देवरिया जनपद के भाटपार रानी कस्बे सहित आसपास के इलाकों में शब-ए-बरात पूरी अकीदत, एहतराम और रूहानी माहौल के साथ मनाई गई। यह रात इस्लाम धर्म में गुनाहों की माफी, दोज़ख़ से निजात और अल्लाह की रहमत हासिल करने की रात मानी जाती है। मंगलवार की रात से शुरू होकर पूरी रात मस्जिदों, कब्रिस्तानों और दरगाहों में नमाज़, कुरआन पाक की तिलावत, फ़ातिहा और दुआओं का सिलसिला चलता रहा। मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अपने और अपने उन परिजनों के लिए दुआ की, जो दुनिया से रुख़्सत हो चुके हैं, साथ ही देश में अमन और चैन की कामना की।
📿 इबादत, तिलावत और दुआओं से रौशन रही रात
भाटपार रानी जामा मस्जिद, क्षेत्र की अन्य मस्जिदों, ईदगाहों और कब्रिस्तानों में रात भर रौनक बनी रही। कहीं नफ़्ल नमाज़ अदा की जा रही थी, तो कहीं कुरआन पाक की तिलावत हो रही थी। लोग कब्रिस्तानों में जाकर अपने बुज़ुर्गों और रिश्तेदारों के लिए फ़ातिहा पढ़ते रहे। घरों में भी कुरआन की तिलावत और दुआओं का सिलसिला जारी रहा। महिलाओं ने नियाज़ और फ़ातिहा के लिए विभिन्न प्रकार के हलवे तैयार किए और उसे जरूरतमंदों में वितरित किया।
🕌 शब-ए-बरात का धार्मिक अर्थ और महत्व
‘शब’ का अर्थ रात और ‘बरात’ का अर्थ बरी होना या मुक्त होना है। इस प्रकार शब-ए-बरात वह रात मानी जाती है जिसमें अल्लाह अपने बंदों के गुनाह माफ़ करता है और रहमत की बारिश फरमाता है। यह रात इस्लामी कैलेंडर के आठवें महीने शाबान की पंद्रहवीं रात को आती है। रमज़ान शरीफ़ से ठीक पहले आने वाली यह रात आत्ममंथन, तौबा और नई शुरुआत का प्रतीक मानी जाती है।
📜 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : शब-ए-बरात का इतिहास
शब-ए-बरात का उल्लेख इस्लामी परंपराओं और हदीसों में मिलता है। माना जाता है कि शाबान की इस मुकद्दस रात में अल्लाह तआला अपनी खास रहमत अपने बंदों पर नाज़िल करता है। कई रिवायतों के अनुसार इसी रात आने वाले साल से जुड़े अमल और फैसले तय किए जाते हैं। इतिहासकारों के अनुसार अरब देशों के साथ-साथ ईरान, तुर्की और दक्षिण एशिया में भी यह रात सदियों से अकीदत के साथ मनाई जाती रही है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में यह रात सामूहिक इबादत, कब्रिस्तान जाने और नियाज़ बांटने की परंपरा के रूप में विशेष महत्व रखती है।
⚰️ कब्रिस्तान जाना और फ़ातिहा पढ़ने की परंपरा
शब-ए-बरात की रात कब्रिस्तान जाना इस्लामी परंपरा का अहम हिस्सा माना जाता है। इसका उद्देश्य मौत की सच्चाई को याद करना और अपनी आख़िरत के लिए तैयारी करना है। लोग अपने पूर्वजों और दिवंगत परिजनों के लिए मग़फ़िरत की दुआ करते हैं। यह परंपरा इंसान को विनम्र बनाती है और जीवन के अस्थायी स्वरूप का एहसास कराती है।
🗣️ हाफ़िज़ व क़ारी मुजीब अहमद का संदेश
भाटपार रानी जामा मस्जिद के हाफ़िज़ व क़ारी मुजीब अहमद ने कहा कि शब-ए-बरात केवल जागने या रस्म अदायगी तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यह रात आत्मशुद्धि और सामाजिक जिम्मेदारी की है। उन्होंने कहा कि इस मौके पर जरूरतमंदों की मदद करना बेहद जरूरी है। अगर कोई भूखा हो तो उसे खाना खिलाना चाहिए, चाहे वह किसी भी धर्म का हो। उन्होंने बताया कि कब्रिस्तानों में जाकर दुआ करना और अपनी आख़िरत को याद करना रसूल-ए-पाक की सुन्नत है।
🌙 शाबान और रमज़ान का आपसी संबंध
शब-ए-बरात शाबान के महीने में आती है, जिसे रमज़ान की तैयारी का महीना माना जाता है। इस रात के बाद इबादत का सिलसिला और तेज़ हो जाता है। कई लोग अगले दिन रोज़ा भी रखते हैं, जिसे बड़ी फ़ज़ीलत वाला माना गया है। यह रोज़ा आत्मसंयम और अल्लाह से नज़दीकी बढ़ाने का माध्यम है।
🤝 सामाजिक सौहार्द और इंसानियत का पैग़ाम
शब-ए-बरात केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का भी प्रतीक है। नियाज़ और भोजन बांटने की परंपरा आपसी भाईचारे को मज़बूत करती है। इस रात की इबादत के साथ इंसानियत, सहयोग और सद्भावना का संदेश समाज में फैलता है।
🕊️ अमन-चैन की दुआ और आत्ममंथन
इस मुकद्दस रात में लोगों ने देश में अमन-चैन, भाईचारे और शांति के लिए दुआएं मांगीं। शब-ए-बरात इंसान को अपने किए गए अमल पर सोचने, गलतियों से तौबा करने और बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देती है। यही इस रात का असली संदेश है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
शब-ए-बरात क्या है?
शब-ए-बरात इस्लाम धर्म की अहम रात है, जिसे गुनाहों की माफी और रहमत की रात माना जाता है।
शब-ए-बरात कब मनाई जाती है?
यह शाबान महीने की 15वीं रात को मनाई जाती है।
शब-ए-बरात की रात क्या करना चाहिए?
नमाज़, कुरआन की तिलावत, तौबा, दुआ, फ़ातिहा और जरूरतमंदों की मदद करनी चाहिए।
कब्रिस्तान जाना क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है?
कब्रिस्तान जाना मौत की सच्चाई को याद करने और दिवंगत आत्माओं के लिए दुआ करने का माध्यम है।






