमें समूह में लौटने का अवसर देती है। कॉलोनियों में, मोहल्लों में, क्लबों में—लोग इकट्ठा होते हैं। रंग का एक टीका, मिठाई का एक टुकड़ा, और “हैप्पी होली” का एक वाक्य—ये छोटे-छोटे क्षण सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करते हैं।

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होली और जिम्मेदारी

पर इस रंगोत्सव की एक दूसरी परत भी है। उत्सव के नाम पर अराजकता, नशे के नाम पर असंयम, और मज़ाक के नाम पर असम्मान—ये वे साये हैं जो कभी-कभी होली के उजाले को धूमिल कर देते हैं।

सच्ची होली वही है जिसमें आनंद हो, पर मर्यादा भी हो। रंग हो, पर सहमति भी हो। ठिठोली हो, पर गरिमा भी हो। किसी की मुस्कान छीनकर उत्सव मनाना होली नहीं; किसी की हँसी बचाकर उत्सव मनाना ही सच्ची होली है।

इसलिए आज, जब हम रंगों की बात करते हैं, तो हमें यह भी याद रखना होगा कि उत्सव का अर्थ उन्माद नहीं होता। संयमित उल्लास ही स्थायी आनंद देता है।

डिजिटल युग की होली

समय बदल गया है। अब होली केवल चौपाल की नहीं, स्क्रीन की भी हो गई है। वीडियो कॉल पर रंग दिखाए जाते हैं, व्हाट्सऐप पर शुभकामनाएँ भेजी जाती हैं, और सोशल मीडिया पर रंगों की तस्वीरें साझा होती हैं।

कुछ लोग इसे कृत्रिम कहते हैं, पर यह भी समय का विस्तार है। भाव वही है—संपर्क का, साझा करने का। बस माध्यम बदल गया है।

फिर भी, यह आवश्यक है कि हम स्क्रीन से बाहर निकलकर वास्तविक स्पर्श का अनुभव न भूलें। क्योंकि रंग की असली गर्मी उंगलियों से ही महसूस होती है।

स्मृतियों की होली

हर व्यक्ति के पास अपनी एक होली होती है—बचपन की, दोस्तों की, किसी पहली प्रेम कहानी की, किसी परिवार की सामूहिक हँसी की। ये स्मृतियाँ रंगों से भी गहरी होती हैं।

कभी हम भीगे कपड़ों में काँपते हुए घर लौटे होंगे, कभी किसी ने अचानक रंग से भरा गुब्बारा फेंका होगा, कभी माँ ने डाँटा होगा और फिर गुजिया खिलाई होगी। ये छोटी-छोटी स्मृतियाँ हमारे जीवन के कोमल अध्याय हैं।

संपादकीय के इस गंभीर मंच से भी आज यह स्वीकार करना चाहिए कि जीवन की असली पूँजी यही स्मृतियाँ हैं।

एक सामाजिक संदेश

आज जब हम देश और समाज के जटिल प्रश्नों से जूझ रहे हैं—आर्थिक चुनौतियाँ, राजनीतिक मतभेद, सामाजिक तनाव—तब होली हमें एक क्षणिक ही सही, पर साझा मंच देती है।

क्यों न हम इस होली पर यह संकल्प लें कि मतभेद रहेंगे, पर मनभेद नहीं। विचार अलग होंगे, पर संवाद बंद नहीं होगा। हम बहस करेंगे, पर दुश्मनी नहीं पालेंगे।

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यदि होली के रंग हमें यह सिखा जाएँ, तो यह उत्सव केवल परंपरा नहीं, परिवर्तन भी बन सकता है।

शब्दों की होली

आज यह संपादकीय भी सूखा नहीं रहना चाहता। यह भीगना चाहता है—पाठकों की मुस्कान में, उनके घरों की हँसी में, उनके बच्चों की खिलखिलाहट में।

हम अक्सर खबरों के बीच तनाव, संघर्ष और विवाद की कहानियाँ लिखते हैं। पर आज हम एक अलग कहानी लिखना चाहते हैं—रंगों की, गीतों की, और उस सहज आनंद की जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है।

