घूसखोर पंडत विवाद अब केवल सोशल मीडिया की बहस नहीं रहा, बल्कि यह कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक टकराव का बड़ा मुद्दा बन चुका है। मनोज बाजपेयी और नीरज पांडे से जुड़ी इस फिल्म को लेकर केंद्र सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए ओटीटी प्लेटफॉर्म Netflix को निर्देश दिया है कि फिल्म का टीज़र और उससे जुड़ा सारा प्रमोशनल कंटेंट तुरंत हटाया जाए। केंद्र के इस आदेश के बाद नेटफ्लिक्स ने अपने सोशल मीडिया हैंडल, यूट्यूब और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म से ‘घूसखोर पंडत’ से जुड़ी पूरी प्रचार सामग्री हटा दी है।
घूसखोर पंडत के टाइटल को लेकर उठे जातिगत अपमान के आरोप अब केंद्र सरकार की कार्रवाई तक पहुंच चुके हैं। दो एफआईआर, लीगल नोटिस, राजनीतिक बयानबाज़ी और ब्राह्मण समाज के विरोध के बाद केंद्र ने नेटफ्लिक्स को प्रमोशनल कंटेंट हटाने का निर्देश दिया, जिससे यह विवाद और विकराल हो गया।
केंद्र सरकार का कड़ा एक्शन
घूसखोर पंडत विवाद के बीच केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ऐसा कंटेंट स्वीकार्य नहीं है, जिससे किसी जाति, समुदाय या धार्मिक पहचान को सामूहिक रूप से अपमानित करने का संदेश जाए। सूचना एवं प्रसारण से जुड़े विभागों ने ओटीटी प्लेटफॉर्म को निर्देश दिया कि फिल्म के टीज़र से लेकर सभी प्रचार सामग्री को तत्काल प्रभाव से हटाया जाए। आदेश के बाद नेटफ्लिक्स ने बिना किसी देरी के अपने सभी आधिकारिक चैनलों से ‘घूसखोर पंडत’ से जुड़ा कंटेंट हटा लिया।
बीजेपी नेता गौरव भाटिया का बयान
बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव भाटिया ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर जानकारी दी कि न सिर्फ फिल्म का प्रमोशनल कंटेंट हटाया गया है, बल्कि इस मामले में एफआईआर भी दर्ज की गई है। उन्होंने लिखा कि केंद्र के त्वरित और प्रभावी निर्णय से यह स्पष्ट संदेश गया है कि सनातन धर्म या किसी भी समुदाय का अपमान अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
राजनीतिक हलचल तेज
घूसखोर पंडत विवाद ने जल्द ही राजनीतिक रंग ले लिया। बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने भी फिल्म के टाइटल पर कड़ा एतराज जताते हुए केंद्र सरकार से इसे बैन करने की मांग की। उनके अनुसार इस तरह के नाम समाज में आपसी सौहार्द को नुकसान पहुंचाते हैं और एक वर्ग विशेष को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं।
नीरज पांडे और मनोज बाजपेयी की सफाई
फिल्म के राइटर-प्रोड्यूसर नीरज पांडे ने विवाद बढ़ने के बाद बयान जारी कर कहा कि फिल्म किसी समुदाय विशेष के खिलाफ नहीं है और लोगों को पहले पूरी फिल्म देखनी चाहिए। अभिनेता मनोज बाजपेयी ने भी कहा कि उनका किरदार एक व्यक्ति की कहानी है, न कि किसी जाति या समाज का प्रतिनिधित्व। हालांकि, इन सफाइयों के बावजूद विरोध थमता नहीं दिखा।
टाइटल पर विवाद क्यों?
‘घूसखोर पंडत’ का टीज़र 3 फरवरी को लॉन्च हुआ था, जिसमें मनोज बाजपेयी अजय दीक्षित नाम के एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी की भूमिका में नजर आए। टीज़र सामने आते ही सोशल मीडिया पर आरोप लगने लगे कि फिल्म का टाइटल ब्राह्मण समाज को सामूहिक रूप से भ्रष्ट दिखाने का संकेत देता है, जिसके बाद बायकॉट की मांग तेज हो गई।
सड़कों पर विरोध और एफआईआर
भोपाल में ब्राह्मण समाज के लोग सड़कों पर उतर आए और मेकर्स के खिलाफ नारेबाज़ी की। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि फिल्म का टाइटल नहीं बदला गया तो देशभर में उग्र आंदोलन होगा। इसी बीच उत्तर प्रदेश के हजरतगंज थाने में फिल्म की टीम के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई, जो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश के बाद की गई कार्रवाई बताई जा रही है।
पीएम तक पहुंचा मामला
ब्रज क्षेत्र के संतों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर फिल्म पर बैन की मांग की। मेरठ फिल्म सोसाइटी ने भी फिल्म के डायरेक्टर और नेटफ्लिक्स को लीगल नोटिस भेजा। वरिष्ठ अधिवक्ता वी.के. शर्मा ने कहा कि फिल्म का टाइटल समाज में वैमनस्य बढ़ा सकता है और सामाजिक शांति के लिए खतरा है।
आगे क्या?
घूसखोर पंडत विवाद ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन पर बहस छेड़ दी है। केंद्र सरकार की कार्रवाई से यह साफ हो गया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म भी अब जवाबदेही से बाहर नहीं हैं। फिलहाल फिल्म का टाइटल, रिलीज और भविष्य तीनों अनिश्चितता के घेरे में हैं।






