✍️संजय सिंह राणा
हूक प्वाइंट : चित्रकूट की पहाड़ियों, पाठा के आदिवासी जीवन, जल संकट, पलायन और आस्था के बीच दर्ज तीसरी गुस्ताखी — जहाँ विश्वास स्थायी है पर व्यवस्था अब भी अस्थिर।
तीसरी गुस्ताखी : चित्रकूट — आस्था, पहाड़ और प्यास का संगम
चित्रकूट की पहाड़ियों के बीच जब शाम उतरती है तो लगता है जैसे सूरज भी धीरे-धीरे चलना सीख जाता है। यहाँ उजाला तेज़ नहीं जाता, फैलता है। और शायद इसी फैलाव में बुंदेलखंड की असली कहानी छिपी है।
पूर्वांचल की मिट्टी से उठकर गुस्ताख दिल जब चित्रकूट पहुँचा, तो साथ थे संजय सिंह राणा। उनके चेहरे पर वह आत्मविश्वास था जो इस धरती को भीतर से जानने से आता है।
“यहाँ जल्दी मत लिखना,” उन्होंने कहा, “पहले यहाँ की चुप्पी सुनना।”
पूर्वांचल की मिट्टी से उठकर गुस्ताख दिल जब चित्रकूट पहुँचा, तो साथ थे संजय सिंह राणा। उनके चेहरे पर वह आत्मविश्वास था जो इस धरती को भीतर से जानने से आता है।
“यहाँ जल्दी मत लिखना,” उन्होंने कहा, “पहले यहाँ की चुप्पी सुनना।”
राम की नगरी, लेकिन रोज़मर्रा की जद्दोजहद
चित्रकूट का नाम आते ही आस्था सामने खड़ी हो जाती है। मंदाकिनी के घाट, रामघाट की आरती, दूर-दूर से आते श्रद्धालु। मंदिरों में भीड़ है, दुकानों में रौनक है। लेकिन जैसे ही मुख्य सड़क छोड़कर पहाड़ी गाँव की ओर बढ़ते हैं, तस्वीर बदल जाती है।
एक बुज़ुर्ग खाट पर बैठे थे। संजय ने बुंदेली में पूछा — “का काका, पानी कैसो चल रहो?” बुज़ुर्ग ने हल्की हँसी के साथ जवाब दिया — “चल रहो? पानी तो भाग रहो। हम पीछे-पीछे।” पास बैठा युवक बोला —“टंकी बनी है, पाइप बिछे हैं… पर पानी कम आवत।”
गुस्ताख दिल ने महसूस किया — यहाँ समस्या की आवाज़ ऊँची नहीं है। यहाँ शिकायत थकी हुई नहीं, स्वीकार की हुई लगती है।
एक बुज़ुर्ग खाट पर बैठे थे। संजय ने बुंदेली में पूछा — “का काका, पानी कैसो चल रहो?” बुज़ुर्ग ने हल्की हँसी के साथ जवाब दिया — “चल रहो? पानी तो भाग रहो। हम पीछे-पीछे।” पास बैठा युवक बोला —“टंकी बनी है, पाइप बिछे हैं… पर पानी कम आवत।”
गुस्ताख दिल ने महसूस किया — यहाँ समस्या की आवाज़ ऊँची नहीं है। यहाँ शिकायत थकी हुई नहीं, स्वीकार की हुई लगती है।
आस्था और अर्थव्यवस्था
रामघाट पर शाम की आरती शुरू हुई। घंटियों की आवाज़ पहाड़ियों से टकराकर लौट रही थी। श्रद्धालु दीप जलाकर जल में प्रवाहित कर रहे थे।
एक दुकानदार से पूछा राणा ने — “रोज़गार कैसो?” “सीजन में ठीक। बाकी समय शांत।” “सरकारी मदद?” “योजना बहुत हैं, पहुँच कम।” यहाँ पर्यटन है, पर स्थिरता नहीं। यहाँ भीड़ है, पर बुनियादी ढाँचा अधूरा।
एक दुकानदार से पूछा राणा ने — “रोज़गार कैसो?” “सीजन में ठीक। बाकी समय शांत।” “सरकारी मदद?” “योजना बहुत हैं, पहुँच कम।” यहाँ पर्यटन है, पर स्थिरता नहीं। यहाँ भीड़ है, पर बुनियादी ढाँचा अधूरा।
पहाड़ की ज़मीन, पत्थर की खेती
गाँव के बाहर खेत में खड़े किसान ने मिट्टी हाथ में लेकर कहा — “ऊपर पत्थर, नीचे पत्थर। पानी रुके तो फसल। नहीं तो बस आसमान।”
संजय ने पूछा — “सिंचाई?”
