प्रदेश में एक बार फिर शिक्षा व्यवस्था और नीतिगत निर्णयों को लेकर बहस तेज हो गई है। सेवारत शिक्षकों पर टीईटी (TET) अनिवार्यता लागू करने के आदेश के खिलाफ अब आंदोलन ने संगठित रूप ले लिया है। यूनाइटेड टीचर्स एसोसिएशन (यूटा) के प्रदेश अध्यक्ष राजेंद्र सिंह राठौर के आवाहन पर प्रदेश भर में शिक्षक विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और सरकार से स्पष्ट मांग कर रहे हैं कि वर्ष 2011 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को इस अनिवार्यता से राहत दी जाए।
इसी क्रम में दो अप्रैल 2026 को जिले में एक बड़ा मशाल जुलूस निकाला गया, जिसने इस मुद्दे को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया।
🔥 मशाल जुलूस: विरोध की तेज होती आवाज
यूटा के जिला अध्यक्ष डॉ. संग्राम सिंह के नेतृत्व में बड़ी संख्या में शिक्षक मिशन तिराहे पर एकत्र हुए। हाथों में मशालें और तख्तियां लिए शिक्षक जब सड़कों पर उतरे, तो यह केवल एक प्रदर्शन नहीं बल्कि वर्षों की पीड़ा और असंतोष की अभिव्यक्ति बन गया।
जुलूस शहीद पार्क एलआईसी तिराहे से शुरू होकर पटेल चौक तक निकाला गया, जिसमें सैकड़ों शिक्षकों ने भाग लिया। रास्ते भर शिक्षकों ने सरकार के खिलाफ नारे लगाए और अपनी मांगों को जोरदार तरीके से रखा।
📜 विवाद की जड़: TET अनिवार्यता का आदेश
पूरा विवाद उस आदेश को लेकर है, जिसमें आरटीई अधिनियम लागू होने से पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर भी टीईटी अनिवार्यता लागू करने की बात कही गई है।
शिक्षकों का तर्क है कि वे पहले से निर्धारित नियमों और मानकों को पूरा करके नियुक्त हुए थे। उस समय जो भर्ती प्रक्रियाएं लागू थीं, उन्हें सफलतापूर्वक पार कर वे शिक्षक बने। ऐसे में अब वर्षों बाद उन पर नई शर्तें लागू करना न्यायसंगत नहीं है।
🧠 अनुभवी शिक्षकों का सवाल
यूटा के जिला महामंत्री कासिफ इक़बाल ने इस मुद्दे पर स्पष्ट कहा कि वर्ष 2011 में पहली बार टीईटी परीक्षा आयोजित हुई थी। उससे पहले नियुक्त शिक्षक अपने समय के सभी मानकों को पूरा करके सेवा में आए थे।
उन्होंने कहा कि—“आज वही शिक्षक 15 से 35 वर्षों तक लगातार शिक्षण कार्य कर चुके हैं। उनका अनुभव ही उनकी सबसे बड़ी योग्यता है। ऐसे में उन पर फिर से परीक्षा का दबाव डालना न केवल अव्यवहारिक है बल्कि अन्याय भी है।”
⚖️ अध्यादेश की मांग क्यों?
शिक्षकों की मुख्य मांग यह है कि केंद्र सरकार के 23 अगस्त 2010 के नोटिफिकेशन और उत्तर प्रदेश सरकार के 27 जुलाई 2011 के टीईटी नोटिफिकेशन से पहले नियुक्त शिक्षकों को इस अनिवार्यता से बाहर रखा जाए।
इसके लिए वे सरकार से अध्यादेश लाने की मांग कर रहे हैं, ताकि लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों को राहत मिल सके और उनकी नौकरी पर कोई संकट न आए।
🤝 संगठनों की एकजुटता
इस आंदोलन की खास बात यह रही कि इसमें केवल एक संगठन नहीं, बल्कि विभिन्न शिक्षक संगठनों के सदस्य एकजुट होकर शामिल हुए।
शैलेंद्र सिंह, अतीक अहमद, अनिल सिंह, पुष्पेंद्र सिंह, राजेश सिंह, लवलेश कुशवाहा, जितेंद्र सिंह, महेश सिंह, आनंद यादव, आदित्य श्रीवास्तव, अमर बहादुर, कमलेश गुप्ता समेत सैकड़ों शिक्षकों की उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह मुद्दा अब व्यापक रूप ले चुका है।
📢 सरकार के सामने चुनौती
यह आंदोलन अब केवल एक प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था और नीति निर्माण के बीच संतुलन का सवाल बन गया है। सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह एक ओर गुणवत्ता बनाए रखे और दूसरी ओर अनुभवी शिक्षकों के हितों की रक्षा भी करे।
यदि इस मुद्दे पर जल्द समाधान नहीं निकला, तो यह आंदोलन और व्यापक हो सकता है।
📌 निष्कर्ष: अनुभव बनाम परीक्षा
इस पूरे विवाद का सार यही है कि क्या वर्षों का अनुभव किसी परीक्षा से कमतर है? क्या 15-35 साल तक पढ़ाने वाले शिक्षक अपनी योग्यता साबित करने के लिए फिर से परीक्षा देने को बाध्य किए जा सकते हैं?
शिक्षकों का आंदोलन इन सवालों को समाज और सरकार दोनों के सामने रख रहा है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस पर क्या निर्णय लेती है—क्या अनुभव को प्राथमिकता दी जाएगी या नियमों की सख्ती को बरकरार रखा जाएगा।
फिलहाल इतना तय है कि यह मुद्दा जल्दी शांत होने वाला नहीं है और आने वाले दिनों में यह आंदोलन और तेज हो सकता है।
FAQ (क्लिक करें)
TET अनिवार्यता को लेकर विवाद क्यों है?
विवाद इसलिए है क्योंकि 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों पर भी TET लागू करने की बात की जा रही है, जिसे शिक्षक अन्यायपूर्ण मानते हैं।
शिक्षकों की मुख्य मांग क्या है?
शिक्षक चाहते हैं कि 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों को TET अनिवार्यता से अध्यादेश के माध्यम से राहत दी जाए।
क्या यह आंदोलन पूरे प्रदेश में हो रहा है?
हाँ, यूटा के नेतृत्व में प्रदेशभर में शिक्षक इस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
सरकार की प्रतिक्रिया क्या है?
अब तक सरकार की ओर से कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है, लेकिन मामला चर्चा में है।





