उत्तर प्रदेश के अयोध्या मंडल का पुराना शहर, जिसे कभी फैजाबाद कहा जाता था, अपनी आध्यात्मिक पहचान के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन इसी धरती पर एक ऐसा नाम भी है जिसने धर्म, जाति और पहचान से ऊपर उठकर इंसानियत को अपना कर्म बना लिया—मोहम्मद शरीफ। पिछले लगभग पच्चीस वर्षों में उन्होंने 23,000 से अधिक लावारिस और कटी-फटी लाशों का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार किया है। यह सेवा किसी अभियान का परिणाम नहीं, बल्कि एक पिता के असहनीय दर्द से जन्मी प्रतिज्ञा का विस्तार है।
बेटे की आख़िरी विदाई भी न देख पाए
मोहम्मद शरीफ को आज भी वह दिन शब्दशः याद है जब उनका बड़ा बेटा रईस काम पर निकल रहा था। रईस होमियोपैथी दवाओं का एमआर था, पढ़ने-लिखने का शौकीन और सात भाई-बहनों में सबसे बड़ा। उसकी कमाई से ही घर चलता था। उस सुबह उसकी अम्मी ने ज़िद की कि बिना खाना खाए नहीं जाएगा। मां के हाथ से दो निवाले खाकर वह निकला। किसे पता था कि वह दृश्य आख़िरी होगा।
शाम तक रईस घर नहीं लौटा। दुकान खुली थी, पर वह वहां पहुंचा ही नहीं था। अगली सुबह साइकिल स्टैंड पर जानकारी मिली कि वह सुल्तानपुर जाने की बात कहकर गया था। कई दिनों तक तलाश चली, बड़े शहरों तक खोजबीन हुई, मगर कोई सुराग नहीं मिला। डेढ़ महीने बाद पुलिस घर पहुंची—हाथ में एक थैला और उसमें मुड़ी हुई एक कमीज़। वही कमीज़ जो रईस की थी। पुलिस ने बताया कि उसकी हत्या कर दी गई थी, शव कई दिनों तक सड़क किनारे पड़ा रहा और पहचान न होने पर नदी में बहा दिया गया। केवल शर्ट पर लगे दर्जी के टैग से पुलिस परिवार तक पहुंच सकी।
शोक से जन्मा संकल्प
यह समाचार परिवार के लिए वज्रपात था। मां बेहोश होती रही, घर में कई दिनों तक चूल्हा नहीं जला। मोहम्मद शरीफ इस पीड़ा को भूल नहीं पाए कि उनके बेटे को सम्मानजनक विदाई भी नहीं मिली। पांच-छह महीने बाद उन्होंने निर्णय लिया कि अब किसी और की लाश इस तरह लावारिस नहीं फेंकी जाएगी। वे प्रशासन के पास गए और लिखित में दिया कि जिन शवों का कोई दावेदार न हो, उनका अंतिम संस्कार वे करेंगे।
धीरे-धीरे पुलिस स्टेशन से फोन आने लगे। 72 घंटे तक पहचान न होने पर शव उन्हें सौंपे जाने लगे। सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए लोग हों या अपराध का शिकार बने अनजान चेहरे—मोहम्मद शरीफ ने सबको सम्मान दिया। हिंदू शवों का दाह संस्कार हिंदू रीति-रिवाज से और मुस्लिम शवों को इस्लामी तरीके से दफनाया गया। वे स्वयं उपस्थित रहकर हर विधि की निगरानी करते हैं।
उपहास से सम्मान तक की यात्रा
शुरुआत में समाज ने उनका साथ नहीं दिया। लोग हंसते थे, पागल कहते थे, रिश्तेदारों ने बुलाना बंद कर दिया। मगर उन्होंने हार नहीं मानी। घंटों पोस्टमार्टम हाउस के बाहर बैठकर इंतजार करना उनकी दिनचर्या बन गया। धीरे-धीरे उनके काम की चर्चा फैली। स्थानीय व्यापारियों और बड़े उद्योगपतियों ने सहयोग देना शुरू किया। लकड़ी की व्यवस्था से लेकर कब्र खोदने तक का खर्च समाज ने साझा करना शुरू किया।
साल 2020 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके स्पाइन का ऑपरेशन भी करवाया। लेकिन वे कहते हैं कि असली संतोष उस वादे को निभाने में है जो उन्होंने अपने बेटे की याद में लिया था।
आज भी जारी है सेवा
92 वर्ष की आयु में भी वे किराए के मकान में रहते हैं। एक और बेटे को सड़क दुर्घटना में खो चुके हैं और जो बेटा बचा है वह गंभीर बीमारी से जूझते हुए परिवार चला रहा है। बावजूद इसके, मोहम्मद शरीफ आज भी सेवा में लगे हैं। हर अनजान शव को विदा करते समय उन्हें अपने रईस की याद आ जाती है। उनकी आंखें नम होती हैं, लेकिन कदम नहीं रुकते।
उनकी कहानी केवल व्यक्तिगत दुख की कथा नहीं, बल्कि इंसानियत के उस धर्म की मिसाल है जो हर सीमा से परे है। उन्होंने साबित किया कि संवेदना सबसे बड़ा संस्कार है और अंतिम सम्मान हर मनुष्य का अधिकार।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

