‘वध 2’ : दमदार अभिनय के बीच कहानी क्यों छोड़ जाती है अधूरापन

फिल्म वध 2 का पोस्टर, जिसमें संजय मिश्रा और नीना गुप्ता गंभीर भाव में दिखाई दे रहे हैं

✍️शामी एम इरफान की रिपोर्ट | मुंबई
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क्या सिर्फ मजबूत अभिनय के सहारे कोई थ्रिलर दर्शकों के ज़हन में टिक सकती है? या फिर कहानी में मौजूद तर्कों की कमजोरी अंततः पूरे प्रभाव को सीमित कर देती है—‘वध 2’ इन्हीं सवालों के बीच आगे बढ़ती है।

‘वध 2’ नाम सुनते ही 2022 में आई फिल्म ‘वध’ की याद आना स्वाभाविक है, लेकिन यह साफ कर देना ज़रूरी है कि यह उसका सीधा सीक्वल नहीं है।
लव फिल्म्स के बैनर तले बनी यह फिल्म एक स्वतंत्र, स्टैंड-अलोन थ्रिलर है, जिसमें एक बार फिर
संजय मिश्रा और नीना गुप्ता मुख्य भूमिकाओं में दिखाई देते हैं। फिल्म एक नई कहानी कहने का प्रयास करती है, मगर अपने पहले हिस्से जैसी तीव्रता और असर को पूरी तरह दोहरा नहीं पाती।

जेल की दीवारों में कैद कहानी

फिल्म की कहानी एक जेल के भीतर घटने वाली घटनाओं के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जहाँ हर चेहरा एक रहस्य और हर चुप्पी एक सवाल बनकर खड़ी होती है।
शंभूनाथ मिश्रा (संजय मिश्रा) जेल में काम करने वाला एक साधारण कर्मचारी है, जो अपने सीमित दायरे में रहते हुए भी संवेदनशील नज़र आता है।
वह वरिष्ठ पुलिस अधिकारी प्रकाश सिंह (कुमुद मिश्रा) के अधीन काम करता है।

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इसी जेल में वर्षों से बंद है मंजू सिंह (नीना गुप्ता), जिस पर सालों पहले एक डबल मर्डर का आरोप लगा था।
मंजू लगातार खुद को निर्दोष बताती रही है, लेकिन कानून की प्रक्रिया ने उसे सलाखों के पीछे कैद कर रखा है।
शंभूनाथ और मंजू के बीच बना मानवीय जुड़ाव कहानी को भावनात्मक गहराई देता है।

एक गायब कैदी और उठते सवाल

कहानी उस वक्त मोड़ लेती है, जब जेल का खतरनाक अपराधी केशव (अक्षय डोगरा) व्यवस्था को खुलेआम चुनौती देने लगता है।
उसकी दबंगई के पीछे उसका राजनीतिक रसूख है—क्योंकि उसका भाई एक ताकतवर नेता है।
एक दिन टकराव के दौरान प्रकाश सिंह का गुस्सा काबू से बाहर हो जाता है और वह केशव की बेरहमी से पिटाई कर देता है।

इसके कुछ ही समय बाद केशव रहस्यमय हालात में गायब हो जाता है।
यहीं से फिल्म कई सवाल खड़े करती है—क्या केशव भाग गया?
क्या उसकी हत्या कर दी गई?
और अगर ऐसा हुआ, तो इसके पीछे कौन है?

जांच की प्रक्रिया और सस्पेंस की चाल

मामले की जांच की ज़िम्मेदारी इंस्पेक्टर अजीत सिंह (अमित के. सिंह) को सौंपी जाती है।
पूछताछ का सिलसिला शुरू होता है और एक-एक कर हर किरदार शक के दायरे में आता है।
फिल्म दर्शकों को अंत तक उलझाए रखने की कोशिश करती है, लेकिन कई मोड़ों पर कहानी अपेक्षाकृत आसान रास्ते चुन लेती है।

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यही वह बिंदु है, जहाँ सस्पेंस की जगह संयोग ज़्यादा हावी महसूस होता है।
कुछ खुलासे ऐसे हैं, जो चौंकाने के बजाय सवाल खड़े करते हैं।

पटकथा की कमजोरी: जब तर्क पीछे छूट जाते हैं

कहानी का मूल विचार आकर्षक है और पटकथा की गति भी सुस्त नहीं पड़ती,
लेकिन कुछ अहम प्लॉट पॉइंट तर्क की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
खासतौर पर अंगूठी से जुड़ा एंगल फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी बनकर सामने आता है।

एक अनुभवी पुलिस अधिकारी का अपनी खोई हुई अंगूठी को यूँ ही भूल जाना
और फिर वर्षों बाद उसी के सहारे सच्चाई का सामने आ जाना—यह सस्पेंस कम और संयोग ज़्यादा लगता है।
यह वही जगह है, जहाँ कहानी अपनी पकड़ ढीली करती है।

अभिनय: फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष

अगर ‘वध 2’ को किसी एक चीज़ ने संभाल कर रखा है, तो वह है इसका अभिनय।
संजय मिश्रा अपने सहज और संतुलित अंदाज़ में फिर भरोसा जगाते हैं।
नीना गुप्ता सीमित स्क्रीन टाइम के बावजूद अपने किरदार की पीड़ा और मजबूरी को प्रभावी ढंग से सामने रखती हैं।

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कुमुद मिश्रा का अभिनय फिल्म का सबसे सशक्त पक्ष माना जा सकता है।
उनका किरदार बाहर से जितना कठोर दिखता है, भीतर से उतना ही टूटा हुआ है—और यही द्वंद्व उनके अभिनय को असरदार बनाता है।
अक्षय डोगरा खलनायक के रूप में डर पैदा करते हैं, जबकि बाकी कलाकार अपनी भूमिकाओं में ईमानदार नज़र आते हैं।

तकनीकी पक्ष और माहौल

तकनीकी स्तर पर फिल्म सधी हुई है।
बैकग्राउंड स्कोर जेल के बंद और तनावपूर्ण माहौल को मजबूत करता है।
सिनेमैटोग्राफी कहानी की गंभीरता के अनुरूप है और एडिटिंग फिल्म को अनावश्यक रूप से खिंचने नहीं देती।

निष्कर्ष: असर है, लेकिन यादगार नहीं

कुल मिलाकर, ‘वध 2’ एक ऐसी थ्रिलर है, जिसमें अभिनय, माहौल और नीयत—तीनों मौजूद हैं,
लेकिन कमजोर तर्क और सुरक्षित कहानी इसे पूरी तरह प्रभावी बनने से रोक देते हैं।
बॉक्स ऑफिस पर दर्शकों की सीमित प्रतिक्रिया इसी अधूरेपन की ओर इशारा करती है।

हालांकि ओटीटी प्लेटफॉर्म पर यह फिल्म उन दर्शकों को आकर्षित कर सकती है,
जो शांत, किरदार-प्रधान थ्रिलर देखना पसंद करते हैं—बशर्ते वे कहानी के तर्कों पर बहुत ज़्यादा सवाल न उठाएँ।

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