जब सड़क चौड़ी होती है और न्याय संकरा
तो ऐसे खबरों को सामने आने की वजह मिलती हैं

डबल स्टैंडर्ड रूल्ड रंगीन बॉक्स में डिज़ाइन किया गया ‘भूमि अधिग्रहण’ शीर्षक, मिट्टी जैसी पृष्ठभूमि पर उभरा हुआ टेक्स्ट

✍️लेख – हीरा मोटवानी

हूक प्वाइंट :

रायगढ़ मेडिकल कॉलेज रोड पर सड़क चौड़ीकरण के बीच मुआवज़ा गणना की इकाई में बदलाव ने निष्पक्ष प्रतिपूर्ति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या विकास की लागत कम करने के लिए न्याय की परिधि छोटी की जा रही है?

IMG-20260212-WA0009
previous arrow
next arrow

रायगढ़ मेडिकल कॉलेज रोड भूमि अधिग्रहण मामला, मुआवज़ा गणना विवाद और सुप्रीम कोर्ट निर्देशों की पृष्ठभूमि में निष्पक्ष प्रतिपूर्ति पर सवाल

रायगढ़ की मेडिकल कॉलेज रोड पर विकास की रेखा स्पष्ट दिखती है। सड़क चौड़ी की जा रही है, पुलिया का विस्तार प्रस्तावित है, यातायात सुगम बनाने की तैयारी है। परियोजना कागज़ों में व्यवस्थित है—लागत स्वीकृत, अधिसूचना जारी, अधिग्रहण प्रक्रिया सक्रिय। शहर आगे बढ़ने की तैयारी में है। लेकिन इसी विकास रेखा के समानांतर एक और रेखा खिंची है—मुआवज़े की गणना की। और यहीं से वह प्रश्न जन्म लेता है जो इस पूरी बहस का केंद्र है।

गणना की इकाई में बदलाव का प्रश्न

पिछले पाँच वर्षों में मेडिकल कॉलेज रोड के आसपास भूमि की अधिकांश खरीद-बिक्री स्क्वायर फीट दर पर दर्ज हुई। पंजीयन कार्यालय के रिकॉर्ड यही संकेत देते हैं कि बाजार व्यवहार स्क्वायर फीट आधारित रहा है। लेकिन जब भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई, तो मुआवज़ा निर्धारण हेक्टेयर दर के आधार पर किया गया। कानूनी रूप से यह प्रक्रिया अवैध नहीं कही जा सकती, क्योंकि राजपत्र में अधिसूचित गाइडलाइन दरें इसी इकाई में हैं। परंतु प्रभावित पक्षों का कहना है कि इकाई परिवर्तन से वास्तविक मूल्यांकन का प्रभाव कम हो गया है।

इसे भी पढें  राज्यपाल रामेन डेका ने सुरभि मोटवानी को स्वर्ण पदक से किया सम्मानित

तुलनात्मक प्रभाव को समझना

मान लीजिए किसी भूमि का आकार 4,000 स्क्वायर फीट है और आसपास के पंजीयन औसतन 2,000 रुपये प्रति स्क्वायर फीट के आधार पर हुए हैं। इस स्थिति में बाजार मूल्य लगभग 80 लाख रुपये बैठ सकता है। यदि अधिग्रहण के समय गाइडलाइन हेक्टेयर दर लागू हो और विभाजन के बाद प्रभावी दर 700–800 रुपये प्रति स्क्वायर फीट के बराबर निकले, तो कुल मुआवज़ा लगभग 28–32 लाख रुपये तक सीमित हो सकता है। यह परिकल्पित उदाहरण है, परंतु इसी प्रकार के अंतर की शिकायत प्रभावित भूमि स्वामी कर रहे हैं।

भूमि अधिग्रहण कानून 2013 का संदर्भ

भूमि अधिग्रहण कानून 2013 का मूल उद्देश्य निष्पक्ष और न्यायसंगत मुआवज़ा सुनिश्चित करना है। इस कानून के अंतर्गत मुआवज़ा निर्धारण में बाजार मूल्य, गुणांक, 100 प्रतिशत सोलाटियम तथा संरचनाओं का पृथक मूल्यांकन शामिल होता है। बाजार मूल्य निर्धारण के लिए हाल के पंजीयन, गाइडलाइन दर या सहमति आधारित दर को आधार बनाया जा सकता है। विवाद तब उभरता है जब गाइडलाइन दर और वास्तविक बाजार व्यवहार में स्पष्ट अंतर हो या इकाई परिवर्तन से प्रभावी दर कम हो जाए।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

7 मई 2025 को माननीय उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि भूमि अधिग्रहण का मुआवज़ा यांत्रिक तरीके से निर्धारित नहीं किया जा सकता, बल्कि समानता, इक्विटी और न्याय से निर्देशित होना चाहिए। समान स्थान और समान विकास क्षमता वाली भूमि को समान मुआवज़ा मिलना चाहिए, जब तक स्पष्ट वस्तुनिष्ठ अंतर इसे उचित न ठहराएं। यही वह कसौटी है जिस पर रायगढ़ मेडिकल कॉलेज रोड का मामला परखा जा रहा है।

