“लल्ला, अब तो जिंदगानी के बस कछू दिन रहि गए हैं…” —112 साल की राममूर्ति देवी की डीएम से मार्मिक गुहार

मथुरा डीएम कार्यालय में 112 वर्षीय राममूर्ति देवी वृद्धावस्था पेंशन की मांग करते हुए, सामने बैठे जिलाधिकारी चंद्र प्रकाश सिंह

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✍️ इरफान अली लारी की रिपोर्ट

“लल्ला, अब तो जिंदगानी के बस कछू दिन रहि गए हैं… हमारो भी बुढ़ापा पेंशन लगवा देओ”

मथुरा के जिलाधिकारी कार्यालय में सोमवार का दिन सामान्य था। फाइलों की आवाजाही, फरियादियों की कतारें और सरकारी कामकाज की वही नियमित गति। लेकिन इसी भीड़ में एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति को कुछ पल के लिए ठिठकने पर मजबूर कर दिया।

एक दुबली-पतली, झुर्रियों से भरा चेहरा… उम्र पूरी 112 साल। नाम—राममूर्ति देवी। सिर पर हल्की-सी ओढ़नी, आंखों में वर्षों की थकान और फिर भी उम्मीद की एक अंतिम चमक।

राममूर्ति देवी अपने नाती की बहू के सहारे जिलाधिकारी चंद्र प्रकाश सिंह के पास पहुंचीं। उम्र इतनी कि हर कदम जैसे समय से लड़कर उठता हो। लेकिन फिर भी वह आई थीं—क्योंकि उनके जीवन की एक छोटी-सी जरूरत अब तक अधूरी थी… वृद्धावस्था पेंशन

📌 डीएम कार्यालय में भावुक क्षण

जैसे ही जिलाधिकारी चंद्र प्रकाश सिंह की नजर उस बुजुर्ग महिला पर पड़ी, वे तुरंत अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए। प्रशासनिक औपचारिकता की जगह उस क्षण मानवीय संवेदना सामने आ गई। उन्होंने आदर के साथ राममूर्ति देवी को बैठाया और बहुत ही स्नेह से पूछा—

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“माई, बताइए… का परेशानी है?”

राममूर्ति देवी की आवाज़ कांप रही थी। उम्र के साथ शब्द भी जैसे धीरे-धीरे बाहर आ रहे थे। उन्होंने जिलाधिकारी की ओर देखते हुए कहा—

“लल्ला, अब तो जिंदगानी के बस कछू दिन रहि गए हैं… हमारो भी बुढ़ापा पेंशन लगवा देओ।”

यह वाक्य सुनते ही कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। यह केवल एक आवेदन नहीं था, बल्कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर खड़ी एक बुजुर्ग मां की पुकार थी।

🌿 एक सदी से भी लंबा जीवन

राममूर्ति देवी ने अपनी जिंदगी के 112 साल पूरे कर लिए हैं। यह वह उम्र है जिसमें इंसान एक पूरा इतिहास जी चुका होता है। उन्होंने शायद वह समय भी देखा होगा जब गांवों में बिजली नहीं थी, सड़कें नहीं थीं और जीवन की रफ्तार बिल्कुल अलग थी।

उन्होंने कई पीढ़ियों को बड़ा होते देखा होगा—बच्चों को जवान होते, घर बसाते और समय के साथ दुनिया बदलते देखा होगा। लेकिन इतने लंबे जीवन के बाद भी सरकारी योजनाओं का लाभ उनके जीवन तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया।

बुढ़ापे की इस अवस्था में उनका सहारा केवल परिवार और समाज की संवेदना ही होती है। ऐसे में वृद्धावस्था पेंशन जैसी योजनाएं उनके लिए आर्थिक सहायता के साथ-साथ सम्मान का प्रतीक भी होती हैं।

⚖️ जिलाधिकारी ने सुनी पूरी बात

जिलाधिकारी चंद्र प्रकाश सिंह ने राममूर्ति देवी की पूरी बात बहुत ध्यान से सुनी। उस समय उनके चेहरे पर एक अधिकारी की औपचारिकता से अधिक एक बेटे की संवेदना दिखाई दे रही थी।

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उन्होंने तुरंत संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि राममूर्ति देवी के प्रकरण की जांच कराई जाए और यदि वे पात्र हैं तो उनकी वृद्धावस्था पेंशन तत्काल शुरू कराई जाए।

