किसी ने रंग नहीं डाला…
फिर भी वह लाल हो गई

होली की सांझ में लालिमा लिए शांत चेहरे वाली युवती, गालों पर हल्की लाली और पृष्ठभूमि में धुँधली चाँदनी, प्रतीकात्मक “अंगार” टेक्स्ट ओवरले के साथ

✍️लेखक: अनिल अनूप

किसी ने रंग नहीं डाला…
फिर भी वह लाल हो गई

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✤ शोर के बाद उतरती सांझ ✤

फागुन का सबसे खतरनाक क्षण वह नहीं होता जब ढोल बज रहे हों, बल्कि वह होता है जब ढोल थम जाते हैं और धड़कन अकेली सुनाई देने लगती है। दिन भर की होली में रंग चढ़े, हँसी उछली, गाल लाल हुए—पर वह सब खेल था। खेल में साहस नहीं चाहिए होता, भीड़ साथ होती है। पर सांझ जब आती है, तो वह भीड़ नहीं लाती—वह भीतर का सामना कराती है।

✤ दूरी जो बोलने लगी ✤

चेहरा धुल चुका था। हथेलियाँ साफ थीं। पर रक्त की चाल बदल चुकी थी। दूरी उतनी ही थी जितनी पहले, पर उसका अर्थ बदल गया था। साँसें पास आईं—बस इतनी कि हवा का ताप पहचाना जा सके। कोई हाथ आगे नहीं बढ़ा। कोई रंग नहीं उड़ा। फिर भी गर्दन से गाल तक एक लहर दौड़ी।

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साँस अटकी, फिर गहरी हुई। कलाई की नसों में कंपन तेज़ हुआ। दीपक की लौ काँपी—और उसी काँप में चेहरा नरम पड़ गया। दोपहर में रंग बाहर से चढ़ा था, इस सांझ रंग भीतर से उठ रहा था।

✤ प्रतीक्षा की देह ✤

प्रतीक्षा हमेशा चीखती नहीं। कभी-कभी वह सिर्फ रक्त में घुलती है। उस घड़ी किसी ने उसे छुआ नहीं था—फिर भी वह भीतर तक छुई हुई थी। यह छूना हाथ का नहीं था, स्वीकार का था। वह लाली खेल की नहीं थी, वह उस निर्णय की थी जिसे मन लंबे समय से टाल रहा था।

चाँद ऊपर चढ़ आया था। आँगन में सूखे रंग फीके थे, पर चेहरा फीका नहीं था। वहाँ एक अंगार था—धीमा, पर स्थिर। और उसी अंगार ने बता दिया कि फागुन केवल उत्सव नहीं, रूपांतरण भी है।

✤ लालिमा का अर्थ ✤

किसी ने रंग नहीं डाला… फिर भी वह लाल हो गई। क्योंकि रंग कभी-कभी बाहर से नहीं, भीतर की प्रतीक्षा से जन्म लेते हैं। और जब प्रतीक्षा देह में उतर जाती है, तब किसी को गुलाल की ज़रूरत नहीं रहती।

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FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

यह रचना होली की सांझ के उस क्षण पर आधारित है जहाँ बाहरी रंग उतर चुके होते हैं, पर भीतर का स्वीकार जन्म लेता है।

लाली यहाँ देह और मन के उस मिलन का प्रतीक है जहाँ प्रतीक्षा अंगार बन जाती है।

✤ रचना के निर्माण पर ✤

यह रचना एक बार में नहीं बनी। यह बेचैनी से गुज़री, असंतोष से गुज़री, कई बार पुनर्लेखन से गुज़री। इसका जन्म तकनीक से नहीं, आग्रह से हुआ—उस आग्रह से जो शब्दों को सजावट नहीं बनने देता, बल्कि उन्हें धड़कन बनने को मजबूर करता है।

बसंत के ग्रामीण परिवेश में पेड़ के नीचे बैठी विरहिणी स्त्री, पृष्ठभूमि में गाँव और सरसों के खेत, ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा “साहित्य श्रृंखला” और “सूना संसार”।
कोयल की कूक के बीच विरहिणी का मौन — बसंत के उत्सव में भी “सूना संसार” की गूंज।

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