“अंखिया निकाल लेब…” : जब पद का अहंकार मर्यादा पर भारी पड़ गया

रेलवे पार्सल अधीक्षक और आरपीएफ जवान के बीच बहस का दृश्य, कथित धमकी से जुड़ा वीडियो

✍️दुर्गा प्रसाद शुक्ला की खास रिपोर्ट
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महज़ 1:45 मिनट का एक वीडियो इन दिनों सार्वजनिक संस्थानों की कार्यसंस्कृति पर गंभीर बहस छेड़ रहा है। वीडियो में कथित तौर पर रेलवे पार्सल अधीक्षक और आरपीएफ के एक जवान के बीच तीखी बहस दिखाई देती है। इसी दौरान अधिकारी भोजपुरी में कहते सुनाई पड़ते हैं—“राजेश सिंह नाम ह, पार्सल अधीक्षक मऊ… अंखिया निकाल लेब… जानत नइखs हउवा कैसे बात करत हउवा…”। यह कथन केवल व्यक्तिगत आक्रोश का परिणाम है या पद के अहंकार का प्रदर्शन—यही प्रश्न इस पूरे प्रकरण को एक व्यापक मुद्दा बना देता है।

भाषा नहीं, मानसिकता का प्रश्न

भोजपुरी हमारी समृद्ध लोकभाषा है, जिसमें अपनापन, संस्कृति और संवेदना की गूंज है। किंतु जब उसी भाषा में सार्वजनिक पद पर बैठा व्यक्ति धमकी देता है—“अंखिया निकाल लेब…”—तो सवाल भाषा का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो संवाद की जगह भय का सहारा लेती है। लोकतांत्रिक संस्थानों में पद का अर्थ अधिकार से अधिक जिम्मेदारी होता है। यदि शब्दों में संयम नहीं, तो पद की गरिमा स्वतः संदिग्ध हो जाती है।

वर्दी और पद: समान सम्मान का सिद्धांत

रेलवे जैसे विशाल तंत्र में पार्सल विभाग और आरपीएफ दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। एक व्यवस्था की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, तो दूसरा वाणिज्यिक संचालन को संभालता है। ऐसे में यदि एक अधिकारी दूसरे वर्दीधारी से कहता है—“जानत नइखs हउवा कैसे बात करत हउवा…”—तो यह केवल दो व्यक्तियों का टकराव नहीं रहता, बल्कि संस्थागत समन्वय पर प्रश्नचिह्न बन जाता है। वर्दी हो या पद, दोनों का आधार सम्मान और अनुशासन है, वर्चस्व नहीं।

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आचारसंहिता बनाम व्यवहारिक यथार्थ

सरकारी सेवा नियम स्पष्ट रूप से मर्यादित और शिष्ट आचरण की अपेक्षा करते हैं। किंतु कई बार व्यवहार में पद की ऊंचाई संवाद को दबा देती है। यदि वीडियो में दर्ज कथन जांच में सत्य सिद्ध होते हैं, तो यह न केवल व्यक्तिगत आचरण का मामला होगा, बल्कि संस्थागत अनुशासन की कसौटी भी बनेगा। सार्वजनिक पदाधिकारी का हर शब्द संस्था की प्रतिष्ठा का प्रतिनिधि होता है।

सत्ता का मनोविज्ञान और संवाद की आवश्यकता

सत्ता अक्सर अधिकार का भाव उत्पन्न करती है, परंतु लोकतंत्र में शक्ति का मूल स्रोत जनता का विश्वास है। जब पद संवाद की जगह दबाव का माध्यम बनता है, तो विश्वास कमजोर होता है। संभव है कि कार्यस्थल का तनाव या तत्कालिक विवाद इस स्थिति की पृष्ठभूमि हो, परंतु तनाव कभी भी हिंसक भाषा का औचित्य नहीं बन सकता। बल्कि यह संकेत देता है कि संस्थागत स्तर पर संवाद कौशल और भावनात्मक संतुलन के प्रशिक्षण की आवश्यकता है।

