मुम्बई में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर विमर्श: पुस्तक चर्चा के बहाने राष्ट्रीय सुरक्षा और संवेदना पर गंभीर संवाद


✍️ शामी एम इरफान की रिपोर्ट

🔎 सार संक्षेप: यह केवल एक पुस्तक चर्चा नहीं थी, बल्कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बहाने भारत की सुरक्षा नीति, सैन्य रणनीति और मानवीय संवेदनाओं पर गहराई से विचार करने का मंच बना।
मुंबई में आयोजित ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर पुस्तक चर्चा कार्यक्रम ने राष्ट्रीय सुरक्षा और साहित्यिक विमर्श को एक साथ जोड़ते हुए गंभीर संवाद का मंच तैयार किया। इस अवसर पर डॉ करुणाशंकर उपाध्याय ने सैन्य रणनीति, आतंकवाद विरोधी नीति और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन पर विस्तृत विचार रखे। कार्यक्रम में उपस्थित श्रोताओं और साहित्यकारों ने न केवल इस विषय को गहराई से समझा, बल्कि समकालीन भारत की सुरक्षा नीति पर भी नए दृष्टिकोण प्राप्त किए।

मुम्बई के सांस्कृतिक और बौद्धिक परिदृश्य में हाल ही में आयोजित एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम ने साहित्य और समसामयिक राष्ट्रीय मुद्दों के बीच सेतु का कार्य किया। गोरेगांव पश्चिम स्थित केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट में चित्रनगरी संवाद मंच द्वारा आयोजित इस विशेष पुस्तक चर्चा में प्रख्यात समालोचक डॉ करुणाशंकर उपाध्याय की नवीन कृति “ऑपरेशन सिंदूर: अनजाने संदर्भ” केंद्र में रही। यह आयोजन मात्र एक पुस्तक विमोचन या औपचारिक चर्चा तक सीमित नहीं था, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य रणनीति और मानवीय संवेदनाओं के बहुआयामी पहलुओं पर गहन विमर्श का मंच बनकर उभरा।

📚 पुस्तक चर्चा का उद्देश्य और संदर्भ

कार्यक्रम का प्रारंभ एक गंभीर और विचारोत्तेजक वातावरण में हुआ, जहां उपस्थित श्रोताओं के बीच इस विषय को लेकर विशेष जिज्ञासा और संवेदनशीलता देखी गई। डॉ करुणाशंकर उपाध्याय ने अपने वक्तव्य में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को केवल एक सैन्य अभियान के रूप में नहीं, बल्कि भारत की बदलती सुरक्षा नीति और रणनीतिक दृष्टिकोण का प्रतीक बताया। उन्होंने विस्तार से बताया कि 6 और 7 मई 2025 की रात भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा संचालित यह अभियान एक सुनियोजित और लक्षित कार्रवाई थी, जिसका उद्देश्य सीमा पार सक्रिय आतंकवादी ढांचे को निष्क्रिय करना था।

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🛡️ सैन्य रणनीति और बदलता दृष्टिकोण

डॉ उपाध्याय ने अपने विश्लेषण में यह स्पष्ट किया कि यह अभियान पारंपरिक सैन्य कार्रवाई से अलग था, क्योंकि इसमें सटीकता, समय-निर्धारण और खुफिया जानकारी का अत्यंत प्रभावी उपयोग किया गया। उन्होंने कहा कि बहावलपुर, कोटली, मुज़फ्फराबाद और मुरीदके जैसे क्षेत्रों में स्थित आतंकी ठिकानों पर किए गए प्रहार इस बात का संकेत हैं कि भारत अब केवल प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं, बल्कि पूर्व-नियोजित रणनीति के तहत कार्य करने वाला राष्ट्र बन चुका है।

💔 ‘ऑपरेशन सिंदूर’ नाम की संवेदनात्मक पृष्ठभूमि

वक्तव्य के दौरान उन्होंने इस अभियान के नाम—‘ऑपरेशन सिंदूर’—की पृष्ठभूमि पर भी विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह नाम केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि उन महिलाओं की पीड़ा और सम्मान से जुड़ा है, जिन्होंने पहलगाम की त्रासदी में अपने जीवनसाथी खो दिए। इस नामकरण ने इस अभियान को एक मानवीय और भावनात्मक आयाम प्रदान किया, जो इसे केवल रणनीतिक कार्रवाई से आगे ले जाकर सामाजिक चेतना से भी जोड़ता है।

🧠 श्रोताओं के साथ संवाद

कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा श्रोताओं के साथ संवाद रहा, जिसमें उपस्थित लोगों ने अपने प्रश्नों के माध्यम से विषय को और विस्तार दिया। मधुबाला शुक्ला, प्रज्ञा मिश्र, रचना शंकर और विशू जैसे श्रोताओं ने राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य निर्णयों की पारदर्शिता और मानवीय दृष्टिकोण से जुड़े सवाल उठाए। डॉ उपाध्याय ने इन प्रश्नों के उत्तर में संतुलित और विचारशील दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।

🎤 काव्य पाठ ने जोड़ा भावनात्मक आयाम

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में विविधरंगी काव्य पाठ का आयोजन किया गया, जिसमें कई रचनाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से समाज, राष्ट्र और संवेदनाओं के विविध पहलुओं को अभिव्यक्त किया। इस सत्र ने यह स्पष्ट किया कि साहित्य केवल विचार नहीं, बल्कि संवेदना का भी माध्यम है।

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📌 निष्कर्ष: संवाद ही समाधान की दिशा

यह कार्यक्रम केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि एक गंभीर राष्ट्रीय विमर्श का मंच साबित हुआ। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बहाने यह स्पष्ट हुआ कि सुरक्षा, रणनीति और संवेदना—तीनों का संतुलन ही एक सशक्त राष्ट्र की पहचान है।

❓ FAQ

यह कार्यक्रम कहां आयोजित हुआ?

👉 मुम्बई के गोरेगांव पश्चिम स्थित केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट में।

पुस्तक का मुख्य विषय क्या है?

👉 ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के माध्यम से भारत की सुरक्षा नीति और सैन्य रणनीति का विश्लेषण।

कार्यक्रम में कौन-कौन शामिल हुए?

👉 साहित्यकार, श्रोता और विभिन्न क्षेत्र के बुद्धिजीवी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

इस चर्चा का मुख्य उद्देश्य क्या था?

👉 राष्ट्रीय सुरक्षा और संवेदनात्मक दृष्टिकोण पर गंभीर विमर्श करना।

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