मलंग से ‘बाबा’ तक :
गोरखदास खडेसरी की 12 वर्षी साधना और गौसेवा की असाधारण यात्रा

पारंपरिक वेशभूषा में खड़े एक युवा गौसेवक का फीचर पोस्टर, पृष्ठभूमि में गौशाला और गायों की सेवा का दृश्य।


जोगिंदर सिंह ऊर्फ कालू छारा की रिपोर्ट
IMG_COM_202603081950166970
previous arrow
next arrow
हूक पॉइंट : 33 वर्ष की आयु, 12 वर्षों का निरंतर समर्पण। बिना शोर, बिना मंच, बिना राजनीतिक परचम—मुजफ्फरनगर का एक युवक कैसे बना गौसेवा का प्रतीक? यह केवल आस्था की कहानी नहीं, बल्कि श्रम, जोखिम, आत्मिक अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी का जीवंत दस्तावेज है।

मुजफ्फरनगर की धरती ने कई स्वभाव गढ़े हैं—किसान, पहलवान, व्यापारी और साधक। इसी मिट्टी से निकला एक युवक, जिसे लोग कभी “मलंग” कहकर पुकारते थे, आज गोरखदास खडेसरी बाबा के नाम से जाना जाता है। यह नाम परिवर्तन केवल संबोधन का बदलाव नहीं, बल्कि जीवन के उद्देश्य की घोषणा है।

सिर्फ 33 वर्ष की आयु में पिछले 12 वर्षों से निरंतर गौसेवा और संरक्षण के कार्य में समर्पित रहना सामान्य बात नहीं। यह न क्षणिक भावुकता है, न किसी अभियान की लहर। यह एक दीर्घकालिक साधना है—जिसमें तप है, संघर्ष है और निरंतरता की कठिन परीक्षा भी।

शुरुआत : एक बेचैनी से जन्मी प्रतिबद्धता

गौरव का बचपन साधारण था। लेकिन सड़क किनारे घायल पशुओं को तड़पते देखना और उपेक्षित गौवंश की स्थिति ने उनके भीतर प्रश्न जगाया—यदि समाज जिम्मेदार नहीं होगा, तो कौन होगा?

इसे भी पढें  डॉ. जगदीश गुप्त : वैभव से विरक्ति तकसंघर्ष से सिद्धि तक एक उज्ज्वल व्यक्तित्व

इसी बेचैनी ने उन्हें दिशा दी। धीरे-धीरे यह संवेदना निर्णय में बदली और निर्णय मिशन में।

‘दास’ बनने की घोषणा

जब उन्होंने स्वयं को गोरखदास खडेसरी कहना शुरू किया, तो कई लोगों ने इसे भावनात्मक कदम माना। लेकिन उनके लिए ‘दास’ का अर्थ स्पष्ट था—सेवक।

उनकी दिनचर्या बदल गई। सुबह गौशाला, दिनभर प्रबंधन और उपचार, रात में सतर्कता। यह केवल भाव नहीं, कर्म का विस्तार था।

12 वर्षों की यात्रा : संघर्ष से संरचना तक

प्रारंभिक वर्षों में संसाधन लगभग शून्य थे। चारा, दवा और आश्रय की कमी थी। कुछ मित्र जुड़े, कुछ अलग हुए।

धीरे-धीरे स्थानीय युवाओं का समूह बना। पशु चिकित्सकों से सहयोग स्थापित हुआ। प्रशासन से संवाद बढ़ा। आज उनका नेटवर्क केवल सेवा तक सीमित नहीं, संरक्षण तक विस्तृत है।

गौसेवा बनाम गौ-प्रदर्शन

आज “गौसेवा” शब्द कई बार राजनीतिक विमर्श में उलझ जाता है। पर गोरखदास की दृष्टि अलग है।

वे कहते हैं—“सेवा का अर्थ शोर नहीं, श्रम है।”

गोबर साफ करना, घाव पर मरहम लगाना, चारा जुटाना—ये कार्य कैमरे से दूर होते हैं, पर सेवा की असली पहचान यही है।

गौरक्षा संकल्प और आत्मिक तपस्या

हाल के दिनों में गोरखदास खडेसरी ने अपने गौरक्षा संकल्प को और अधिक दृढ़ करने के उद्देश्य से आत्मिक तैयारी की दिशा में भी कदम बढ़ाया है। उनके निकट सहयोगियों के अनुसार, उन्होंने स्वयं को मानसिक और आध्यात्मिक रूप से अनुशासित करने हेतु दिन-रात खड़े रहकर तपस्या प्रारम्भ की है।

