आलम बदी विधायक : प्रोटोकॉल से दूर, ईमानदारी के सबसे करीब खड़ा एक राजनीतिक जीवन

समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ विधायक आलम बदी की सादगीपूर्ण तस्वीर, पृष्ठभूमि में सपा का झंडा

✍️कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट
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आलम बदी विधायक—यह नाम आज के दौर की उस राजनीति की याद दिलाता है, जो शोर से नहीं बल्कि आचरण से पहचानी जाती है। विधायक शब्द सुनते ही आमतौर पर सुरक्षा घेरे, गाड़ियों के काफिले, प्रोटोकॉल और आलीशान बंगलों की छवि सामने आती है। मगर उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले में समाजवादी पार्टी के सबसे वरिष्ठ विधायक आलम बदी इस धारणा को पूरी तरह बदल देते हैं। 90 वर्ष की उम्र में भी वे शहर की एक छोटी सी गली में अपने परिवार के साथ सादगीपूर्ण जीवन जीते हैं। उनका रहन-सहन देखकर यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या आज की राजनीति में अब भी ऐसे जनप्रतिनिधि मौजूद हैं।

जब सत्ता साधन बन जाए, तब राजनीति कमजोर होती है—और जब सेवा साध्य हो, तब आलम बदी जैसे विधायक जन्म लेते हैं।

सादगी भरा जीवन, मजबूत राजनीतिक चरित्र

16 मार्च 1936 को जन्मे आलम बदी आज़मगढ़ जिले के विंदावल गांव के निवासी हैं। उन्होंने 12वीं तक शिक्षा प्राप्त की और इसके बाद इलेक्ट्रिकल व मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया। राजनीति में आने से पहले वे एक इंजीनियर के रूप में कार्यरत थे। सम्मानजनक नौकरी छोड़कर जनसेवा की राह चुनना आसान नहीं था, लेकिन आलम बदी ने इसे चुनौती नहीं, बल्कि जिम्मेदारी माना।

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परिवार और मूल्यों के साथ संतुलन

आलम बदी की पत्नी का नाम कुदैशा खान है और उनके छह बच्चे हैं। खास बात यह है कि उनके बच्चों में से केवल एक ही राजनीति में सक्रिय है, जबकि अन्य सभी अपने-अपने पेशे में कार्यरत हैं। यह उनके उस दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसमें राजनीति को सत्ता की विरासत नहीं बल्कि सेवा का माध्यम माना गया है।

1996 से जनता के भरोसे की राजनीति

आलम बदी ने 1996 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद वे लगातार जनता के बीच सक्रिय रहे। केवल 2007 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उसके बाद उन्होंने लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीतकर यह साबित किया कि भरोसा दिखावे से नहीं, काम से बनता है। वर्तमान में वे पांचवीं बार विधायक हैं।

कम खर्च, सीधा जनसंपर्क

आज जब चुनावों में करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, तब आलम बदी का प्रचार तरीका बिल्कुल अलग रहा है। वे कभी लाव-लश्कर के साथ नहीं चलते। कई बार यह भी सामने आया कि उन्होंने चुनाव प्रचार में केवल दो से तीन लाख रुपये खर्च किए। उनका मानना है कि जनता से सीधा संवाद ही सबसे प्रभावी प्रचार है।

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मंत्री पद ठुकराने की मिसाल

राजनीति में मंत्री पद को उपलब्धि माना जाता है, लेकिन आलम बदी ने इसे ठुकराकर एक अलग उदाहरण पेश किया। 2004 और 2012 में मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव ने उन्हें मंत्री बनने का प्रस्ताव दिया, लेकिन हर बार उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि यह जिम्मेदारी किसी नौजवान को मिलनी चाहिए। उनका मानना था कि मंत्री बनने से वे अपने क्षेत्र की जनता से दूरी महसूस करेंगे।

2014 में ईमानदार सलाह

2014 के लोकसभा चुनाव में जब अधिकांश नेताओं ने सकारात्मक रिपोर्ट दी, तब आलम बदी ने मुलायम सिंह यादव को जमीनी हकीकत से अवगत कराया। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी कि अगर संगठनात्मक स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो चुनाव प्रभावित हो सकता है। बाद में धर्मेंद्र यादव को कई विधानसभा क्षेत्रों में सक्रिय किया गया, जिसका सीधा असर चुनाव परिणामों में देखने को मिला।

ना कमीशन, ना समझौता

आलम बदी पर आज तक किसी भी प्रकार की कमीशनखोरी का आरोप नहीं लगा। वे सार्वजनिक मंचों पर यह स्पष्ट कहते रहे हैं कि न वे खुद कमीशन लेते हैं और न ही अपने बच्चों को ठेकेदारों के पास भेजते हैं। वे अपने विधानसभा क्षेत्र में हुए विकास कार्यों की गुणवत्ता की स्वयं निगरानी करते हैं।

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संपत्ति नहीं, साख की राजनीति

2022 के चुनावी हलफनामे के अनुसार आलम बदी के पास लगभग 50 लाख रुपये की चल-अचल संपत्ति है। इसमें 10 लाख रुपये की पुरानी बोलेरो शामिल है। उनके पास न तो आलीशान बंगले हैं और न ही महंगी गाड़ियां, लेकिन जनता का भरोसा उनकी सबसे बड़ी पूंजी है।

आज की राजनीति में एक अपवाद

जब राजनीति पर अविश्वास गहराता जा रहा है, तब आलम बदी जैसे विधायक यह साबित करते हैं कि ईमानदारी अब भी प्रासंगिक है। वे न तो शोर मचाते हैं और न ही दिखावे में विश्वास रखते हैं। वे बस अपना काम करते हैं—शांत, सधे और जिम्मेदार ढंग से।

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