“तालाब था… सूख गओ। अब बारिश पर भरोसा।” बुंदेलखंड में खेती जोखिम है। पर छोड़ना विकल्प नहीं।
संजय ने पूछा — “सिंचाई?”
“तालाब था… सूख गओ। अब बारिश पर भरोसा।” बुंदेलखंड में खेती जोखिम है। पर छोड़ना विकल्प नहीं।
पलायन की चुप चाल
एक घर का दरवाज़ा बंद था। संजय बोले — “दिल्ली गए हैं। काम पर।” दूसरे घर में वृद्धा मिली।
“लड़का?”
“सूरत।”
“कब आएगा?”
“दीवाली पर।”
चित्रकूट में पहाड़ स्थिर हैं, पर युवा नहीं।
“लड़का?”
“सूरत।”
“कब आएगा?”
“दीवाली पर।”
चित्रकूट में पहाड़ स्थिर हैं, पर युवा नहीं।
दफ्तर और धरातल
ब्लॉक कार्यालय पहुँचे। फाइलों के ढेर, योजनाओं के पोस्टर। अधिकारी बोले —
“कार्य प्रगति पर है।”
संजय ने पूछा —
“गाँव में टंकी चालू?”
“तकनीकी समस्या है।”
तकनीकी समस्या — यह शब्द यहाँ अक्सर समाधान से लंबा होता है।
“कार्य प्रगति पर है।”
संजय ने पूछा —
“गाँव में टंकी चालू?”
“तकनीकी समस्या है।”
तकनीकी समस्या — यह शब्द यहाँ अक्सर समाधान से लंबा होता है।
महिलाएँ और पानी
दोपहर में कुछ महिलाएँ घड़े लेकर लौट रही थीं।
“कितना दूर?”
“आधा कोस।”
“रोज़?”
“हाँ।”
उनके चेहरे पर शिकायत नहीं थी। बस अभ्यास था।
“कितना दूर?”
“आधा कोस।”
“रोज़?”
“हाँ।”
उनके चेहरे पर शिकायत नहीं थी। बस अभ्यास था।
चित्रकूट से भीतर, सुदूर पाठा की ओर जाते ही भूगोल और बदल जाता है। कच्ची पगडंडियाँ, बिखरे टप्पर, और पत्थरों के बीच सिमटी ज़िंदगी।
यहाँ आदिवासी बस्तियाँ हैं—कोल और अन्य समुदाय—जिनकी दिनचर्या जंगल, लकड़ी, महुआ और छोटे खेतों के बीच घूमती है। घर मिट्टी और खपरैल के, आँगन में बकरियाँ, दीवार पर सूखती लकड़ी। बोलचाल में बुंदेली की लय है, पर शब्दों में एक सावधानी—“हमार जंगल, हमार पेट,” एक बुज़ुर्ग ने कहा, “पर कागज में सब सरकार का।”
रहन-सहन सादा है, पर कठिन। पानी दूर है, स्कूल पास है पर शिक्षक कम दिखते हैं। स्वास्थ्य उपकेंद्र का बोर्ड है, पर दवा का भरोसा अनिश्चित। महिलाएँ महुआ बीनती हैं, पुरुष दिहाड़ी के लिए निकलते हैं। शाम ढलते ही बस्ती जल्दी शांत हो जाती है—सिवाय उन जगहों के जहाँ देसी शराब की महक हवा में घुलने लगती है। “काम न होए, तो दिमाग चलत है,” एक युवक ने हँसते हुए कहा, “दारू से नींद जल्दी आवत है।” हँसी में छिपा सच यह है कि बेरोज़गारी और निराशा का सबसे आसान साथी वही बोतल बन जाती है।
