स्वास्थ्य विभाग की बड़ी लापरवाही : कामां में गर्भवती महिला की कर दी नसबंदी, सोनोग्राफी में 4 माह का गर्भ उजागर

ऑपरेशन थिएटर में सर्जिकल टीम द्वारा नसबंदी प्रक्रिया करते हुए चिकित्सक और स्टाफ

हिमांशु मोदी की रिपोर्ट
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स्वास्थ्य विभाग की बड़ी लापरवाही का मामला राजस्थान के डीग जिले के कामां कस्बे से सामने आया है, जिसने सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नसबंदी ऑपरेशन से पहले की गई प्रेग्नेंसी जांच में महिला को नेगेटिव बताया गया और उसी आधार पर ऑपरेशन कर दिया गया। हालांकि बाद में कराई गई सोनोग्राफी रिपोर्ट में महिला चार माह की गर्भवती पाई गई। यह प्रकरण चिकित्सा लापरवाही, रिकॉर्ड प्रबंधन और लक्ष्य आधारित नसबंदी अभियानों की पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर उभरा है।

समाचार सार: कामां उप जिला अस्पताल में नसबंदी से पूर्व प्रेग्नेंसी टेस्ट नेगेटिव दर्शाया गया। ऑपरेशन के तीन माह बाद सोनोग्राफी में महिला चार माह की गर्भवती पाई गई। पीड़िता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हुए निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग की है।

मामला कैसे सामने आया?

पीड़िता देवकी पत्नी वेदप्रकाश के अनुसार 15 नवंबर 2025 को कामां उप जिला अस्पताल में उनका नसबंदी ऑपरेशन किया गया। ऑपरेशन से पहले लैब में प्रेग्नेंसी टेस्ट कराया गया, जिसकी रिपोर्ट नेगेटिव बताई गई। चिकित्सकीय टीम ने इसी रिपोर्ट के आधार पर प्रक्रिया पूरी की। 9 फरवरी 2026 को पेट दर्द की शिकायत पर डीग के सरकारी अस्पताल में सोनोग्राफी कराई गई, जिसमें लगभग चार माह की गर्भावस्था सामने आई। यहीं से स्वास्थ्य विभाग की बड़ी लापरवाही का यह मामला उजागर हुआ।

वीडियो में डॉक्टर और महिला के बीच बहस

घटना से जुड़ा एक वीडियो भी सामने आया है। इसमें महिला क्लेम की मांग करती दिखाई दे रही है, जबकि चिकित्सक का कथित बयान है कि बच्चा ऑपरेशन से पहले का है और ऑपरेशन फेल नहीं हुआ। महिला का सवाल है कि यदि वह पहले से गर्भवती थी तो रिपोर्ट नेगेटिव कैसे आई? और यदि रिपोर्ट सही थी, तो फिर सोनोग्राफी में गर्भावस्था क्यों दिखी? डॉक्टर द्वारा इसे “मानवीय भूल” बताना भी विवाद का विषय बन गया है।

रिपोर्ट और सोनोग्राफी में विरोधाभास

नसबंदी ऑपरेशन की क्लेम रिपोर्ट और लैब जांच रिपोर्ट में गर्भावस्था नेगेटिव दर्ज है। इसके विपरीत, हालिया सोनोग्राफी में महिला को चार माह की गर्भवती बताया गया। इस विरोधाभास ने स्वास्थ्य विभाग की बड़ी लापरवाही को और गंभीर बना दिया है। यदि जांच में चूक हुई है तो यह तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि गंभीर चिकित्सकीय लापरवाही मानी जाएगी।

प्रशासन का पक्ष

डीग कलेक्टर उत्सव कौशल ने कहा है कि मामला संज्ञान में है और संबंधित अधिकारियों से रिपोर्ट लेकर जांच कराई जाएगी। वहीं सीएमएचओ विजय सिंघल ने स्पष्ट किया कि यदि गर्भवती महिला का नसबंदी ऑपरेशन हुआ है तो यह गलत है और जांच के बाद जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

जवाबदेही और महिला स्वास्थ्य का प्रश्न

स्वास्थ्य विभाग की बड़ी लापरवाही केवल एक घटना नहीं बल्कि महिला स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। नसबंदी एक स्थायी प्रक्रिया है, जिसके लिए सटीक जांच और स्पष्ट सहमति अनिवार्य होती है। यदि गर्भावस्था की स्थिति में ऑपरेशन किया गया है तो यह मां और गर्भस्थ शिशु दोनों के स्वास्थ्य के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है। इसलिए निष्पक्ष जांच और पारदर्शी कार्रवाई आवश्यक है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

क्या गर्भावस्था में नसबंदी ऑपरेशन किया जा सकता है?
सामान्य परिस्थितियों में गर्भावस्था की पुष्टि होने पर नसबंदी ऑपरेशन नहीं किया जाता। ऐसी स्थिति में प्रक्रिया को स्थगित किया जाता है, क्योंकि यह चिकित्सकीय जोखिम बढ़ा सकता है।
यदि रिपोर्ट में त्रुटि हो जाए तो जिम्मेदारी किसकी होती है?
जांच रिपोर्ट तैयार करने वाली लैब, संबंधित चिकित्सक और अस्पताल प्रशासन सभी की जिम्मेदारी तय की जा सकती है। जांच के बाद ही स्पष्ट होता है कि त्रुटि किस स्तर पर हुई।
क्या पीड़िता को मुआवजा मिल सकता है?
यदि चिकित्सकीय लापरवाही सिद्ध होती है तो पीड़िता को सरकारी नियमों के तहत मुआवजा दिया जा सकता है। इसके लिए प्रशासनिक जांच और रिपोर्ट आवश्यक होती है।
क्या इस मामले में पुलिस जांच भी संभव है?
हाँ, यदि पीड़िता ने शिकायत दर्ज कराई है तो पुलिस जांच कर सकती है। चिकित्सकीय दस्तावेजों और गवाहों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होती है।


स्वास्थ्य विभाग की बड़ी लापरवाही कामां में सामने आई, जहां नसबंदी से पहले प्रेग्नेंसी रिपोर्ट नेगेटिव दिखाकर ऑपरेशन किया गया, लेकिन बाद में सोनोग्राफी में महिला चार माह की गर्भवती पाई गई। पढ़ें पूरा मामला।
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