एकतरफा अधिग्रहण की बहस

राजपत्रीय नियमावली सामान्यतः मध्य रेखा से संतुलित अधिग्रहण का संकेत देती है। लेकिन इस मार्ग पर अधिग्रहण मुख्यतः एक ओर केंद्रित दिखाई देता है। प्रशासन के पास इसके तकनीकी कारण हो सकते हैं—संरचनात्मक बाधाएँ, जल निकासी, यातायात संरचना या भविष्य विस्तार की योजना। परंतु प्रभावित भूमि स्वामियों का प्रश्न है कि यदि अधिग्रहण असंतुलित प्रतीत होता है, तो तुलनात्मक विश्लेषण सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया।

इसे भी पढें  खूबसूरत डीएसपी का कथित ‘लव ट्रैप’: ज्वेलरी, कैश और होटल तक हड़पने का आरोप

प्रशासनिक पक्ष

प्रशासन का सामान्य पक्ष यह है कि गाइडलाइन दरें विधिवत अधिसूचित हैं, मुआवज़ा राज्य स्तर के निर्देशों के अनुसार निर्धारित होता है और असहमति की स्थिति में वैधानिक अपील का मार्ग उपलब्ध है। यह तर्क प्रक्रिया की वैधता को स्थापित करते हैं। परंतु प्रक्रिया और न्याय के बीच अंतर को लेकर बहस जारी है।

किसान की स्थिति

एक प्रभावित किसान का कथन उल्लेखनीय है—“हम जमीन बेच नहीं रहे, हमसे ली जा रही है। कम से कम हिसाब बराबर हो।” अनिवार्य अधिग्रहण में नागरिक की सौदेबाजी की क्षमता सीमित होती है। इसलिए कानून ने प्रतिपूर्ति को केवल मूल्य नहीं, बल्कि संतुलन का माध्यम माना है।

कानूनी विशेषज्ञ की राय

भूमि अधिग्रहण मामलों में कार्यरत एक वरिष्ठ अधिवक्ता के अनुसार इकाई परिवर्तन अपने आप में अवैध नहीं है, लेकिन यदि उससे प्रभावित व्यक्ति को तुलनात्मक नुकसान होता है तो प्रशासन को उसका औचित्य स्पष्ट करना चाहिए। यदि बाजार व्यवहार किसी विशेष इकाई में हो रहा हो और अधिग्रहण में अलग इकाई लागू की जाए, तो न्यायिक समीक्षा की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

विकास बनाम न्याय

परियोजना लागत नियंत्रित रखना प्रशासनिक जिम्मेदारी है। परंतु यदि लागत नियंत्रण का प्रभाव सीधे मुआवज़े पर पड़े, तो उसका सार्वजनिक औचित्य आवश्यक है। डामर, स्टील और सीमेंट की दरें बाजार के अनुरूप स्वीकार की जाती हैं; तो भूमि—जो नागरिक की स्थायी संपत्ति है—के मूल्यांकन में तुलनात्मक संतुलन क्यों न सुनिश्चित किया जाए?

इसे भी पढें  राज्यपाल रामेन डेका ने सुरभि मोटवानी को स्वर्ण पदक से किया सम्मानित

रायगढ़ मेडिकल कॉलेज रोड का मामला अभी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा है। प्रभावित पक्ष आपत्तियाँ दर्ज करा रहे हैं। प्रशासन अपने निर्देशों के अनुसार प्रक्रिया चला रहा है। न्यायिक संदर्भ उपलब्ध है। लेकिन यह बहस एक मूल प्रश्न को जन्म देती है—क्या विकास और न्याय की रेखाएँ समानांतर चल रही हैं?

जब सड़क चौड़ी होती है और न्याय संकरा दिखाई देता है, तो खबरें सामने आती हैं। वे विरोध के लिए नहीं, संतुलन की याद दिलाने के लिए आती हैं। यदि गणना, इकाई और दर का तुलनात्मक विवरण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट कर दिया जाए, तो विश्वास पुनर्स्थापित हो सकता है।

विकास आवश्यक है। सड़कें बनें, पुलिया बने, यातायात सुधरे—इस पर मतभेद नहीं। परंतु जिनकी भूमि इस विकास में समाहित हो रही है, उन्हें यह भरोसा होना चाहिए कि उनके हिस्से का न्याय भी उतना ही विस्तृत है जितनी सड़क।

अंततः यह मामला दरों का नहीं, दृष्टिकोण का है। यदि कानून की भावना—समानता, इक्विटी और न्याय—निर्णय प्रक्रिया का मार्गदर्शक बने, तो विवाद स्वतः सीमित हो सकता है। सवाल जारी है। संतुलन की प्रतीक्षा भी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या इकाई बदलना अवैध है?

इकाई परिवर्तन अवैध नहीं है, परंतु यदि उससे मुआवज़ा राशि तुलनात्मक रूप से घटती है तो उसका स्पष्ट औचित्य आवश्यक है।

क्या प्रभावित व्यक्ति अपील कर सकता है?

हाँ, भूमि अधिग्रहण कानून के अंतर्गत पुनर्मूल्यांकन और आपत्ति दर्ज करने की व्यवस्था उपलब्ध है।

सुप्रीम कोर्ट का क्या निर्देश है?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मुआवज़ा यांत्रिक तरीके से नहीं, बल्कि समानता और न्याय के सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए।



Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top