शराबी चलन पर बात करते ही महिलाएँ मुखर हो उठती हैं। “रोज़ी कम, खर्च ज़्यादा,” एक महिला बोली, “बच्चन की पढ़ाई रुक जात है।” पंचायत की बैठकों में चर्चा होती है, पर रोक आधी रहती है। पाठा की यह विडंबना है—आस्था गहरी, समुदाय मजबूत; पर संसाधन कम और विकल्प सीमित। गुस्ताख दिल ने दर्ज किया: यहाँ समस्या केवल गरीबी नहीं, विकल्पहीनता है। जब तक रोज़गार, शिक्षा और नशामुक्ति की ठोस पहल साथ-साथ नहीं चलेंगी, तब तक पहाड़ों के बीच यह चक्र यूँ ही घूमता रहेगा।
चित्रकूट में प्यास केवल पानी की नहीं, सुविधा की भी है।
यहाँ आदिवासी बस्तियाँ हैं—कोल और अन्य समुदाय—जिनकी दिनचर्या जंगल, लकड़ी, महुआ और छोटे खेतों के बीच घूमती है। घर मिट्टी और खपरैल के, आँगन में बकरियाँ, दीवार पर सूखती लकड़ी। बोलचाल में बुंदेली की लय है, पर शब्दों में एक सावधानी—“हमार जंगल, हमार पेट,” एक बुज़ुर्ग ने कहा, “पर कागज में सब सरकार का।”
रहन-सहन सादा है, पर कठिन। पानी दूर है, स्कूल पास है पर शिक्षक कम दिखते हैं। स्वास्थ्य उपकेंद्र का बोर्ड है, पर दवा का भरोसा अनिश्चित। महिलाएँ महुआ बीनती हैं, पुरुष दिहाड़ी के लिए निकलते हैं। शाम ढलते ही बस्ती जल्दी शांत हो जाती है—सिवाय उन जगहों के जहाँ देसी शराब की महक हवा में घुलने लगती है। “काम न होए, तो दिमाग चलत है,” एक युवक ने हँसते हुए कहा, “दारू से नींद जल्दी आवत है।” हँसी में छिपा सच यह है कि बेरोज़गारी और निराशा का सबसे आसान साथी वही बोतल बन जाती है।
शराबी चलन पर बात करते ही महिलाएँ मुखर हो उठती हैं। “रोज़ी कम, खर्च ज़्यादा,” एक महिला बोली, “बच्चन की पढ़ाई रुक जात है।” पंचायत की बैठकों में चर्चा होती है, पर रोक आधी रहती है। पाठा की यह विडंबना है—आस्था गहरी, समुदाय मजबूत; पर संसाधन कम और विकल्प सीमित। गुस्ताख दिल ने दर्ज किया: यहाँ समस्या केवल गरीबी नहीं, विकल्पहीनता है। जब तक रोज़गार, शिक्षा और नशामुक्ति की ठोस पहल साथ-साथ नहीं चलेंगी, तब तक पहाड़ों के बीच यह चक्र यूँ ही घूमता रहेगा।
चित्रकूट में प्यास केवल पानी की नहीं, सुविधा की भी है।
पहाड़ की शाम, सवाल की रात
शाम को पहाड़ी पर बैठकर संजय बोले —
“यहाँ लोग लड़ते नहीं। बस सहते हैं।”
गुस्ताख दिल ने कहा —
“सहनशीलता और बेबसी में फर्क होता है।”
संजय ने सिर हिलाया —
“फर्क है… पर सीमा पतली है।”
चित्रकूट की रात शांत होती है। दूर कहीं कुत्ते भौंकते हैं। मंदिरों की रोशनी धीमी हो जाती है। पहाड़ अंधेरे में और ठोस लगते हैं।
गुस्ताख दिल ने दर्ज किया —
यहाँ समस्या शोर नहीं करती।
यहाँ दर्द स्थिर है।
पर उम्मीद भी है।
एक युवक बोला —
“काम मिल जाए तो हम यहीं रहें।”
एक महिला बोली —
“पानी ठीक हो जाए तो गाँव अच्छा है।”
