गौशालाएं या घोटालों के अड्डे? करोड़ों के बजट में ताले, भूख और मौत का सच


🎤संजय सिंह राणा की रिपोर्ट

यूपी के चित्रकूट जनपद के रामनगर ब्लॉक मुख्यालय स्थित राम जानकी नवजीवन दिव्यांग विकास संगठन द्वारा संचालित गौ आश्रय केंद्र—नाम सुनते ही एक ऐसी जगह की कल्पना होती है, जहाँ असहाय गौवंशों को सुरक्षा, भोजन और देखभाल मिलती हो। लेकिन 23 मार्च 2026 को जब सहायक विकास अधिकारी (ग्राम विकास) जीवनलाल यहाँ निरीक्षण के लिए पहुँचे, तो जो तस्वीर सामने आई, उसने इस “कल्पना” और “वास्तविकता” के बीच की दूरी को उजागर कर दिया।

गौशाला बंद थी। ताला लटका हुआ था। और जिन गौवंशों को आश्रय मिलना था, वे खुले में भटक रहे थे। यह कोई एक दिन की चूक नहीं थी, बल्कि एक व्यवस्थित लापरवाही का संकेत था।

जब गौशाला ही खुला चरागाह बन जाए

चरवाहों ने जो बताया, वह इस व्यवस्था की जड़ तक जाता है— गौवंशों को रोज सुबह लगभग 10 बजे बाहर चराने के लिए छोड़ दिया जाता है और शाम करीब 5 बजे वापस लाया जाता है। अब इसे सामान्य पशुपालन की प्रक्रिया कहकर टाला जा सकता है, लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर है— यह कोई निजी पशुपालन केंद्र नहीं, बल्कि सरकारी सहायता से संचालित गौ आश्रय केंद्र है।

ऐसे में सवाल उठता है— अगर दिन भर पशु बाहर ही रहेंगे, तो “आश्रय” शब्द का अर्थ क्या रह जाता है? आश्रय केवल एक बाड़ा नहीं होता, वह एक सतत देखभाल की व्यवस्था होती है— जो यहाँ स्पष्ट रूप से अनुपस्थित थी।

See also  समरसता की नई मिसाल:छात्रावास में बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमा का हुआ अनावरण

पानी, चारा और छांव—तीनों का अभाव

निरीक्षण में यह पाया गया कि गौशाला में— चारे की नियमित व्यवस्था नहीं थी, स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता अपर्याप्त थी, और ग्रीष्म ऋतु को ध्यान में रखते हुए कोई ठोस इंतज़ाम नहीं किया गया था। अब इस स्थिति को केवल “अव्यवस्था” कह देना पर्याप्त नहीं है।

क्योंकि गर्मी के मौसम में पानी की कमी केवल असुविधा नहीं, बल्कि जीवन के लिए खतरा बन जाती है। गौवंश, जो पूरी तरह इस व्यवस्था पर निर्भर हैं, अगर उन्हें समय पर पानी और भोजन न मिले— तो यह सीधे-सीधे उनके जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।

ताला बंद गौशाला: सबसे बड़ा संकेत

निरीक्षण के दौरान सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि गौशाला में कोई केयरटेकर मौजूद नहीं था और पूरा परिसर ताले में बंद मिला। अब यह केवल एक प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि पूरी प्रणाली पर सवाल है।

क्या निगरानी नहीं हो रही? क्या जिम्मेदारी तय नहीं है? या फिर जिम्मेदारी होते हुए भी निभाई नहीं जा रही? ताला केवल दरवाज़े पर नहीं था, वह जिम्मेदारी पर भी लगा हुआ प्रतीत होता है।

पैसा आ रहा है… लेकिन जा कहाँ रहा है?

अब बात करते हैं उस पहलू की, जो इस पूरे मामले को और गंभीर बना देता है— शासकीय धनराशि। सरकार द्वारा प्रति गौवंश प्रतिदिन औसतन 30 से 50 रुपये तक की राशि भरण-पोषण के लिए दी जाती है।

अब अगर— पानी नहीं है, चारा नहीं है, देखभाल नहीं है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है— यह पैसा कहाँ खर्च हो रहा है? यहीं से मामला केवल “प्रबंधन” का नहीं रहता, बल्कि “जवाबदेही” का बन जाता है।

See also  याद-ए-शोहदा: बड़ा इमामबाड़ा बना इंसानियत का मंचहजारों लोगों ने दी श्रद्धांजलि, एकता और भाईचारे का संदेश

⚠️ पहले भी चेतावनी… फिर भी वही हाल

इस गौशाला की स्थिति पहली बार सामने नहीं आई है। पहले भी निरीक्षण के दौरान इसी तरह की अनियमितताएं पाई गई थीं। निर्देश दिए गए थे, व्यवस्था सुधारने के लिए। लेकिन जब बार-बार चेतावनी के बावजूद स्थिति नहीं बदलती, तो यह केवल एक व्यक्ति की गलती नहीं रहती— यह पूरे मॉनिटरिंग सिस्टम की विफलता बन जाती है।

