
यह एक पाठक की चिट्ठी है—न प्रशंसा में डूबी, न आलोचना में उलझी।
यह उस भरोसे का बयान है, जो शोर से नहीं, ठहराव से बनता है।
प्रिय संपादक जी,
नमस्ते।
कोई बड़ी भूमिका नहीं बाँधूँगा। न कोई तारीफ़ की माला, न कोई भाषण। बस इतना जान लीजिए कि यह चिट्ठी किसी मंच से नहीं, एक आम पाठक की चौपाल से लिखी जा रही है— वही चौपाल जहाँ बात शुरू तो हल्की होती है, लेकिन चुभती बहुत गहरी है।
सच कहूँ तो, यह चिट्ठी लिखते समय मैंने कोई शैली नहीं सोची थी, बस वही रास्ता चुना जो आपके लेख पढ़ते हुए पाठक के मन में बनता है— कभी सीधा, कभी कच्चा, कभी अचानक गड्ढे वाला।
मैं कोई लेखक नहीं हूँ। शब्दों को साधना मेरा पेशा नहीं,
पर पढ़ना… पढ़ना मेरी आदत है। और जब से आपके लेख पढ़ने लगा हूँ, तब से आदत के साथ-साथ थोड़ी बेचैनी भी जुड़ गई है। आप लिखते हैं— और अजीब बात यह है कि लिखते हुए शोर नहीं करते।
आजकल हर कोई चिल्ला रहा है। खबरें चिल्ला रही है, एंकर चिल्ला रहा है, सोशल मीडिया तो जैसे मेला बन गया है— जिसकी आवाज़ ऊँची, वही सही।
लेकिन आप…
आपकी कलम आवाज़ ऊँची नहीं करती,क्षसीधा सीने में ठहर जाती है। गाँव में जैसे कोई बुज़ुर्ग एकदम धीरे से कह दे— “बेटा, ज़रा सोच के बोलो…” और सामने वाला हँसते-हँसते चुप हो जाए।
आपके लेख पढ़ते हुए ऐसा नहीं लगता कि कोई मुझे समझा रहा है। बल्कि ऐसा लगता है कि कोई मेरे साथ बैठकर सोच रहा है।
यही बात खटकती है, और यही बात बाँधती भी है। आप भाषा में दिखावा नहीं करते। न भारी-भरकम शब्द, न अख़बारनुमा अकड़। फिर भी आपकी पंक्तियों में एक ठसक होती है— वह ठसक जो काग़ज़ से नहीं, ज़िंदगी से आती है।
आप तय नहीं करते कि पाठक क्या सोचे। आप बस इतना करते हैं कि वह सोचना छोड़ न पाए। यह बड़ी बात है, संपादक जी। क्योंकि आजकल लोग राय बेचते हैं, सोच नहीं।
यह चिट्ठी न प्रशंसा के लिए है, न आलोचना के लिए।
यह बस एक पाठक का
इत्मीनान है—
कि शोर के इस ज़माने में अब भी कोई है, जो लिखते हुए
आवाज़ नहीं बढ़ाता, सोच बढ़ाता है।
आपका एक पाठक
विनोद कुमार दास, घनश्यामपुर, दरभंगा बिहार
(जो हर बात पर सहमत नहीं, लेकिन पढ़ना नहीं छोड़ता)
“हम खबर को
चीखने नहीं देंगे,
असर छोड़ने देंगे।”
एक दशक की सहयोगी दृष्टि से देखा गया संपादक
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