🖊️ जगदंबा उपाध्याय की रिपोर्ट
समाचार सार : महाशिवरात्रि पर भंवरनाथ मंदिर आजमगढ़ में तड़के 3 बजे कपाट खुलते ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग गईं। जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक और शिव बारात के बीच पूरा जनपद शिवभक्ति में सराबोर रहा। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम के बीच लाखों भक्तों ने दर्शन-पूजन किया।
महाशिवरात्रि पर भंवरनाथ मंदिर आजमगढ़ में इस बार भी आस्था का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की पावन तिथि पर तड़के भोर से ही श्रद्धालुओं का सैलाब मंदिर परिसर और आसपास की सड़कों पर उमड़ पड़ा। सुबह 3 बजे जैसे ही मंदिर के कपाट खुले, भक्तों ने “हर-हर महादेव” के जयघोष के साथ भगवान भोलेनाथ के दर्शन प्रारंभ किए। पूरे जनपद के छोटे-बड़े शिवालयों में भी भक्तों की भीड़ लगी रही, लेकिन भंवरनाथ मंदिर की विशेष ख्याति के कारण यहां सबसे अधिक श्रद्धालु पहुंचे।भक्त विधि-विधान के साथ जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक कर परिवार की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करते रहे। कतारें इतनी लंबी थीं कि कई श्रद्धालुओं को घंटों इंतजार करना पड़ा, फिर भी चेहरे पर आस्था की चमक कम नहीं हुई। वातावरण पूरी तरह शिवमय हो उठा था।
सुबह 3 बजे खुले कपाट, देर रात तक चला पूजन
महाशिवरात्रि पर भंवरनाथ मंदिर के कपाट प्रातः 3 बजे खोले गए। इसके बाद निरंतर पूजन-अर्चन और अभिषेक का क्रम चलता रहा। दोपहर में शिव बारात निकाली गई, जिसमें बड़ी संख्या में कांवड़िये और स्थानीय श्रद्धालु शामिल हुए। कांवड़ लेकर पहुंचे भक्तों ने गंगाजल से जलाभिषेक कर अपनी आस्था प्रकट की। मंदिर परिसर में रात तक भक्ति संगीत, मंत्रोच्चार और आरती का क्रम चलता रहा।
सुरक्षा के चाक-चौबंद इंतजाम
श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए थे। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में पुलिस बल तैनात रहा। सीसीटीवी कैमरों से निगरानी की गई और भीड़ प्रबंधन के लिए बैरिकेडिंग की व्यवस्था की गई। चिकित्सा सहायता और पेयजल की सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गईं, ताकि भक्तों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
भंवरनाथ मंदिर का पौराणिक महत्व
भंवरनाथ मंदिर सैकड़ों वर्षों से जनपदवासियों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। मान्यता है कि जिस स्थान पर आज मंदिर स्थित है, वहां कभी घना जंगल हुआ करता था। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार जब इस क्षेत्र में निर्माण कार्य के लिए जंगल की सफाई शुरू की गई, तो जमीन के भीतर से हजारों भौंरे निकल पड़े। लोगों में भय व्याप्त हो गया और कार्य रोकना पड़ा।किंवदंती यह भी कहती है कि दोबारा खुदाई करने पर भौंरों के साथ सांप और बिच्छू भी निकलने लगे। इसे दैवी संकेत मानते हुए लोगों ने कार्य रोक दिया। कुछ समय पश्चात इसी स्थान पर स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ। इसे भगवान शिव की इच्छा मानकर ग्रामीणों ने पूजा-अर्चना प्रारंभ की। धीरे-धीरे यहां लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होने लगीं और दूर-दूर तक इस देवस्थान की ख्याति फैल गई।
मनोकामना पूर्ति का केंद्र
भंवरनाथ मंदिर में श्रद्धालु विभिन्न कामनाओं के साथ पहुंचते हैं। पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपत्ति, युवाओं की उत्तम रोजगार और योग्य जीवनसाथी की कामना, तथा परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना—ये सभी भाव यहां देखने को मिलते हैं। यहां विवाह संस्कार भी संपन्न कराए जाते हैं। मान्यता है कि भगवान शिव के साक्षात आशीर्वाद से वैवाहिक जीवन सफल और सुखमय होता है।
शिवमय हुआ जनपद
महाशिवरात्रि के दिन आजमगढ़ का वातावरण पूरी तरह शिवमय रहा। बाजारों में पूजा सामग्री की दुकानों पर चहल-पहल दिखी। मंदिरों में भजन-कीर्तन और आरती का आयोजन हुआ। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी शिवभक्ति में लीन नजर आए। “बम-बम भोले” और “हर-हर महादेव” के जयकारों से पूरा नगर गूंजता रहा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)








