चित्रकूट जिले की सरज़मीं एक बार फिर राजनीतिक हलचल के दौर में है। वर्ष 2026 के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है, और इस बार की सबसे बड़ी चर्चा का केंद्र बने हैं — युवा समाजसेवी और पत्रकार संजय सिंह राणा, जिन्होंने सपत्नीक मैदान में उतरने की घोषणा कर स्थानीय राजनीति में नया उत्साह भर दिया है।
उनकी इस घोषणा के बाद से न केवल पंचायत राजनीति में हलचल मची है, बल्कि गांव-गांव की चौपालों, चाय की दुकानों और सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर भी यही चर्चा है कि — क्या राणा की एंट्री ग्रामीण राजनीति का चेहरा बदल देगी?
🔸 एक नई राजनीतिक पारी की शुरुआत
संजय सिंह राणा, जिन्हें स्थानीय लोग उनके बेबाक विचारों और सामाजिक सरोकारों के लिए जानते हैं, लंबे समय से जन मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं। पत्रकारिता के माध्यम से उन्होंने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और गाँवों की आवाज़ को मुखर बनाया। अब वही राणा जनसेवा के पत्रकार से जनप्रतिनिधित्व के खिलाड़ी बनने की राह पर हैं।
“हम जनता के बीच से निकले हैं, जनता की बात हमेशा उठाई है। अब समय है कि जनता का नेतृत्व भी वही करे, जो उसकी समस्याओं को जमीनी स्तर पर समझता हो।” — संजय सिंह राणा
उनकी पत्नी शिव कांती संजय सिंह राणा भी पंचायत चुनाव में उतरने जा रही हैं — इस बार मैदान में एक नहीं बल्कि एक ‘सपत्नीक जनसेवी जोड़ी’ दिखेगी, जो स्थानीय राजनीति के परिदृश्य में नई दिशा दे सकती है।
🔸 17 सीटों पर उम्मीदवार — एक ‘लोकतांत्रिक प्रयोग’
संजय सिंह राणा ने केवल व्यक्तिगत दावेदारी तक खुद को सीमित नहीं रखा; उन्होंने जिले की सभी 17 ज़िला पंचायत सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की घोषणा की है। यह कदम एक स्वतंत्र राजनीतिक मंच बनाने की दिशा में एक बड़ा फैसला माना जा रहा है।
स्थानीय विश्लेषक इसे “राणा मॉडल” कहते हैं — एक ऐसा विकल्प जो पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को चुनौती दे सकता है और जन आधारित नेतृत्व की नई परिभाषा पेश कर सकता है।
“राणा ने जो किया है, वह चुनौती है — न केवल विरोधियों के लिए बल्कि उस सोच के लिए भी, जो मानती है कि सत्ता तक पहुंच केवल पुरानी जातीय-सामाजिक समीकरणों से ही संभव है।” — एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक, चित्रकूट
🔸 दलित-आदिवासी समाज में लोकप्रियता
राणा की सबसे बड़ी ताकत है उनकी दलित और आदिवासी समुदायों में लोकप्रियता। वर्षों से वे इन समुदायों के बीच रहकर शिक्षा, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और स्थानीय समस्याओं पर सक्रिय रहे हैं। उनके नेतृत्व में कई बार ग्रामीण समस्याओं, राशन वितरण, किसान बीमा, बिजली आपूर्ति, सड़क निर्माण और पंचायत मामलों पर धरने और ज्ञापन हुए हैं।
सीता राम (पहाड़ी ब्लॉक, चित्रकूट) कहती हैं: “हमारे गाँव में आज तक कोई ऐसा प्रतिनिधि नहीं आया जिसने हमें सुना हो। अगर राणा जी चुनाव लड़ रहे हैं, तो हम उन्हें मौका देंगे।”
🔸 पत्रकार से जनप्रतिनिधि — पारदर्शिता का वादा
पत्रकारीय पृष्ठभूमि राणा को अलग पहचान देती है। जन सरोकार आधारित रिपोर्टिंग के कारण उनकी खबरें अक्सर प्रशासन तक असर पहुंचाती रही हैं। राणा का मानना है कि पत्रकारिता और जनसेवा का मूल भाव एक है — जनता की सेवा और सत्ता से सवाल।
समर्थकों का दावा है कि ऐसे लोगों के आने से ग्राम स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी — जो पंचायत व्यवस्था के पुराने ढाँचे के लिये चुनौती है, जहाँ कई बार विकास केवल कागज़ों में रहा।
🔸 राणा का संदेश — ईमानदारी और संवाद
संजय सिंह राणा अपने भाषणों में बार-बार ईमानदारी, शिक्षा और संवाद की बात करते हैं और राजनीति को जाति-धन की परिभाषा से ऊपर उठाने का आग्रह करते हैं:
