सोहगरा धाम उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के सलेमपुर क्षेत्र में, उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमा पर स्थित एक प्राचीन एवं आस्था से जुड़ा धार्मिक स्थल है। सावन और महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां स्थित बाबा हंस नाथ मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाता है। विशाल शिवलिंग, मनोकामना पूर्ण होने की लोकमान्यता और द्वापर युग से जुड़ी किंवदंतियों के कारण यह स्थान पूर्वांचल ही नहीं, बल्कि बिहार के श्रद्धालुओं के बीच भी अत्यंत प्रसिद्ध है। खासकर सावन के सोमवार को जलाभिषेक के लिए उमड़ने वाली भीड़ इस बात का प्रमाण है कि यहां की आस्था पीढ़ियों से अटूट बनी हुई है।
सीमा पर स्थित आस्था का केंद्र: सोहगरा धाम की भौगोलिक पहचान
देवरिया जिले के सलेमपुर क्षेत्र में स्थित सोहगरा धाम भौगोलिक दृष्टि से भी विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमा पर अवस्थित है। इस कारण दोनों राज्यों के श्रद्धालु यहां बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। ग्रामीण परिवेश और हरियाली से घिरा यह स्थल श्रद्धा और शांति का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है। सावन के महीने में पूरा इलाका शिवमय हो उठता है और “हर-हर महादेव” तथा “बोल-बम” के जयघोष वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देते हैं।
बाबा हंस नाथ मंदिर और विशाल शिवलिंग की विशेषता
सोहगरा धाम का सबसे बड़ा आकर्षण यहां स्थित बाबा हंस नाथ मंदिर है, जहां भगवान शिव का विशाल शिवलिंग स्थापित है। स्थानीय मान्यता के अनुसार यह शिवलिंग स्वयंभू है, अर्थात यह स्वयं प्रकट हुआ था। मंदिर की संरचना भले ही कालांतर में विकसित हुई हो, लेकिन शिवलिंग की प्राचीनता को लेकर लोगों में गहरी आस्था है। श्रद्धालु विशेष रूप से सोमवार के दिन जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और पूजा-अर्चना के लिए यहां पहुंचते हैं।
सावन के दूसरे सोमवार को तो यहां श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। महिलाएं और कुंवारी युवतियां विशेष रूप से मनचाहा वर और संतान प्राप्ति की कामना लेकर शिवलिंग पर जल और बेलपत्र अर्पित करती हैं। यह मंदिर संतानहीन दंपत्तियों के लिए भी आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है।
द्वापर युग से जुड़ी किंवदंतियां और उषा-अनिरुद्ध की कथा
सोहगरा धाम की महत्ता केवल वर्तमान आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें पौराणिक कथाओं में भी मिलती हैं। स्थानीय लोककथाओं के अनुसार यह मंदिर द्वापर युग का है। कहा जाता है कि राक्षसराज बाणासुर की पुत्री उषा ने यहां स्थापित विशाल शिवलिंग की पूजा की थी। उसकी आराधना के फलस्वरूप उसका विवाह भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध से हुआ। इस कथा के कारण यह स्थान प्रेम और विवाह की मनोकामना पूर्ण करने वाला स्थल माना जाता है।
हालांकि इन कथाओं के ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन पीढ़ियों से चली आ रही लोकश्रुतियां इस मंदिर को रहस्यमय और दिव्य स्वरूप प्रदान करती हैं। मंदिर के पुजारी भी इन कथाओं को सत्य मानते हुए इसे द्वापर युगीन बताते हैं।
काशी नरेश हंसध्वज और मंदिर के नाम की कथा
मंदिर के नाम से जुड़ी एक और लोकप्रिय कथा काशी नरेश राजा हंसध्वज से संबंधित है। मान्यता है कि संतान प्राप्ति की इच्छा लेकर वे यहां आए थे और उनकी मनोकामना पूर्ण हुई। इसके बाद उन्होंने मंदिर का भव्य निर्माण कराया। तभी से यह स्थान बाबा हंस नाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया। इस घटना के बाद से संतानहीन दंपत्तियों के लिए यह मंदिर विशेष आस्था का केंद्र बन गया।
सावन और महाशिवरात्रि: श्रद्धा का महापर्व
यद्यपि पूरे वर्ष यहां श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, किंतु सावन का महीना और महाशिवरात्रि विशेष महत्व रखते हैं। सावन के प्रत्येक सोमवार को यहां मेला जैसा दृश्य देखने को मिलता है। दूर-दराज के गांवों और शहरों से भक्त जलाभिषेक के लिए कांवड़ लेकर पहुंचते हैं। पूरा क्षेत्र भगवा वस्त्रधारी शिवभक्तों से आच्छादित हो जाता है।
मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन, आरती और प्रसाद वितरण का आयोजन होता है। महिलाएं सुहाग की रक्षा और सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। वहीं कुंवारी युवतियां योग्य वर की प्राप्ति के लिए विशेष पूजा करती हैं।
स्थानीय आस्था और सामाजिक प्रभाव
सोहगरा धाम केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी है। यहां यूपी और बिहार के लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिर के कारण आसपास के क्षेत्र में छोटे व्यवसाय, प्रसाद की दुकानें और धार्मिक सामग्री की बिक्री भी बढ़ती है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिलता है।
ग्रामीण अंचल में स्थित होने के बावजूद यह स्थल आध्यात्मिक पर्यटन की दृष्टि से संभावनाओं से भरा हुआ है। यदि प्रशासनिक स्तर पर उचित व्यवस्थाएं और प्रचार-प्रसार किया जाए तो यह स्थान पूर्वांचल के प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्रों में शामिल हो सकता है।
निष्कर्ष: अटूट विश्वास की जीवंत मिसाल
सोहगरा धाम में स्थित बाबा हंस नाथ मंदिर आस्था, इतिहास और लोककथाओं का संगम है। स्वयंभू शिवलिंग की मान्यता, उषा-अनिरुद्ध की कथा और काशी नरेश हंसध्वज से जुड़ी किंवदंतियां इस स्थल को विशेष पहचान देती हैं। सावन और शिवरात्रि के अवसर पर उमड़ती भीड़ इस बात का प्रमाण है कि यहां की आस्था समय के साथ और भी प्रगाढ़ होती जा रही है। धार्मिक श्रद्धा के साथ-साथ यह स्थान सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का भी संदेश देता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)








