डॉ. जगदीश गुप्त : वैभव से विरक्ति तक
संघर्ष से सिद्धि तक एक उज्ज्वल व्यक्तित्व

डबल स्टैंडर्ड कलर रुल्ड बॉक्स में डिजाइन किया गया कोलाज, जिसमें इलाहाबाद विश्वविद्यालय कैलेंडर 2026 का साहित्यकार पृष्ठ और डॉ. जगदीश गुप्त का अगस्त माह विशेष पृष्ठ प्रदर्शित है।

✍️अनुराग गुप्ता की प्रस्तुति
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समाचार सार : हरदोई के जमींदार परिवार में जन्म लेकर पिता-विहीन बाल्यावस्था, आर्थिक-सामाजिक परिवर्तन, कठोर परिश्रम और अदम्य सिद्धांतों के बल पर प्रयाग विश्वविद्यालय में हिंदी विभागाध्यक्ष बनने तक का सफर—डॉ. जगदीश गुप्त का जीवन केवल उपलब्धि नहीं, बल्कि आत्मगौरव और नैतिक दृढ़ता का अनुपम उदाहरण है।

हिंदी साहित्य का आकाश जब-जब आलोकित होता है, तब-तब उसमें कुछ नक्षत्र ऐसे दीखते हैं जो अपनी दीप्ति से युगों को दिशा देते हैं। हमारे वैश्य समाज ने भी इस आकाश को तीन ऐसे पुरोधाओं से विभूषित किया—महाकवि जयशंकर प्रसाद, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त और उसी परंपरा की तीसरी दीप्ति, मेरे परिवार में जन्मे डॉ. जगदीश गुप्त। यदि प्रसाद जी ने छायावाद को काव्य की दार्शनिक ऊँचाइयाँ दीं और मैथिलीशरण गुप्त ने राष्ट्रीय चेतना को स्वर दिया, तो डॉ. जगदीश गुप्त ने साधना, सिद्धांत और शास्त्रीय अनुशासन से हिंदी की अकादमिक दुनिया में एक आदर्श स्थापित किया। यह आलेख उनके जीवन के उसी बहुआयामी स्वरूप को स्पर्श करने का विनम्र प्रयास है—जहाँ वैभव है, परंतु दंभ नहीं; जहाँ संघर्ष है, परंतु शिकायत नहीं; और जहाँ सफलता है, परंतु सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं।

जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि : वैभव की गोद में एक विरक्त आत्मा

सन 1926 में हरदोई के एक जमींदार और रईस परिवार में उनका जन्म हुआ। जन्मनाम था—जगदीश प्रसाद। पिता शिव प्रसाद जी प्रतिष्ठित जमींदार थे और बाबा लाल भगवान दास के नाम के साथ ‘रईस’ शब्द स्वतः जुड़ जाता था। शाहाबाद में उनके बाबा द्वारा निर्मित ठाकुरद्वारा आज भी उसी भव्यता के साथ खड़ा है। उसके शिखर पर सुशोभित स्वर्ण कलश उस वंश की समृद्धि और श्रद्धा का मौन साक्षी है। वहाँ आज भी पूजा-अर्चना होती है और खानदान के लोग उसका संरक्षण करते हैं। किंतु नियति ने इस वैभव के बीच एक गहरी रिक्तता भी रख छोड़ी थी। पाँच वर्ष की अल्पायु में ही पिता का साया सिर से उठ गया। बालक जगदीश और उनकी बड़ी बहन सुशीला—दोनों की जीवनधारा अचानक बदल गई। माँ रामादेवी ने अल्पायु में ही वैधव्य का दारुण दुःख सहा और सामाजिक परिस्थितियों के कारण दोनों बच्चों को लेकर मायके सीतापुर आ गईं। यह परिवर्तन केवल स्थान का नहीं, जीवन-दृष्टि का भी था। नैमिषारण्य पीठ से दीक्षा लेकर उन्होंने अध्यात्म का मार्ग अपनाया। यही अध्यात्म और सादगी आगे चलकर डॉ. गुप्त के व्यक्तित्व की आधारशिला बना।

मातृपक्ष का संस्कार : वैभव और विद्या का संगम

जगदीश जी के नाना बाबूलाल गुप्त भी अत्यंत संपन्न और प्रभावशाली व्यक्ति थे। लखनऊ के कार्लटन होटल और मसूरी के सेवॉय होटल में इंडियन डिप्टी मैनेजर के रूप में उनकी प्रतिष्ठा थी। 1911 में 180 रुपये मासिक वेतन उस युग में वैभव का प्रतीक था। दो बार डर्बी लॉटरी में बड़ी धनराशि प्राप्त होना उनकी सम्पन्नता का अतिरिक्त प्रमाण था। उनके परिवार में प्रशासनिक दक्षता, कला-रुचि और विद्वता का अद्भुत संगम था। बड़े मामा गया प्रसाद अवध की स्टेट के पर्सनल सेक्रेटरी थे; दूसरे मामा सफल फोटोग्राफर और कलाकार; और सबसे छोटे रामस्वरूप गुप्त हिंदी-अंग्रेजी के विद्वान तथा फाइन आर्ट्स के साधक। इन्हीं रामस्वरूप गुप्त से डॉ. जगदीश को साहित्य और कला की प्रेरणा मिली। माँ रामादेवी स्वयं लोककला में पारंगत थीं। करवा चौथ पर दीवारों पर बनती लोक-चित्रांकनों की परंपरा उनके हाथों जीवित रहती थी। स्पष्ट था कि कला और संवेदना उनके रक्त में थी।