यदि आपके घर के आँगन में आज ढोलक की थाप है, तो उसमें हमारी शुभकामना की एक ताल जोड़ दीजिए। यदि आपकी बालकनी से रंग उछल रहे हैं, तो समझिए कि यह संपादकीय भी उसी हवा में शामिल है।

अंत में…

होली केवल एक दिन का उत्सव नहीं; यह जीवन की एक दृष्टि है। यह सिखाती है कि जीवन को केवल गंभीरता से नहीं, हल्केपन से भी जीना चाहिए। यह बताती है कि संबंधों पर कभी-कभी रंग चढ़ाना भी जरूरी है—ताकि वे फीके न पड़ें।

आज, जब आप किसी को रंग लगाएँ, तो केवल औपचारिकता न निभाएँ। एक क्षण रुकें, उसकी आँखों में देखें, और मन ही मन कहें—“तुम मेरे जीवन के रंग हो।”

और जब शाम को रंग उतर जाएँ, तो यह देखिए कि क्या मन पर कोई रंग बचा है। यदि हाँ, तो समझिए कि होली सफल रही।

आप सभी को ऐसी होली की शुभकामनाएँ—जो चेहरे से अधिक दिल पर चढ़े, जो एक दिन से अधिक स्मृतियों में रहे, और जो केवल रंग नहीं, रिश्ते भी गाढ़े करे।

रंग बरसें, शब्द झूमें, मन नाचे—
और यह फागुन आपके जीवन में नई रोशनी, नई हँसी और नई शुरुआत लेकर आए।

होली मंगलमय हो। 🎨🌸


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: इस संपादकीय का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: होली को केवल उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद, आत्ममंथन और संबंधों के पुनर्स्मरण के रूप में देखना।
प्रश्न 2: क्या होली केवल सांस्कृतिक उत्सव है?
उत्तर: नहीं, यह सामाजिक समरसता और व्यक्तिगत भावनात्मक संतुलन का अवसर भी है।
प्रश्न 3: आधुनिक समय में होली का स्वरूप कैसे बदला है?
उत्तर: डिजिटल माध्यमों के कारण इसका विस्तार हुआ है, पर मूल भाव—संपर्क और आनंद—आज भी वही है।


3 thoughts on “<h1 style="text-align:center;line-height:1.4;"> <span style="color:#0b5394;font-weight:800;">कल तक हम ख़बर लिखते थे —</span><br> <span style="color:#b45f06;font-weight:800;">आज रंग ने हमें ख़बर बना दिया।</span> </h1>”

  1. संपादक जी,
    इस होली आपका चेहरा ही नहीं, मन भी ऐसा ही दमकता रहे।
    गंभीरता पर हल्की सी गुलाबी परत चढ़ी रहे, नीले आसमान जैसा विस्तार बना रहे,
    और जीवन में पीली सरसों जैसी उजली उम्मीद खिली रहे।
    आज की होली में बस इतना ही संकल्प — खबरें कल भी लिखेंगे,
    पर आज दिल से खेलेंगे।
    आपको ऐसी होली की शुभकामनाएँ —
    जिसमें उम्र नहीं, ऊर्जा दिखे;
    पद नहीं, व्यक्तित्व चमके;
    और रंग चेहरे से उतर जाएँ,
    पर मुस्कान नहीं।
    होली मंगलमय हो, संपादक जी! 🌸✨😄

  2. रंग कम नहीं पड़े…
    बस संपादक साहब ने रंग को चेहरे पर कम,नज़र में ज़्यादा चढ़ने दिया है। 😉
    और संपादक?
    वो स्थिर खड़ा है।
    यही तो बात है।
    होली सबको रंग देती है,
    पर कुछ लोग रंग को समझ भी लेते हैं।
    चेहरे पर हल्का रंग…
    लेकिन आँखों में पूरा फागुन। 🎨
    और सच कहूँ?
    अगर संपादक पूरी तरह रंग में डूब जाता,
    तो तस्वीर उत्सव होती।

  3. आज पढ़ते-पढ़ते सच में लगा कि होली सिर्फ खेली नहीं, समझी भी जा सकती है।
    आपने रंगों को शब्द नहीं दिया, शब्दों को रंग दे दिया।
    संपादकीय कम और अनुभव अधिक लगा।
    इस बार सच में—रंग हम तक नहीं, हम रंग तक पहुँच गए। 🎨

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