
समाचार सार: उत्तर प्रदेश विधानसभा में उच्च शिक्षा के मुद्दे पर तीखी बहस छिड़ गई। गलगोटिया यूनिवर्सिटी की स्थापना और विकास को लेकर सत्ता और विपक्ष आमने-सामने आ गए। श्रेय की राजनीति के बीच सदन में भाषा की मर्यादा भी चर्चा का विषय बनी।
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा के चालू सत्र में उच्च शिक्षा का मुद्दा अचानक सियासी तापमान बढ़ाने वाला साबित हुआ। गलगोटिया यूनिवर्सिटी को लेकर सत्ता पक्ष ने जहां अपनी नीतियों को विकास का आधार बताया, वहीं विपक्ष ने इस दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि संस्थान की स्थापना और विस्तार की प्रक्रिया को एकतरफा श्रेय देना तथ्यों के साथ न्याय नहीं है।
श्रेय किसका, सवाल बड़ा
सत्ता पक्ष का कहना था कि निवेश-अनुकूल वातावरण, नई औद्योगिक नीतियां और बुनियादी ढांचे के विस्तार ने प्रदेश में निजी विश्वविद्यालयों को गति दी है। उनके अनुसार वर्तमान शासन की नीतिगत प्राथमिकताओं ने उच्च शिक्षा को नई दिशा दी।
वहीं विपक्ष का तर्क था कि किसी भी विश्वविद्यालय की स्थापना एक लंबी प्रशासनिक और विधायी प्रक्रिया का परिणाम होती है। इसलिए संपूर्ण श्रेय को एक राजनीतिक कार्यकाल से जोड़ना इतिहास की जटिलता को सरल बनाकर पेश करना है।
बहस से बयान तक
चर्चा के दौरान कुछ तीखे शब्दों का प्रयोग भी हुआ, जिस पर सदन में आपत्ति दर्ज की गई। स्थिति ऐसी बनी कि अध्यक्ष को हस्तक्षेप कर सदस्यों से भाषा की मर्यादा बनाए रखने की अपील करनी पड़ी। इस घटनाक्रम ने बहस को एक नया आयाम दे दिया।
शिक्षा बनाम राजनीति
कई सदस्यों ने यह भी कहा कि विश्वविद्यालयों की वास्तविक पहचान उनके अकादमिक मानकों, शोध कार्य, प्लेसमेंट रिकॉर्ड और छात्र हितों से तय होती है। श्रेय की राजनीति से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार के अवसर मिलें।
विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर चर्चा नीति और गुणवत्ता के आधार पर केंद्रित होनी चाहिए, न कि केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित।








