बरसाना की लठमार होली :
जहाँ रंग से पहले राधा का स्वाभिमान उतरता है

✍️ठाकुर के के सिंह

समाचार सार : बरसाना की लठमार होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि राधा के स्वाभिमान, ब्रज संस्कृति और प्रेम में प्रतिरोध की जीवित परंपरा है।

“आजु ब्रज में होरी रे रसिया; फागुन आयो, मनवा रंगायो — रंग में भक्ति, भक्ति में ब्रज।’’

फाल्गुन की धूप में एक अलग तरह की चमक होती है। वह सर्दी की तरह ठंडी नहीं और जेठ की तरह झुलसाती भी नहीं। वही धूप जब बरसाने की गलियों पर पड़ती है तो लगता है जैसे मिट्टी भी गुलाल में बदल गई हो।

आज बरसाने में तैयारी है। रसिक जन उमड़े हैं। ढोल की थाप दूर से सुनाई दे रही है। और चौक-चौराहों पर लकड़ी के लठ्ठ सजे हुए हैं। हाँ, वही लठ्ठ — जिनसे होली खेली जाएगी।

पौराणिक कथा का आधार

लठमार होली केवल उत्सव नहीं, एक स्मृति है। कथा कहती है कि नंदगाँव के श्याम अपने सखाओं के साथ बरसाने आए थे। चंचल स्वभाव के कृष्ण ने राधा और उनकी सखियों को रंगने की ठानी। बरसाने की सखियाँ भला चुप कैसे रहतीं? उन्होंने लठ्ठ उठाए और कृष्ण तथा उनके सखाओं को खदेड़ दिया।

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यह कथा केवल हास्य नहीं, प्रतीक है। यह प्रेम में प्रतिरोध का प्रतीक है। यह बताती है कि ब्रज की परंपरा में स्त्री निष्क्रिय नहीं — उत्तर देने वाली है। इसी स्मृति को आज भी जीवित रखा गया है।

परंपरा ने इसे क्यों स्वीकार किया?

होली स्वयं ही सामाजिक बंधनों को हल्का करने का पर्व है। ब्रज में यह और खुल जाता है। लठमार होली में पुरुष ढाल लेकर आते हैं। महिलाएँ लठ्ठ चलाती हैं। यह खेल है, पर अनुशासन के साथ। सदियों से यह परंपरा इसलिए बची रही क्योंकि इसमें मर्यादा है। यह उन्माद नहीं, नियंत्रित उल्लास है।

ब्रज की संस्कृति ने इसे इसलिए स्वीकार किया क्योंकि यह केवल रंग का आदान-प्रदान नहीं, भूमिका परिवर्तन का क्षण है। एक दिन के लिए शक्ति का संतुलन बदलता है। हँसी के बीच सामाजिक संदेश भी चलता है।

तैयारी का दिन

बरसाने की गलियों में आज रसिक जन उमड़े हैं। साड़ी के पल्लू में गुलाल बंधा है। पुरुष सफेद कुर्ते में, सिर पर पगड़ी बाँधे, ढाल लिए तैयार हैं। मंदिरों में केसर-चंदन की सुगंध है। राधारानी मंदिर के सीढ़ियों पर भीड़ है। “राधे-राधे” की पुकार हवा में घुली है। ढोलक की थाप पर फाग गूँजता है —
“आज बिरज में होरी रे रसिया…” और तभी चौक में पहला लठ्ठ उठता है।

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लठ्ठ और ढाल का संवाद

यह मार क्रोध की नहीं, अभिनय की है। पुरुष ढाल लेकर आगे आते हैं। महिलाएँ मुस्कुराकर वार करती हैं। लठ्ठ ढाल से टकराता है —ठक… ठक… ठक…
भीड़ हँसती है। रंग उड़ता है। यह दृश्य बाहर से देखने पर उग्र लग सकता है, पर भीतर एक तालमेल है। बरसाने की लठमार होली में चोट नहीं, चुनौती है। अभिनय है। और प्रेम की छेड़छाड़ है।

सांस्कृतिक और सामाजिक अर्थ

यह उत्सव ब्रज की सामूहिक स्मृति का हिस्सा है। यह बताता है कि परंपरा केवल कथा नहीं, क्रिया भी है। लठमार होली में स्त्री-पुरुष के संबंधों का एक प्रतीकात्मक पुनर्पाठ है। यह दिखाता है कि ब्रज में प्रेम बराबरी के साथ खेला जाता है।

होली के दिन समाज की परतें हल्की हो जाती हैं। राजा और रंक एक साथ रंगे जाते हैं। धन और पद की रेखाएँ धुंधली पड़ती हैं।

धार्मिक आयाम

ब्रज में होली केवल उत्सव नहीं, भक्ति का विस्तार है। राधा-कृष्ण की लीला का पुनर्स्मरण है। जब लठ्ठ उठता है तो वह हिंसा नहीं, लीला की पुनरावृत्ति है। जब ढाल झुकती है तो वह पराजय नहीं, स्वीकार है। यह लीला भक्त और भगवान के बीच भी है — जहाँ भगवान भी छेड़ते हैं, और भक्त भी उत्तर देते हैं।

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आधुनिक समय में लठमार

आज प्रशासन व्यवस्था संभालता है। भीड़ नियंत्रण होता है। परंपरा को सुरक्षित रखने के प्रयास होते हैं। पर असली रंग तब आता है जब गली में अचानक कोई बुजुर्ग कह उठता है —
“अरे, लठ्ठ जोर से चला!” और पूरा चौक हँसी से भर जाता है।

शब्दों में रंग

बरसाने की लठमार होली को केवल देखा नहीं जाता, महसूस किया जाता है।
लाल, गुलाबी, पीले रंग हवा में घुलते हैं। ढोलक की थाप दिल की धड़कन से मेल खाती है। और गुस्ताख दिल सोचता है —
यह उत्सव इसलिए बचा है क्योंकि इसमें कथा है, मर्यादा है, और सामूहिक आनंद है।

सूरज ढल रहा है। गुलाल से रंगे चेहरे पहचान से बाहर हैं। पर मुस्कान साफ़ दिखती है। राधा के नगर में आज फिर श्याम को लठ्ठ पड़े। पर कोई नाराज़ नहीं। क्योंकि यह मार प्रेम की है।

और यही बरसाना है — जहाँ होली केवल खेली नहीं जाती, जी जाती है। 💛

वरिष्ठ लेखक एवं प्रधान संपादक अनिल अनूप को वैदिक प्रकाशन द्वारा प्रदान किया गया अविरल साहित्य शिरोमणि सम्मान 2026 का प्रशस्ति पत्र
वैदिक प्रकाशन के “अविरल पत्रिका फ़रवरी विशेषांक 2026” में वरिष्ठ लेखक अनिल अनूप को “अविरल साहित्य शिरोमणि सम्मान 2026” से सम्मानित किया गया।

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