संपादकीय सार: हरिद्वार से प्रकाशित ‘अविरल’ पत्रिका पर एक आत्मीय लेकिन निर्भीक टिप्पणी— न निंदा, न प्रशंसा; केवल वह संवाद जो किसी भी गंभीर मंच को स्थानीयता से राष्ट्रीयता की ओर ले जा सकता है।
प्रिय पाठक, यह किसी काल्पनिक धारा से संवाद नहीं है। यह उस पत्रिका से बातचीत है जो हरिद्वार की धरती से, वैदिक प्रकाशन के माध्यम से “अविरल” नाम से प्रकाशित होती है। नाम में ही एक विश्वास छिपा है— निरंतरता का, संस्कार का, सांस्कृतिक स्वाभिमान का। परंतु प्रश्न यह है कि क्या यह प्रवाह सचमुच अविरल है, या अभी उसे दिशा, अनुशासन और गहराई की आवश्यकता है? यह लेख उसी आत्ममंथन का दस्तावेज़ है— स्नेह के साथ, परंतु बिना लाग-लपेट के।
प्रस्तावना: एक पत्रिका, केवल पत्रिका नहीं
“अविरल” को पढ़ते हुए स्पष्ट होता है कि उसके भीतर नीयत साफ़ है। भारतीयता का आग्रह है, संस्कृति के संरक्षण की चिंता है, परिवार को केंद्र में रखने का आत्मविश्वास है। यह एक ऐसा मंच बनने की आकांक्षा रखती है जहाँ वैदिक परंपरा और समकालीन समाज का संवाद संभव हो। यह प्रयास अपने आप में सराहनीय है। किंतु केवल नीयत से इतिहास नहीं बनता। इतिहास बनाने के लिए कठोर अनुशासन, शोध की गहराई और संपादकीय दृढ़ता चाहिए।
संपादकीय कसावट: सबसे बड़ी चुनौती
पत्रिका के पन्नों को पढ़ते हुए बार-बार एक कमी खटकती है— संपादकीय ढीलापन। शब्दों को पर्याप्त कसौटी पर नहीं कसा गया, वाक्यों को सँवारा नहीं गया, और विचारों को परिपक्वता की अंतिम रेखा तक नहीं ले जाया गया। त्रुटियाँ केवल टंकण की नहीं, दृष्टि की भी हैं। एक गंभीर मंच “लगभग ठीक” से संतुष्ट नहीं होता। उसे “निर्दोष” होने की बेचैनी सताती है। यदि “अविरल” राष्ट्रीय मंच बनना चाहती है, तो उसे यह बेचैनी स्वयं में जगानी होगी।
भावुकता बनाम बौद्धिकता
पत्रिका में श्रद्धा है, आस्था है, संस्कार की आँच है। परंतु जब वही श्रद्धा तर्क और तथ्य से न जुड़ पाए, तो वह उपदेश में बदल जाती है। उदाहरणार्थ, क्रांतिकारियों पर लिखे गए लेख भावनात्मक तो हैं, पर ऐतिहासिक संदर्भ, आलोचनात्मक दृष्टिकोण और दस्तावेज़ी साक्ष्य का अभाव दिखता है। आज का पाठक केवल जयकार नहीं चाहता; वह संदर्भ और विमर्श चाहता है। यदि भाव के साथ बौद्धिकता का संतुलन न हो, तो गंभीर पाठक दूरी बना लेता है।
शोध और संदर्भ की अनिवार्यता
योग, आध्यात्मिकता और संस्कृति जैसे विषय विशाल हैं। उन्हें केवल उद्धरणों और भावनात्मक लेखन से नहीं साधा जा सकता। आंकड़ों, तुलनात्मक अध्ययन, समकालीन विमर्श और वैश्विक संदर्भों की आवश्यकता होती है। जब गहराई अनुपस्थित रहती है, तो पत्रिका का प्रभाव सीमित हो जाता है। शोध की यह कमी “अविरल” को गंभीर विमर्श मंच बनने से रोकती है।
प्रस्तुति और डिज़ाइन: विश्वसनीयता की आधारशिला
खंडों की स्पष्टता, हेडिंग की एकरूपता और लेआउट का अनुशासन— ये केवल तकनीकी बातें नहीं हैं; यही पेशेवरता की पहचान हैं। पत्रिका केवल विचार से नहीं, प्रस्तुति से भी विश्वसनीय बनती है। यदि संरचना असंगत हो, तो श्रेष्ठ विचार भी बिखर जाते हैं। “अविरल” को अपने डिज़ाइन और संपादन में एक स्थिर शैली विकसित करनी होगी।
साहस: प्रासंगिकता की कुंजी
पत्रिका प्रायः सुरक्षित विषयों का चयन करती है। समकालीन, ज्वलंत और विवादास्पद मुद्दों पर स्पष्ट आवाज़ कम सुनाई देती है। यदि सांस्कृतिक पत्रिका होना है, तो उसे यह पूछना होगा— परंपरा और आधुनिकता का संघर्ष क्या है? युवा पीढ़ी किन द्वंद्वों से जूझ रही है? संस्कृति का वर्तमान संकट क्या है? संवाद से बचना प्रासंगिकता से दूर जाना है।
परंतु संभावनाएँ भी कम नहीं
इन सब आलोचनाओं के बीच यह स्वीकार करना होगा कि “अविरल” में संभावना है। नए लेखकों को मंच देना, परिवार और समाज को केंद्र में रखना, भारतीयता के प्रति आत्मविश्वास— ये सब गुण उसे विशिष्ट बनाते हैं। यदि इन गुणों को पेशेवर कसावट के साथ जोड़ा जाए, तो यह मंच स्थानीय सीमाओं से ऊपर उठ सकता है।
निर्णायक मोड़
यदि “अविरल” ने स्वयं को अनुशासन में नहीं ढाला, तो वह एक सीमित सांस्कृतिक स्मारिका बनकर रह जाएगी। किंतु यदि उसने संपादन, शोध और वैचारिक साहस को अपनाया, तो वह राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर पत्रिका के रूप में स्थापित हो सकती है। निर्णय उसी के हाथ में है। प्रवाह पर्याप्त नहीं; समुद्र बनने के लिए गहराई और दिशा चाहिए।
निष्कर्ष: स्नेह के साथ कठोरता
यह आलोचना न निंदा है, न चाटुकारिता। यह वह संवाद है जो हर गंभीर मंच को स्वयं से करना चाहिए। सच्चा संपादक वही है जो अपने ही अंक को सबसे पहले काट सके। “अविरल” में संभावना है— अब उसे उसी कठोरता से स्वयं को गढ़ना होगा, जिस कठोरता से वह समाज को दिशा देना चाहती है। स्नेह और सत्य का यह संतुलन ही उसे सचमुच अविरल बनाएगा।
— अनिल अनूप
लेखक, संपादक और एक सहयात्री








