जेल में सीखी क्राइम की ABCD—यह पंक्ति बनारसी यादव के पूरे आपराधिक जीवन की सटीक व्याख्या करती है। गाजीपुर के करंडा थाना क्षेत्र के गौरहट गांव से निकला यह युवक धीरे-धीरे अपराध की दुनिया में ऐसा घुसा कि एक समय उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए सिरदर्द बन गया। वाराणसी, गाजीपुर, सोनभद्र समेत कई जनपदों में दर्ज 24 से ज्यादा आपराधिक मुकदमे, तीन हत्याएं और पांच से अधिक हत्या के प्रयास—बनारसी यादव का नाम लंबे समय तक खौफ की पहचान बना रहा।
वाराणसी एनकाउंटर: जहां खत्म हुई कहानी
मंगलवार देर रात यूपी एसटीएफ को खुफिया सूचना मिली कि एक लाख का इनामी बदमाश बनारसी यादव गाजीपुर-वाराणसी हाईवे के रास्ते कहीं भागने की फिराक में है और किसी बड़ी वारदात की तैयारी कर रहा है। सूचना के आधार पर चौबेपुर थाना क्षेत्र के नारियासनपुर रिंग रोड पर एसटीएफ टीम ने घेराबंदी की। पुलिस को देखते ही बनारसी यादव ने जान बचाने के लिए फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में वह गंभीर रूप से घायल हुआ और अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। मौके से दो पिस्टल और भारी मात्रा में कारतूस बरामद हुए।
23 साल लंबा अपराधी सफर
बनारसी यादव पहली बार वर्ष 2003 में चोरी के एक मामले में जेल गया था। यही जेल उसके लिए सुधार गृह नहीं, बल्कि अपराध की पाठशाला साबित हुई। जेल के भीतर उसने कुख्यात अपराधियों से नजदीकियां बढ़ाईं, नेटवर्क खड़ा किया और संगठित अपराध की बारीकियां सीखीं। बाहर निकलते ही वह पहले से ज्यादा शातिर और खतरनाक हो चुका था।
जेल बनी अपराध की यूनिवर्सिटी
बार-बार जेल जाने के बावजूद बनारसी यादव के जीवन की दिशा नहीं बदली। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, जेल में रहते हुए ही उसने हथियारों का इस्तेमाल, सुपारी किलिंग की योजना और अपराध को अंजाम देने के तरीके सीखे। यही कारण रहा कि हर बार जेल से बाहर आने पर वह पहले से अधिक संगठित और बेरहम होकर लौटा।
सुपारी किलर के रूप में पहचान
जेल से बाहर निकलने के बाद बनारसी यादव ने सुपारी लेकर हत्याएं करना शुरू कर दिया। तीन मर्डर और पांच से अधिक हत्या के प्रयासों के मामलों ने उसे अपराध की दुनिया में स्थापित कर दिया। जमीन विवाद, वसूली और रसूखदारों के झगड़ों में उसका नाम इस्तेमाल होने लगा। उसका गैंग धीरे-धीरे वाराणसी से लेकर सोनभद्र तक फैल चुका था।
महेंद्र गौतम हत्याकांड
21 अगस्त को वाराणसी के सारनाथ क्षेत्र में कॉलोनाइजर महेंद्र गौतम की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जांच में सामने आया कि 60 लाख रुपये की जमीन के विवाद में मात्र दो लाख रुपये की सुपारी देकर यह हत्या कराई गई थी। इस हत्याकांड के बाद बनारसी यादव पुलिस की प्राथमिक सूची में आ गया और उसकी तलाश तेज कर दी गई।
न मोबाइल, न बैंक अकाउंट
बनारसी यादव पुलिस से बचने के लिए डिजिटल दुनिया से पूरी तरह दूरी बनाए रखता था। न वह मोबाइल फोन इस्तेमाल करता था और न ही अपने नाम से कोई बैंक अकाउंट। इससे उसका डिजिटल फुटप्रिंट लगभग शून्य था, जिससे पुलिस के लिए उसे ट्रैक करना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता था। वारदात के बाद वह अक्सर राज्य से बाहर जाकर छिप जाता था।
हुलिया बदलने में उस्ताद
पुलिस के अनुसार बनारसी यादव हुलिया बदलने में माहिर था। कभी साधारण मजदूर, कभी ग्रामीण किसान तो कभी राहगीर के भेष में वह आसानी से भीड़ में घुल जाता था। कई बार पुलिस को उसकी पुख्ता तस्वीर तक नहीं मिल पाती थी, जिससे उसकी गिरफ्तारी टलती रही।
एसटीएफ की लंबी घेराबंदी
महेंद्र गौतम हत्याकांड के बाद कमिश्नरेट पुलिस और एसटीएफ ने संयुक्त रूप से कई जिलों में छापेमारी की। 4 जनवरी को उसके साथी अरविंद यादव उर्फ फौजी को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद बनारसी यादव पर दबाव और बढ़ गया, जो अंततः वाराणसी एनकाउंटर में खत्म हुआ।
अपराध का अंत, सवाल बरकरार
23 वर्षों तक अपराध की दुनिया में सक्रिय रहा बनारसी यादव अब इतिहास बन चुका है। लेकिन उसकी कहानी यह सवाल छोड़ जाती है कि आखिर जेलें अपराधियों को सुधारने में क्यों नाकाम हो रही हैं और कैसे छोटे अपराधी बड़े गैंगस्टर बनते जा रहे हैं।