जिलाधिकारी ने अधिकारियों से कहा कि बुजुर्गों और जरूरतमंद लोगों के मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निस्तारित किया जाना चाहिए, क्योंकि यह केवल एक योजना नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है।

🏡 ग्रामीण समाज की सच्चाई

राममूर्ति देवी की कहानी केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं है। यह ग्रामीण समाज की उस सच्चाई को भी सामने लाती है, जहां कई बार योजनाएं कागजों पर तो बन जाती हैं लेकिन उनके लाभार्थियों तक पहुंचने में देर हो जाती है।

गांवों में ऐसे कई बुजुर्ग मिल जाएंगे जो पूरी जिंदगी मेहनत करते हुए गुजार देते हैं, लेकिन बुढ़ापे में उन्हें सरकारी योजनाओं की जानकारी या उनका लाभ समय पर नहीं मिल पाता।

ऐसे मामलों में प्रशासनिक सतर्कता और जनसुनवाई जैसी व्यवस्थाएं बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

🤝 मानवीयता का एक छोटा-सा दृश्य

मथुरा के डीएम कार्यालय में उस दिन जो दृश्य सामने आया, वह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं थी। वह एक भावनात्मक संवाद था—एक बूढ़ी मां की उम्मीद और व्यवस्था की जिम्मेदारी के बीच का संवाद।

राममूर्ति देवी जब वहां बैठी थीं, तो उनकी आंखों में जीवन की थकान साफ दिखाई दे रही थी। लेकिन उनके चेहरे पर एक विश्वास भी था कि शायद अब उनकी बात सुनी जाएगी।

वह बार-बार जिलाधिकारी की ओर देखतीं और धीरे-धीरे अपनी बात दोहरातीं—

“लल्ला, अब तो जिंदगानी के बस कछू दिन रहि गए हैं…”

उनके शब्दों में शिकायत कम और उम्मीद ज्यादा थी।

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❗ समाज के लिए एक सवाल

यह घटना हमें एक बड़ा सवाल भी देती है। क्या किसी बुजुर्ग को अपने जीवन के अंतिम पड़ाव तक इंतजार करना चाहिए, सिर्फ इसलिए कि उसे उसकी वृद्धावस्था पेंशन मिल सके?

सरकार की योजनाएं तभी सफल मानी जाती हैं जब उनका लाभ सही समय पर सही व्यक्ति तक पहुंचे। बुजुर्गों के लिए बनाई गई योजनाओं का उद्देश्य ही यही है कि वे अपने जीवन के अंतिम वर्षों को सम्मान और सुरक्षा के साथ गुजार सकें।

🌅 उम्मीद की एक किरण

राममूर्ति देवी जब डीएम कार्यालय से बाहर निकलीं, तो उनके कदम पहले की तरह धीमे थे, लेकिन उनके चेहरे पर एक हल्की-सी उम्मीद दिखाई दे रही थी।

शायद उन्हें लगा कि इतने वर्षों के बाद उनकी आवाज़ आखिर किसी ने सुनी है।

मथुरा के जिलाधिकारी कार्यालय में उस दिन जो दृश्य बना, वह केवल एक खबर नहीं है। वह उस संवेदना की झलक है जो प्रशासन और समाज के बीच भरोसे की डोर को मजबूत करती है।

और शायद उस दिन वहां मौजूद हर व्यक्ति के मन में एक ही बात उठी होगी—

अगर व्यवस्था सच में संवेदनशील हो जाए, तो किसी राममूर्ति देवी को अपनी आखिरी सांसों तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

❓FAQ

राममूर्ति देवी की उम्र कितनी है?

राममूर्ति देवी की उम्र लगभग 112 वर्ष बताई जा रही है।

राममूर्ति देवी डीएम कार्यालय क्यों पहुंचीं?

वह अपनी वृद्धावस्था पेंशन शुरू कराने की मांग को लेकर जिलाधिकारी से मिलने पहुंचीं।

जिलाधिकारी ने क्या निर्देश दिए?

जिलाधिकारी ने संबंधित अधिकारियों को मामले की जांच कर पात्रता के आधार पर तत्काल पेंशन शुरू कराने के निर्देश दिए।

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