इसे भी पढें  डॉ. जगदीश गुप्त : वैभव से विरक्ति तकसंघर्ष से सिद्धि तक एक उज्ज्वल व्यक्तित्व

यह तप केवल प्रतीकात्मक अभ्यास नहीं माना जा रहा, बल्कि आत्मसंयम, सहनशक्ति और आंतरिक दृढ़ता का अभ्यास बताया जाता है। सेवा के क्षेत्र में सक्रिय रहने वाले इस युवा का मानना है कि यदि भीतर स्थिरता न हो, तो बाहरी सक्रियता टिकाऊ नहीं होती।

इसी तपस्वी अनुशासन के कारण स्थानीय लोगों के बीच उनकी पहचान “खड़े श्री बाबा” के रूप में भी बनने लगी है। यह संबोधन उनके लिए व्यक्तिगत महिमा का प्रतीक नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी का स्मरण है—कि सेवा केवल बाहरी गतिविधि नहीं, बल्कि आत्मिक साधना का विस्तार भी है।

एक रात का प्रसंग

रात के अंधेरे में संदिग्ध गतिविधि की सूचना मिलते ही प्रशासन को सूचित करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। वे स्वयं को कानून के दायरे में रखते हैं। उनका आग्रह स्पष्ट है—“कानून व्यवस्था प्रशासन की जिम्मेदारी है, हमारा कार्य सूचना और सहयोग देना है।”

यह संतुलन ही उन्हें अतिवादी दृष्टिकोण से अलग करता है।

संसाधनों की जंग

सेवा भावना से चलती है, लेकिन टिकती संसाधनों पर है। चारा, चिकित्सा और आश्रय का प्रबंधन आसान नहीं। कई बार व्यक्तिगत आय से खर्च उठाना पड़ा।

फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। गांव-गांव जाकर सहयोग मांगा।

उनका मानना है—“यदि एक जीवन भी बचा, तो प्रयास सफल है।”

ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ाव

गाय केवल धार्मिक प्रतीक नहीं; ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी है। दूध, जैविक खाद, खेती—सब इससे जुड़ा है।

इसे भी पढें  डॉ. जगदीश गुप्त : वैभव से विरक्ति तकसंघर्ष से सिद्धि तक एक उज्ज्वल व्यक्तित्व

गौ संरक्षण का अर्थ केवल भावनात्मक संरक्षण नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता भी है।

आलोचना और आत्ममंथन

सक्रियता के साथ आलोचना भी आती है। कुछ लोगों ने इसे प्रसिद्धि का माध्यम कहा।

पर जिन्होंने उन्हें कीचड़ में उतरकर घायल पशु को उठाते देखा है, वे जानते हैं कि यह प्रदर्शन नहीं, परिश्रम है।

स्वयं वे कहते हैं—“यदि सेवा में स्वार्थ आ जाए, तो वह सेवा नहीं रह जाती।”

युवाओं के लिए संदेश

वे युवाओं से कहते हैं—“नेतृत्व से पहले सेवा सीखो।”

उनकी टीम में कई छात्र जुड़े हैं, जो सप्ताहांत में गौशाला की सफाई और उपचार में सहयोग करते हैं।

भविष्य की योजना

उनका सपना है—एक संगठित गौ संरक्षण केंद्र, जहां चिकित्सा, आश्रय और पुनर्वास की समुचित व्यवस्था हो।

वे चाहते हैं कि गौसेवा भावनात्मक नहीं, संस्थागत रूप ले।

“हम खबर को चीखने नहीं देंगे, असर छोड़ने देंगे।”
— संपादकीय दृष्टि, समाचार दर्पण

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: गोरखदास खडेसरी बाबा कितने वर्षों से गौसेवा में सक्रिय हैं?
उत्तर: वे पिछले लगभग 12 वर्षों से निरंतर गौसेवा और संरक्षण कार्यों में सक्रिय हैं।
प्रश्न 2: ‘खड़े श्री बाबा’ नाम क्यों प्रचलित हुआ?
उत्तर: दिन-रात खड़े रहकर आत्मिक तपस्या प्रारम्भ करने के कारण स्थानीय स्तर पर यह संबोधन प्रचलित हुआ।
प्रश्न 3: क्या उनका कार्य केवल धार्मिक आधार पर है?
उत्तर: नहीं। उनका कार्य सामाजिक, आर्थिक और मानवीय दृष्टिकोण से भी जुड़ा है।


Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top