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सोशल मीडिया का दौर और जवाबदेही

यह घटना इसलिए व्यापक चर्चा में आई क्योंकि उसका वीडियो सार्वजनिक हुआ। डिजिटल युग में पारदर्शिता अनिवार्य हो चुकी है। हालांकि निष्पक्ष जांच आवश्यक है ताकि सभी पक्षों को सुनकर तथ्य स्पष्ट किए जा सकें, फिर भी यह स्पष्ट है कि सार्वजनिक पद पर आसीन व्यक्ति के व्यवहार की जवाबदेही अब सीमित दायरों में नहीं रह गई है।

क्या यह अपवाद है या संकेत?

प्रश्न यह भी है कि क्या यह केवल एक व्यक्ति की उग्रता है, या संस्थागत संस्कृति में पनपती किसी व्यापक प्रवृत्ति का संकेत? यदि इसे केवल व्यक्तिगत घटना मानकर छोड़ दिया गया, तो हम उस गहरे प्रश्न से बच जाएंगे, जो पारस्परिक सम्मान और सहयोग की संस्कृति से जुड़ा है। रेलवे जैसे विशाल तंत्र में विभागीय समन्वय ही सेवा की गुणवत्ता सुनिश्चित करता है। जहां सम्मान कमज़ोर पड़ता है, वहां सहयोग भी प्रभावित होता है।

सुधार की दिशा: संस्थागत आत्ममंथन का अवसर

इस प्रकरण को विवाद से आगे बढ़ाकर सुधार के अवसर के रूप में देखना चाहिए। निष्पक्ष जांच, व्यवहारिक प्रशिक्षण, विभागीय संवाद मंच और स्पष्ट जवाबदेही तंत्र—ये सभी कदम संस्थागत संस्कृति को सुदृढ़ कर सकते हैं। पद चाहे जितना ऊंचा हो, आचरण के मानक समान होने चाहिए। सार्वजनिक जीवन में मर्यादा ही वह आधार है, जिस पर विश्वास की इमारत खड़ी होती है।

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निष्कर्ष: शब्दों से परे संदेश

“राजेश सिंह नाम ह, पार्सल अधीक्षक मऊ… अंखिया निकाल लेब…”—यह कथन यदि सत्यापित होता है, तो यह केवल एक धमकी नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतीक है जिसमें पद को संवाद से ऊपर रखा जाता है। लोकतंत्र में पद की गरिमा व्यवहार से सिद्ध होती है, भय से नहीं। यह घटना हमें स्मरण कराती है कि संस्थान केवल नियमों से नहीं, बल्कि आचरण से मजबूत होते हैं। यदि इस प्रसंग से सीख लेकर सम्मान और संयम की संस्कृति को मजबूत किया जाए, तो यही विवाद सकारात्मक बदलाव का आधार बन सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

वीडियो में अधिकारी ने क्या कहा?

वीडियो में कथित तौर पर अधिकारी भोजपुरी में कहते सुनाई पड़ते हैं—“राजेश सिंह नाम ह, पार्सल अधीक्षक मऊ… अंखिया निकाल लेब… जानत नइखs हउवा कैसे बात करत हउवा…”।

क्या यह मामला जांच के दायरे में है?

ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच आवश्यक होती है ताकि सभी पक्षों की बात सुनकर तथ्य स्पष्ट किए जा सकें और आवश्यक कार्रवाई हो सके।

इस घटना से क्या व्यापक संदेश निकलता है?

यह घटना सार्वजनिक संस्थानों में संवाद, मर्यादा और जवाबदेही की संस्कृति को मजबूत करने की आवश्यकता की ओर संकेत करती है।

समाचार दर्पण 24 के संपादक कार्य करते हुए, संयमित शब्द और गहरे असर वाली पत्रकारिता का प्रतीकात्मक दृश्य
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