🔶 द्रोणाचार्य घाट से देवगवां तक आस्था का उमड़ा सैलाब
कुतुबनगर चौरासी कोसी परिक्रमा का रामादल सोमवार को जब सीतापुर जिले की सीमा में प्रवेश करता दिखाई दिया, तो पूरा क्षेत्र आस्था और उत्साह से सराबोर हो उठा। हरदोई के पांचवें पड़ाव साखिन गोपालपुर से सुबह छह बजे रवाना हुए परिक्रमार्थियों का अगला ठिकाना था सीतापुर सीमा पर स्थित कठिना-गोमती नदी संगम का पवित्र द्रोणाचार्य घाट। यहां पहुंचकर श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से स्नान किया और फिर अपने छठे पड़ाव देवगवां की ओर प्रस्थान किया। इस पूरे मार्ग में धार्मिक ऊर्जा की ऐसी लहर दिखाई दी, जिसने स्थानीय लोगों के मन में भी विशेष उत्साह भर दिया।
🔶 संगम तट पर दिखा श्रद्धा और अनुशासन का अनोखा संगम
द्रोणाचार्य घाट पर सुबह से ही श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगा रहा। भगवा और श्वेत वस्त्रों में सजे परिक्रमार्थियों के चेहरों पर आस्था की चमक स्पष्ट दिखाई दे रही थी। पांच पड़ावों की लंबी यात्रा के बावजूद उनके कदमों में थकान नहीं, बल्कि भक्ति की दृढ़ता झलक रही थी। घाट पर ‘जय श्रीराम’ के गगनभेदी उद्घोष से वातावरण गूंज उठा। स्थानीय निवासियों और पुलिसकर्मियों ने साधु-संतों का माल्यार्पण कर स्वागत किया। प्रशासन द्वारा सुरक्षा और व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए गए थे, जिससे श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
🔶 प्रशासनिक तैयारियां बनीं सहारा, नावों से कराया गया नदी पार
गोमती नदी पार कराने के लिए द्रोणाचार्य घाट पर नावों की पर्याप्त व्यवस्था की गई थी। नदी में किसी भी संभावित आपात स्थिति से निपटने के लिए पीएसी के जवान तैनात रहे। देवगवां पड़ाव तक पहुंचने के लिए पानी के टैंकर, अस्थायी शौचालय और अन्य मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था की गई थी। प्रशासनिक सतर्कता के कारण यात्रा का यह चरण सुव्यवस्थित और शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। श्रद्धालुओं ने भी अनुशासन का परिचय देते हुए व्यवस्था में पूरा सहयोग किया।
🔶 देवगवां और कुतुबनगर में उत्सव जैसा माहौल
द्रोणाचार्य घाट से कुतुबनगर और देवगवां तक का क्षेत्र मानो धार्मिक उत्सव में तब्दील हो गया। जगह-जगह भंडारों का आयोजन किया गया। मधुबना गांव के पिंटू, करुणा शंकर और हरिपाल ने श्रद्धालुओं के लिए खीर, तहरी और आलू-पूरी की व्यवस्था की। लोहारखेड़ा स्थित मां भवानी शक्ति धाम में फल और प्रसाद वितरित किए गए। कुतुबनगर के प्रधान नैमिष गुप्ता ने भी भंडारे का आयोजन कर परिक्रमार्थियों का अभिनंदन किया। ग्रामीणों ने फूल-मालाओं और आरती के साथ स्वागत कर परंपरा और संस्कृति की जीवंत तस्वीर पेश की।
🔶 धार्मिक स्थलों पर उमड़ी आस्था, प्राचीन मान्यताओं का स्मरण
द्रोणाचार्य घाट के समीप बूढ़नपुर में स्थित श्रृंगी ऋषि आश्रम श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहा। देवगवां में हनुमान मंदिर, गुलवरी बाबा, माधव बल बाबा, काशीनाथ बाबा, प्राचीन तीर्थ और देव प्रयाग कुंड जैसे धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं ने दर्शन-पूजन किया। मान्यता है कि महर्षि दधीचि ने देवगवां के मंदिर में विश्राम किया था। यहां स्थित प्राचीन कुएं को भी श्रद्धा के साथ देखा गया। धार्मिक परंपराओं और लोकमान्यताओं के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था ने इस यात्रा को केवल परिक्रमा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्स्मरण का अवसर बना दिया।
🔶 भक्ति की ऊर्जा से थिरकता जनमानस
पूरे मार्ग में ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी उल्लेखनीय रही। सेवा-सत्कार की भावना ने परिक्रमा को जन-आंदोलन का स्वरूप दे दिया। महिलाएं आरती की थाल लिए खड़ी दिखाई दीं तो युवा श्रद्धालुओं के लिए जल और प्रसाद की व्यवस्था करते नजर आए। परिक्रमार्थियों की टोली अनुशासित ढंग से आगे बढ़ती रही और हर पड़ाव पर श्रद्धा की नई कहानी लिखती चली गई। भक्ति और सामूहिकता का यह दृश्य क्षेत्र के लिए लंबे समय तक स्मरणीय रहेगा।
🔶 आगे की यात्रा की ओर बढ़ता रामादल
देवगवां में पड़ाव डालने के बाद रामादल की अगली यात्रा की तैयारियां भी प्रारंभ हो गईं। श्रद्धालु विश्राम के साथ-साथ अगले चरण के लिए उत्साहित दिखाई दिए। यह परिक्रमा केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बनती जा रही है। प्रशासन और स्थानीय समाज के सहयोग से यह यात्रा व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ रही है, जो क्षेत्रीय सद्भाव और आस्था की जीवंत मिसाल प्रस्तुत करती है।
❓ FAQ
चौरासी कोसी परिक्रमा का उद्देश्य क्या है?
यह परिक्रमा धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपरा और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक है, जिसमें श्रद्धालु विभिन्न पवित्र स्थलों की यात्रा करते हैं।
सीतापुर में रामादल का कौन-सा पड़ाव रहा?
सीतापुर सीमा में प्रवेश के बाद रामादल ने द्रोणाचार्य घाट पर स्नान किया और छठे पड़ाव देवगवां में डेरा डाला।
प्रशासन द्वारा क्या व्यवस्थाएं की गई थीं?
नावों की व्यवस्था, पीएसी की तैनाती, पानी के टैंकर और अस्थायी शौचालय जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई थीं।