“हम राजनीति में सौदेबाज़ी नहीं, सेवा का भाव लेकर आए हैं। हमारी टीम का हर उम्मीदवार जनता के प्रति जवाबदेह रहेगा।” — संजय सिंह राणा
उनकी टीम युवा है और वे पंचायत चुनाव में सोशल मीडिया, जनसंवाद और घर-घर अभियान जैसी आधुनिक रणनीतियाँ अपनाने की बात कर रहे हैं — जो पारंपरिक चुनावी तरीकों से अलग है।
🔸 चुनाव रणनीति — ‘जनता के द्वार तक’ अभियान
राणा और उनकी टीम का मुख्य अभियान है — “जनता से संवाद, जनता के द्वार”। इस अभियान में हर गाँव तक पहुंचकर युवाओं, महिलाओं और किसानों से सीधे बात करना शामिल है। मुख्य मुद्दे हैं:
- गाँवों में शुद्ध पेयजल की उपलब्धता
- ग्राम सड़क सुधार योजनाओं का ठोस कार्यान्वयन
- स्कूलों की दशा में सुधार
- कृषि उपज पर न्यूनतम मूल्य सुनिश्चित करना
- ग्राम स्तर पर भ्रष्टाचार पर रोक
🔸 स्थानीय राजनीति में नई ऊर्जा
चित्रकूट की राजनीति अब तक पारंपरिक समीकरणों पर टिकी रही — जाति, प्रभावशाली परिवार और संसाधनवान उम्मीदवार ही नुमाइंदगी करते रहे। पर राणा की एंट्री ने युवा राजनीति और समाज सेवा के मेल का नया अध्याय शुरू कर दिया है।
राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि यदि यह प्रयोग सफल हुआ, तो चित्रकूट में आने वाले वर्षों में एक जन-आधारित लोकतांत्रिक मॉडल विकसित हो सकता है, जो देशभर के ग्रामीण लोकतंत्र के लिये मिसाल बन सकता है।
🔸 चुनौतियाँ
किसी भी नए राजनीतिक प्रयोग की तरह राणा के सामने भी चुनौतियाँ हैं — पारंपरिक गुटों का प्रतिरोध, संसाधनों की कमी, प्रशासनिक अड़चनें और स्थानीय जातीय समीकरण। विपक्ष उनकी रणनीति पर बारीकी से नजर रखे हुए है।
फिर भी, समर्थकों का विश्वास है: “जो आदमी सच्चाई की कलम चलाने से नहीं डरा, वो चुनावी मैदान की धूल से क्यों डरेगा?”
🔸 युवाओं और समाजसेवियों के लिए प्रेरणा
राणा की पहल केवल एक चुनावी घोषणा नहीं — यह संदेश है कि युवा राजनीति को ईमानदारी, संघर्ष और जनसेवा का माध्यम बना सकते हैं। जब गांव का युवा आगे आता है, तभी सच्चे लोकतंत्र की नींव मजबूत होती है।
“राजनीति में बदलाव ऊपर से नहीं, नीचे से आता है।” — पंडित गोविंद मिश्र (सामाजिक चिंतक)
चित्रकूट के पंचायत चुनाव 2026 अब केवल सत्ता की लड़ाई नहीं रहे — यह एक सोच की परीक्षा बन चुके हैं। संजय सिंह राणा जैसे समाजसेवी पत्रकारों की भागीदारी दिखाती है कि राजनीति छोटे गाँवों तक भी परिवर्तन की शक्ति रखती है। यदि जनता ने इस नए प्रयोग को अपनाया, तो चित्रकूट आने वाले वर्षों में देशभर के ग्रामीण लोकतंत्र के लिए एक उदाहरण बन सकता है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल — (क्लिक करें)
1. संजय सिंह राणा कौन हैं?
संजय सिंह राणा स्थानीय पत्रकार और समाजसेवी हैं। उन्होंने वर्षों से जन मुद्दों और ग्रामीण समस्याओं को उठाया है और अब वे पंचायत चुनाव 2026 में सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं।
2. ‘सपत्नीक’ दावेदारी का क्या मतलब है?
यहाँ ‘सपत्नीक’ से आशय है कि संजय सिंह राणा और उनकी पत्नी शिव कांती — दोनों ही अलग-अलग पदों/सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं; यानी यह एक जोड़ी के रूप में चुनावी भागीदारी का संकेत है।
3. 17 सीटों पर उम्मीदवार क्यों उतारे जा रहे हैं?
राणा का उद्देश्य पूरा ज़िला पंचायत स्तर पर एक समन्वित वैकल्पिक मंच खड़ा करना है ताकि स्थानीय नेतृत्व और जन-आधारित नीतियाँ प्रभावी ढंग से लागू की जा सकें।
4. क्या यह मॉडल अन्य जिलों में भी लागू हो सकता है?
यदि यह प्रयोग सफल होता है और स्थानीय समस्याओं का असरदार समाधान दिखता है, तो अन्य जिलों के लिए यह प्रेरणादायक मॉडल बन सकता है। खासकर जहाँ युवा और समाजसेवी सक्रिय हैं।