एक बुज़ुर्ग बोले —
“सरकार सुन ले तो सब ठीक।”
चित्रकूट विरोध नहीं करता।
चित्रकूट प्रतीक्षा करता है।
“यहाँ लोग लड़ते नहीं। बस सहते हैं।”
गुस्ताख दिल ने कहा —
“सहनशीलता और बेबसी में फर्क होता है।”
संजय ने सिर हिलाया —
“फर्क है… पर सीमा पतली है।”
चित्रकूट की रात शांत होती है। दूर कहीं कुत्ते भौंकते हैं। मंदिरों की रोशनी धीमी हो जाती है। पहाड़ अंधेरे में और ठोस लगते हैं।
गुस्ताख दिल ने दर्ज किया —
यहाँ समस्या शोर नहीं करती।
यहाँ दर्द स्थिर है।
पर उम्मीद भी है।
एक युवक बोला —
“काम मिल जाए तो हम यहीं रहें।”
एक महिला बोली —
“पानी ठीक हो जाए तो गाँव अच्छा है।”
एक बुज़ुर्ग बोले —
“सरकार सुन ले तो सब ठीक।”
चित्रकूट विरोध नहीं करता।
चित्रकूट प्रतीक्षा करता है।
तीसरी गुस्ताखी का निष्कर्ष
पूर्वांचल में शब्द था — “धीरे-धीरे।”
चित्रकूट में शब्द है — “रुक-रुक कर।”
यहाँ विकास आता है, पर अधूरा।
यहाँ आस्था स्थायी है, पर व्यवस्था अस्थिर।
गुस्ताख दिल ने आज कोई नारा नहीं दिया।
कोई आरोप नहीं लगाया।
बस देखा।
सुना।
दर्ज किया।
चित्रकूट ने सिखाया —
पहाड़ केवल भूगोल नहीं होते।
वे मनःस्थिति भी होते हैं।
और जब तक पहाड़ों के नीचे बसे गाँवों तक पानी, रोज़गार और स्थिरता समान रूप से नहीं पहुँचती, तब तक आस्था और प्रशासन के बीच की दूरी बनी रहेगी।
तीसरी गुस्ताखी यहीं ठहरती है।
समाप्त नहीं होती।
क्योंकि बुंदेलखंड का सफ़र अभी बाकी है।
कल ललितपुर।
अंतिम पड़ाव।
आज चित्रकूट सो रहा है।
पर उसकी प्यास जाग रही है। 💜
चित्रकूट में शब्द है — “रुक-रुक कर।”
यहाँ विकास आता है, पर अधूरा।
यहाँ आस्था स्थायी है, पर व्यवस्था अस्थिर।
गुस्ताख दिल ने आज कोई नारा नहीं दिया।
कोई आरोप नहीं लगाया।
बस देखा।
सुना।
दर्ज किया।
चित्रकूट ने सिखाया —
पहाड़ केवल भूगोल नहीं होते।
वे मनःस्थिति भी होते हैं।
और जब तक पहाड़ों के नीचे बसे गाँवों तक पानी, रोज़गार और स्थिरता समान रूप से नहीं पहुँचती, तब तक आस्था और प्रशासन के बीच की दूरी बनी रहेगी।
तीसरी गुस्ताखी यहीं ठहरती है।
समाप्त नहीं होती।
क्योंकि बुंदेलखंड का सफ़र अभी बाकी है।
कल ललितपुर।
अंतिम पड़ाव।
आज चित्रकूट सो रहा है।
पर उसकी प्यास जाग रही है। 💜
FAQ : चित्रकूट की तीसरी गुस्ताखी में प्रमुख मुद्दे क्या रहे?
जल संकट, पलायन, पर्यटन आधारित अस्थिर अर्थव्यवस्था, पाठा क्षेत्र के आदिवासी जीवन की चुनौतियाँ और प्रशासनिक धीमी प्रगति इस गुस्ताखी के मुख्य विषय रहे।

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