अब तस्वीर को राष्ट्रीय स्तर पर देखिए

अगर कोई यह सोचता है कि यह केवल एक गौशाला की समस्या है, तो वह अधूरी तस्वीर देख रहा है। उत्तर प्रदेश में 2000 करोड़ रुपये से अधिक का बजट और हजारों गौशालाएं संचालित हैं— लेकिन कहीं भी स्पष्ट लेखा-जोखा नजर नहीं आता।

राजस्थान में भी हजारों करोड़ खर्च हो चुके हैं, हरियाणा में बजट कई गुना बढ़ाया गया है, और मध्य प्रदेश व गुजरात में आयोग और योजनाएं मौजूद हैं— फिर भी जमीनी सच्चाई मिश्रित क्यों है? इतना पैसा होने के बावजूद समस्या खत्म क्यों नहीं हो रही?

तीन बड़े कारण जो तस्वीर साफ करते हैं

1. निगरानी का अभाव— निरीक्षण होते हैं, लेकिन सुधार सुनिश्चित नहीं होता।
2. जवाबदेही का संकट— जिम्मेदारी तय नहीं या निभाई नहीं जाती।
3. स्थानीय भागीदारी की कमी— गौशालाएं समाज से जुड़ नहीं पातीं।

क्या गौशाला बोझ है या अवसर?

गौशाला को केवल खर्च के रूप में देखना एक अधूरा दृष्टिकोण है। अगर सही तरीके से संचालित किया जाए, तो यह जैविक खेती, गोबर गैस उत्पादन और ग्रामीण रोजगार का बड़ा केंद्र बन सकती है।

संवेदना: जो सबसे ज्यादा गायब है

इस पूरी चर्चा में एक चीज़ बार-बार छूटती दिखती है— संवेदना। जब गौशाला ताले में बंद मिलती है, तो यह केवल प्रशासनिक गलती नहीं होती, बल्कि एक नैतिक विफलता होती है।

See also  अफवाहों ने बढ़ा दी यूपी में इंधन की तपिश,बातों ही बातों में बिक्री में भारी उछाल

निष्कर्ष: सवाल जो टल नहीं सकते

चित्रकूट का रामनगर केवल एक उदाहरण है, लेकिन यह पूरे सिस्टम की कहानी कहता है। पैसा है, योजना है, ढांचा है— लेकिन जमीन पर हालात खराब हैं। अगर “आश्रय” ही असुरक्षित हो जाए, तो संरक्षण केवल शब्द बनकर रह जाता है।

अब समय है— सवाल पूछने का नहीं, जवाब तय करने का।

FAQ

गौशाला में सबसे बड़ी समस्या क्या पाई गई?

निरीक्षण में गौशाला बंद मिली, चारा-पानी की कमी और केयरटेकर की अनुपस्थिति सबसे बड़ी समस्याएं रहीं।

सरकार गौशालाओं के लिए कितनी राशि देती है?

प्रति गौवंश प्रतिदिन लगभग 30 से 50 रुपये तक की राशि भरण-पोषण के लिए दी जाती है।

इस समस्या का समाधान क्या हो सकता है?

निगरानी मजबूत करना, जवाबदेही तय करना और स्थानीय भागीदारी बढ़ाना इसके प्रमुख समाधान हैं।

[metaslider id="311"]

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

जयरामनगर मंडल में भाजपा का स्थापना दिवस उत्सव: गांव-बस्ती चलो अभियान के साथ संगठन ने बढ़ाया जनसंपर्क

🎤हरीश चन्द्र गुप्ता की रिपोर्टसीपत क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी के 47वें स्थापना दिवस के अवसर पर जयरामनगर मंडल के अंतर्गत गांव-बस्ती चलो अभियान...

दरियाबाद में सियासी संग्राम: सतीश शर्मा बनाम अरविंद गोप, 2027 की लड़ाई अभी से तेज

🎤अनुराग गुप्ता की रिपोर्टउत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 भले ही अभी दूर हो, लेकिन बाराबंकी जिले की दरियाबाद विधानसभा सीट पर सियासी तापमान अभी...

“समाचार दर्पण 24” का अध्याय समाप्त, अब ‘जनगणदूत’ लिखेगा नई कहानी

✍️ विशेष संपादकीय अनिल अनूप समय कभी ठहरता नहीं। वह निरंतर बहता रहता है—कभी शांत नदी की तरह, तो कभी उफनती धारा बनकर। पत्रकारिता भी...

भीम आर्मी का विस्तार चित्रकूट में नए जिला अध्यक्ष की नियुक्ति, खरसेंडा कांड को लेकर बढ़ी सक्रियता

✍️ संजय सिंह राणा की रिपोर्टचित्रकूट जनपद में सामाजिक न्याय की आवाज़ को और मजबूती देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए...