योगी पर बयान पड़ा भारी — माफी तक अयोध्या में नहीं घुस पाएंगे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद

✍️दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट
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योगी पर बयान पड़ा भारी— अयोध्या पस्वी छावनी पीठाधीश्वर जगतगुरु परमहंस आचार्य का यह स्पष्ट और सख्त संदेश इन दिनों धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में तीखी बहस का कारण बन गया है। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर दिए गए कथित अपमानजनक बयान पर परमहंस आचार्य ने कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि जब तक स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगते और अपने शब्द वापस नहीं लेते, तब तक अयोध्या की पवित्र भूमि पर उनका प्रवेश स्वीकार्य नहीं होगा।

हूक प्वाइंट | समाचार सार

परमहंस आचार्य ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बयान को संत मर्यादा और सनातन संस्कृति के विरुद्ध बताया। योगी आदित्यनाथ पर टिप्पणी को लेकर उन्होंने अयोध्या प्रवेश पर रोक की चेतावनी देते हुए संत समाज की बैठक बुलाने के संकेत भी दिए।

योगी आदित्यनाथ को लेकर बयान बना विवाद की जड़

अयोध्या में दिए गए अपने बयान में जगतगुरु परमहंस आचार्य ने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को औरंगज़ेब और हुमायूं का बेटा कहना न केवल अत्यंत निंदनीय है, बल्कि यह भाषा एक संत या धर्माचार्य को कतई शोभा नहीं देती। उन्होंने दो टूक कहा कि इस तरह की अमर्यादित टिप्पणी न सिर्फ एक निर्वाचित मुख्यमंत्री का अपमान है, बल्कि इससे करोड़ों सनातन आस्थावानों की भावनाएं भी आहत होती हैं।

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परमहंस आचार्य के अनुसार, योगी आदित्यनाथ केवल एक राजनीतिक पद पर आसीन व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे आज सनातन संस्कृति, हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में भी देखे जाते हैं। ऐसे में उनके खिलाफ इस तरह की भाषा का प्रयोग संत परंपरा के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

अयोध्या केवल नगर नहीं, सनातन मर्यादा का केंद्र

परमहंस आचार्य ने अयोध्या की गरिमा पर जोर देते हुए कहा कि अयोध्या केवल एक शहर नहीं है, बल्कि यह मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की नगरी है, जहां शब्द, विचार और आचरण — तीनों में संयम अपेक्षित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो भी व्यक्ति अयोध्या की पवित्र भूमि पर आता है, उसे यहां की मर्यादा का पालन करना ही होगा।

उन्होंने कहा कि जब तक स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सार्वजनिक रूप से योगी आदित्यनाथ से माफी नहीं मांगते और अपने बयान वापस नहीं लेते, तब तक अयोध्या की धरती पर उनका प्रवेश स्वीकार नहीं किया जाएगा। यह निर्णय व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सनातन परंपरा की रक्षा के लिए लिया गया कदम है।

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संत समाज की भावनाएं आहत, समर्थन में उतरे कई महंत

परमहंस आचार्य के इस बयान के बाद संत समाज में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। कई संतों और महंतों ने उनके रुख का समर्थन करते हुए कहा कि संत समाज की मर्यादा सर्वोपरि है और कोई भी धर्माचार्य यदि सार्वजनिक मंच से अमर्यादित भाषा का प्रयोग करता है, तो उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

समर्थन करने वाले संतों का कहना है कि यदि आज इस तरह की भाषा को अनदेखा किया गया, तो आने वाले समय में संत समाज की गरिमा पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग जाएगा। वहीं, कुछ संतों ने यह भी कहा कि यह मामला केवल व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि पूरे संत समाज की छवि से जुड़ा हुआ है।

संवाद बनाम सख्ती — संत समाज दो राय में बंटा

हालांकि संत समाज का एक वर्ग ऐसा भी है, जो इस विवाद को संवाद के जरिए सुलझाने की बात कर रहा है। उनका कहना है कि आपसी मतभेदों को सार्वजनिक प्रतिबंध और निषेध की बजाय आपसी चर्चा से सुलझाया जाना चाहिए। लेकिन परमहंस आचार्य ने साफ कर दिया है कि मर्यादा के प्रश्न पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

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उन्होंने संकेत दिए कि यदि आवश्यकता पड़ी, तो संत समाज की एक व्यापक बैठक बुलाकर इस विषय पर सामूहिक निर्णय लिया जाएगा, ताकि भविष्य में इस तरह की परिस्थितियों से बचा जा सके।

राजनीतिक हलकों में भी दिखा बयान का असर

इस पूरे प्रकरण का असर राजनीतिक गलियारों में भी साफ नजर आने लगा है। सत्तारूढ़ दल से जुड़े नेताओं ने योगी आदित्यनाथ के समर्थन में बयान देते हुए परमहंस आचार्य की बातों को उचित ठहराया है। वहीं विपक्षी खेमे में इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अयोध्या जैसे संवेदनशील धार्मिक केंद्र से जुड़ा यह विवाद आने वाले समय में धार्मिक और राजनीतिक विमर्श का बड़ा मुद्दा बन सकता है।

अब निगाहें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की प्रतिक्रिया पर

फिलहाल अयोध्या में चर्चाओं का बाजार गर्म है और सभी की निगाहें अब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की प्रतिक्रिया पर टिकी हुई हैं। यह देखना अहम होगा कि वे माफी मांगकर विवाद को शांत करते हैं या फिर यह मामला और तूल पकड़ता है।

एक बात तय मानी जा रही है कि यह विवाद केवल एक बयान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह संत समाज, राजनीति और सनातन मर्यादा को लेकर लंबे विमर्श की जमीन तैयार कर चुका है।

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