शिक्षा : मेधा की उज्ज्वल यात्रा

सीतापुर में प्रारंभिक शिक्षा के पश्चात वे मुरादाबाद गए, जहाँ मौसा जी के संरक्षण में हाई स्कूल परीक्षा में उत्तर प्रदेश की मेरिट में प्रथम स्थान प्राप्त किया। यह केवल शैक्षणिक सफलता नहीं, आत्मविश्वास की उद्घोषणा थी। तत्पश्चात कानपुर के बीएनएसडी कॉलेज से इंटरमीडिएट में द्वितीय स्थान प्राप्त कर उन्होंने अपनी मेधा सिद्ध की। फिर प्रयाग की धरती—जहाँ से बी.ए., एम.ए., पीएचडी और डी.लिट की उपाधियाँ अर्जित कीं। यहीं से उनका शैक्षणिक जीवन प्रारंभ हुआ और वे हिंदी विभाग में प्रवक्ता नियुक्त हुए। आगे चलकर विभागाध्यक्ष बने। प्रयाग विश्वविद्यालय का वह वातावरण, जहाँ हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकारों का सानिध्य मिला, उनके चिंतन को गहराई और व्यापकता प्रदान करता रहा।

सिद्धांतों का पुरुष : सिफारिश से इंकार

डॉ. जगदीश गुप्त का व्यक्तित्व केवल विद्वत्ता तक सीमित नहीं था; वह नैतिक दृढ़ता का प्रतीक भी था। उनकी पुत्री इंटरमीडिएट में असफल हुईं, किंतु उन्होंने किसी प्रकार की सिफारिश नहीं की। प्रभावशाली संबंध होने के बावजूद उन्होंने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। इसी प्रकार जब मैंने प्रतियोगिता में सफलता के बाद उनसे सिफारिश का आग्रह किया, तो उन्होंने स्पष्ट कहा—“मेहनत से मिली सफलता ही स्थायी सम्मान देती है।” उस समय भले निराशा हुई, परंतु वही शिक्षा आगे चलकर मेरे जीवन की पूँजी बनी।

कला और आधुनिकता : संवाद की संस्कृति

कला के क्षेत्र में भी उनका दृष्टिकोण व्यापक था। पारंपरिक कला से आधुनिकता की ओर उनका झुकाव उनके चिंतन की प्रगतिशीलता को दर्शाता है। सीतापुर में मामा जी के साथ आधुनिक कला पर होने वाले संवाद केवल मतभेद नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच विचार-विनिमय के सुंदर उदाहरण थे। वे मुस्कराते हुए तर्क रखते और परंपरा का सम्मान करते हुए आधुनिक दृष्टि प्रस्तुत करते। यही संतुलन उनके व्यक्तित्व की विशिष्टता था।

व्यक्तित्व की परिणति : वैभव से विरक्ति, संघर्ष से सिद्धि

डॉ. जगदीश गुप्त का जीवन एक संतुलित समन्वय है—वैभव में जन्म, परंतु सादगी का जीवन; कठिनाइयों से भरा बचपन, परंतु आत्मविश्वास से भरा यौवन; अकादमिक ऊँचाइयाँ, परंतु विनम्रता का आभूषण। उन्होंने सिद्ध किया कि मनुष्य की असली संपत्ति उसका चरित्र है। विभागाध्यक्ष पद से अवकाश लेते समय वे केवल एक पदाधिकारी नहीं, बल्कि आदर्श शिक्षक के रूप में स्मरण किए गए।

आज जब समाज में सफलता के साधन अक्सर साध्य से अधिक महत्व पा लेते हैं, तब डॉ. जगदीश गुप्त का जीवन स्मरण कराता है कि आत्मसम्मान से अर्जित उपलब्धि ही सच्ची विजय है। ऐसे सिद्धांतनिष्ठ, कर्मयोगी और विद्वान व्यक्तित्व को शत-शत नमन।

FAQ

डॉ. जगदीश गुप्त का जन्म कब और कहाँ हुआ?

उनका जन्म सन 1926 में उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के एक प्रतिष्ठित जमींदार परिवार में हुआ।

उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा कहाँ से प्राप्त की?

उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय (इलाहाबाद विश्वविद्यालय) से बी.ए., एम.ए., पीएचडी और डी.लिट की उपाधियाँ प्राप्त कीं।

उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता क्या थी?

उनकी सबसे बड़ी विशेषता सिद्धांतों पर अडिग रहना और सिफारिश या अनुचित लाभ से दूर रहना था।

डॉ. जगदीश गुप्त का प्रेरक जीवनवृत्त—हरदोई के जमींदार परिवार से प्रयाग विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष बनने तक का संघर्ष, सिद्धांत और आत्मगौरव की अद्भुत यात्रा।
समाचार दर्पण 24 के संपादक कार्य करते हुए, संयमित शब्द और गहरे असर वाली पत्रकारिता का प्रतीकात्मक दृश्य
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