समाचार सार: बाराबंकी की अदालत में हत्या के एक दस साल पुराने मामले में दोष सिद्ध होने और हिरासत के आदेश के साथ ही आरोपी का कोर्ट परिसर से फरार हो जाना न केवल न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है, बल्कि पुलिस सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियों को भी उजागर करता है।
अदालत में मौत की सजा सुनते ही आरोपी फरार होने की यह घटना उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले से सामने आई है, जिसने न्यायिक तंत्र और पुलिस प्रशासन दोनों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। हत्या जैसे गंभीर अपराध में दोष सिद्ध होने के बाद जब अदालत ने आरोपी को हिरासत में लेने का आदेश सुनाया, उसी क्षण आरोपी पुलिस को चकमा देकर कोर्ट परिसर से फरार हो गया। यह मामला सिर्फ एक आरोपी के भाग जाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि अदालत जैसी संवेदनशील जगह पर सुरक्षा इंतजाम आखिर कितने मजबूत हैं।
बाराबंकी अदालत में सुनवाई के दौरान मचा हड़कंप
घटना शनिवार की है, जब बाराबंकी स्थित अपर सत्र न्यायाधीश कोर्ट संख्या–2 में एक हत्या के मामले में सुरक्षित रखे गए फैसले पर सुनवाई हो रही थी। यह मामला वर्ष 2016 में सुबेहा थाना क्षेत्र में हुई एक जघन्य हत्या से जुड़ा है। करीब दस साल तक चले इस मुकदमे के बाद अदालत ने आरोपी सूरज, उसके पिता मुहरू और चाचा गुड्डू को दोषी करार दिया।
अदालत ने दोष सिद्ध होने के बाद सजा के बिंदुओं पर सुनवाई के लिए 9 फरवरी की तारीख तय की थी। साथ ही, सजा से पहले तीनों आरोपियों को हिरासत में लेने का आदेश दिया गया। जैसे ही यह आदेश सुनाया गया, कोर्ट परिसर में मौजूद पुलिस हरकत में आई, लेकिन इसी अफरा-तफरी के बीच मुख्य आरोपी सूरज पुलिस को चकमा देकर फरार हो गया।
दोष सिद्ध होते ही हिरासत का आदेश, फिर कैसे भागा आरोपी?
अदालत का आदेश स्पष्ट था—दोष सिद्ध होने के बाद आरोपियों को तुरंत हिरासत में लिया जाए। पुलिस ने दो आरोपियों को मौके पर ही काबू में ले लिया, लेकिन सूरज को हिरासत में लेने से पहले ही वह कोर्ट परिसर से बाहर निकलने में कामयाब हो गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आदेश के तुरंत बाद कुछ क्षणों के लिए अव्यवस्था की स्थिति बनी, जिसका फायदा उठाकर आरोपी फरार हो गया।
बताया जा रहा है कि आरोपी सूरज करीब डेढ़ साल से जमानत पर बाहर था और नियमित रूप से अदालत में पेशी पर आता रहा था। ऐसे में पुलिस उसे कम जोखिम वाला मानकर शायद सतर्कता में चूक कर बैठी। लेकिन दोष सिद्ध होने और संभावित सख्त सजा की आशंका के बीच आरोपी का भाग जाना सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
2016 की हत्या और लंबी न्यायिक प्रक्रिया
सूबेहा थाना क्षेत्र में अगस्त 2016 में हुई इस हत्या ने उस समय इलाके में सनसनी फैला दी थी। मामले में सूरज, उसके पिता मुहरू और चाचा गुड्डू को नामजद किया गया था। पुलिस जांच, चार्जशीट और गवाहों की लंबी प्रक्रिया के बाद यह मामला अदालत में चला। करीब एक दशक तक चले मुकदमे के बाद आखिरकार अदालत ने आरोपियों को दोषी करार दिया।
इस फैसले को पीड़ित पक्ष के लिए न्याय की बड़ी उम्मीद माना जा रहा था, लेकिन आरोपी के फरार हो जाने से यह उम्मीद फिर से असहज स्थिति में आ गई है। सवाल यह भी है कि यदि दोष सिद्ध होने के बाद ही आरोपी फरार हो सकता है, तो न्याय की प्रक्रिया कितनी सुरक्षित है।
पुलिस और प्रशासन की त्वरित कार्रवाई
कोर्ट से आरोपी के फरार होने की सूचना मिलते ही डीएसपी संगम कुमार और कोतवाली इंस्पेक्टर सुधीर कुमार सिंह मौके पर पहुंचे। पूरे कोर्ट परिसर और आसपास के इलाकों में तलाशी अभियान चलाया गया। इसके साथ ही सुबेहा थाना क्षेत्र में आरोपी के घर और उसके संभावित ठिकानों पर निगरानी बढ़ा दी गई।
हालांकि, घंटों की तलाश के बावजूद आरोपी का कोई सुराग नहीं लग सका। पुलिस की कई टीमें जिले और आसपास के क्षेत्रों में दबिश दे रही हैं। सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं और आरोपी की लोकेशन ट्रेस करने की कोशिश की जा रही है।
एसपी का बयान: सुरक्षा चूक की होगी जांच
इस मामले पर एसपी अर्पित विजयवर्गीय ने कहा कि कोर्ट से फरार हुए हत्यारोपी सूरज की तलाश के लिए विशेष पुलिस टीमें गठित कर दी गई हैं और उसे जल्द गिरफ्तार कर लिया जाएगा।
एसपी ने यह भी स्पष्ट किया कि कोर्ट परिसर की सुरक्षा में हुई संभावित चूक की जांच कराई जा रही है। यदि किसी स्तर पर लापरवाही पाई गई, तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
न्यायालय की सुरक्षा पर बड़ा सवाल
यह घटना केवल बाराबंकी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश में अदालतों की सुरक्षा व्यवस्था पर एक गंभीर बहस को जन्म देती है। जब अदालत जैसे सुरक्षित माने जाने वाले परिसर से दोष सिद्ध आरोपी फरार हो सकता है, तो आम नागरिकों और गवाहों की सुरक्षा पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दोष सिद्ध होने के बाद आरोपी के भागने की आशंका हमेशा बनी रहती है, इसलिए ऐसे मामलों में अतिरिक्त सुरक्षा इंतजाम अनिवार्य होने चाहिए।
आगे की चुनौती: गिरफ्तारी और भरोसा बहाल करना
अब पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती आरोपी सूरज की जल्द गिरफ्तारी है। इसके साथ ही प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। न्यायिक प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा इसी बात पर टिका है कि अपराधी सजा से बच न सके।
बाराबंकी की यह घटना पुलिस, प्रशासन और न्यायिक व्यवस्था—तीनों के लिए एक चेतावनी है। यदि समय रहते सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत नहीं किया गया, तो ऐसे मामले आगे भी सामने आ सकते हैं।
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