
🌸 फागुन की हवा और शब्दों का रंग
फागुन की सांझ जब अपने आंचल में हल्की सुनहरी धूप समेटती है, तब हवा भी बदल जाती है। उसमें अबीर की गंध घुलती है, ढोल की थाप का कंपन उतरता है और मन के भीतर कहीं एक पुराना गीत जाग उठता है। गलियों में हँसी उड़ती है, छतों पर रंग बरसते हैं और आँगनों में होलिका की अग्नि की लौ आसमान से संवाद करती है। ऐसे क्षण में लगता है कि केवल देह ही नहीं, शब्द भी रंग मांग रहे हैं। इसलिए इस बार हमने सोचा—क्यों न शब्दों की एक मुट्ठी भी हवा में उछाली जाए। क्योंकि कभी-कभी रंग से अधिक असर शब्द छोड़ जाते हैं। और जब शब्द उड़ते हैं, तो वे केवल दृश्य नहीं रचते, वे स्मृति जगाते हैं।
🎨 विरहन की वह धीमी पुकार
इसी स्मृति के भीतर से एक स्वर उठता है—“कदी या मिल यार…” यह केवल विरहन की आवाज़ नहीं; यह हर उस मन की पुकार है जिसने कभी प्रतीक्षा को जिया है। होली मिलन का उत्सव है, पर वह विरह की स्मृति को भी उजागर करती है। जो पास हैं, वे रंगों में भीगते हैं; जो दूर हैं, वे स्मरण में। कभी भीड़ के बीच भी कोई अकेला होता है। उसके गाल पर भी रंग लगा होता है, पर उसकी आँखें किसी एक चेहरे को ढूँढ रही होती हैं। वही विरहन है—जो कुहककर कह उठती है—“कदी या मिल यार…” यह पंक्ति शिकायत नहीं, विश्वास है; यह तड़प नहीं, उम्मीद है।
🔥 रंगों का सामाजिक अर्थ
होली की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह भेद मिटाती है। गुलाल चेहरों की पहचान ढक देता है। अबीर दूरी का हिसाब नहीं रखता। रंग यह नहीं पूछते कि तुम कौन हो—वे बस छू लेते हैं। यही इस पर्व की आत्मा है—समता, सहजता और समर्पण। परंतु मन की दूरी रंगों से तुरंत नहीं मिटती। उसे मिटाने के लिए साहस चाहिए—पहला कदम बढ़ाने का। इसीलिए इस बार होली केवल उत्सव न बने—एक अवसर बने। किसी रूठे को मनाने का, किसी दूर गए को याद करने का, किसी प्रतीक्षा को छोटा करने का।
🌼 शब्द, स्मृति और जिम्मेदारी
समाचार दर्पण का विश्वास रहा है कि खबर केवल सूचना नहीं, संवेदना भी होती है। और होली के इस अवसर पर हम आपको यही संवेदना सौंपना चाहते हैं—कि जीवन का असली रंग संबंधों में है। लाल केवल प्रेम का रंग नहीं, साहस का भी है। हरा केवल प्रकृति का नहीं, आशा का भी है। पीला केवल उल्लास का नहीं, विश्वास का भी है। जब ये सारे रंग एक साथ उड़ते हैं, तब जीवन का कैनवास पूर्ण होता है। जैसे रंग साफ और सच्चे होते हैं, वैसे ही हमारी पत्रकारिता भी स्पष्ट और निष्पक्ष रहेगी। हम खबर को शोर नहीं बनने देंगे; उसे अर्थ और असर के साथ आपके सामने रखेंगे।
💫 होली—उत्सव से अनुभव तक
फागुन हर वर्ष आएगा। रंग हर वर्ष उड़ेंगे। पर हर बार हमें यह अवसर नहीं मिलेगा कि हम सचमुच किसी को गले लगाएँ। इसलिए इस बार होली को केवल खेलिए मत—जी लीजिए। रंगों को केवल उड़ाइए मत—सहेज लीजिए। यदि कोई दूर है—उसे याद कीजिए। यदि कोई रूठा है—उसे पुकारिए। यदि कोई प्रतीक्षा में है—उसे संदेश भेजिए। क्योंकि होली केवल रंगों की नहीं, संबंधों की पुनर्रचना का पर्व है। जब शब्दों ने उड़ाया गुलाल, हमने देखा—मन की धूल झरने लगी, पुरानी गांठें ढीली होने लगीं और कहीं दूर कोई मुस्कुराकर बोली—“कदी या मिल यार…” यही इस पर्व की सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि है—उत्सव और आत्ममंथन का संतुलन।


कुछ लेख दिल की गहराई में उतर कर यादों को भावना में बदल देते हैं। हर किरदार की अपनी कहानी हैं और लेख पढ़कर कुछ मेहसूस हो तो वो लेख नहीं दिल की आवाज़ होती हैं।
बहुत खूबसूरत लेख लिखा हैं अपने।
“कदी या मिल यार “आलेख प्रकृति और प्राणियों के आलौकिक संबंधों की अतुल्य
मार्मिक दृष्टीगोचर होता हैं। होली के इन्द्र धनुषी रंग जीवन के अमर संबंधों को केवल फलीभूत ही नहीं करती बल्की उन्हें सदाबहार की सौगात भी देती हैं। लेखक द्वारा प्रकृति के हर पक्ष के माध्यम से मानव जीवन में समरसता भरने लाजवाब संदेश दिया हैं।