शादी में दिए ₹93 लाख और थार, फिर भी नहीं भरा मन! अब लखनऊ के इस बड़े अधिकारी ने मांगी फॉर्च्यूनर और कैश

पारंपरिक लाल साफा और पीली शेरवानी पहने दूल्हा, गले में फूलों की माला के साथ विवाह समारोह में बैठा हुआ

✍️रीतेश कुमार गुप्ता की रिपोर्ट
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शादी में दिए ₹93 लाख और थार—यह महज़ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस मानसिकता का आईना है, जिसमें विवाह अब संस्कार नहीं, सौदेबाज़ी बनता जा रहा है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सामने आया यह मामला न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि यह दहेज-प्रथा के उस विकृत चेहरे को उजागर करता है, जो कानून, पद और रसूख की परछाईं में और भी भयावह हो जाता है। आरोप है कि एक बड़े अधिकारी के परिवार ने शादी के दौरान भारी नकद और महंगी गाड़ी लेने के बावजूद संतोष नहीं किया और अब विवाह के बाद फॉर्च्यूनर कार तथा अतिरिक्त कैश की मांग की जा रही है।

शादी के नाम पर करोड़ों का लेन-देन

पीड़ित पक्ष के अनुसार, विवाह से पहले ही दहेज को लेकर शर्तें तय कर दी गई थीं। लड़की के परिवार ने सामाजिक प्रतिष्ठा और बेटी के भविष्य को देखते हुए लगभग ₹93 लाख नकद के साथ एक महंगी थार SUV भी वर पक्ष को दी। विवाह समारोह भव्य था, मेहमानों की लंबी सूची थी और हर रस्म को “सम्मान” के नाम पर आर्थिक दबाव में पूरा किया गया।

परंतु शादी के कुछ ही समय बाद हालात बदलने लगे। कथित तौर पर अधिकारी और उसके परिजनों ने यह कहना शुरू किया कि “लड़की तो अफसर के घर आई है, अब स्तर भी उसी हिसाब से होना चाहिए।” इसके बाद फॉर्च्यूनर कार और अतिरिक्त नकद राशि की मांग सामने रखी गई।

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जब पद और पावर बन जाए दहेज का हथियार

इस पूरे मामले को और गंभीर बनाता है आरोपी का सरकारी पद। बताया जा रहा है कि संबंधित व्यक्ति लखनऊ में तैनात एक प्रभावशाली अधिकारी है। पीड़िता का आरोप है कि अधिकारी होने का रौब दिखाकर उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और यह स्पष्ट संकेत दिए गए कि अगर मांगें पूरी नहीं हुईं तो अंजाम ठीक नहीं होगा।

यहां सवाल सिर्फ दहेज का नहीं, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग का भी है। जब कानून लागू कराने वाला ही कानून की भावना को कुचलने लगे, तब पीड़ित को न्याय की उम्मीद कहां से हो?

पीड़िता का आरोप: मानसिक उत्पीड़न और दबाव

पीड़िता ने बताया कि फॉर्च्यूनर और कैश की मांग पूरी न होने पर उसे ताने दिए गए, अकेलेपन में छोड़ा गया और कई बार मायके लौट जाने के लिए मजबूर किया गया। आरोप है कि ससुराल पक्ष ने यह तक कह दिया कि “इतना दहेज तो आजकल आम बात है, अफसरों के यहां इससे कहीं ज्यादा लिया जाता है।”

यह बयान समाज के उस खतरनाक ट्रेंड की ओर इशारा करता है, जहां दहेज को अपराध नहीं, बल्कि स्टेटस सिंबल माना जाने लगा है।

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कानून क्या कहता है और हकीकत क्या है?

भारत में दहेज लेना और देना दोनों ही दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के तहत अपराध है। इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि बड़े पदों पर बैठे लोग भी इस कानून को धता बताते नजर आते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में पीड़ित पक्ष अक्सर सामाजिक दबाव, बदनामी के डर और “अफसर से पंगा” लेने के भय के कारण चुप रह जाता है। यही चुप्पी इस कुप्रथा को और मजबूत करती है।

लखनऊ पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर सवाल

सूत्रों के मुताबिक, मामला सामने आने के बाद भी स्थानीय स्तर पर कार्रवाई बेहद धीमी रही। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या आरोपी का पद जांच की गति और दिशा को प्रभावित कर रहा है?

यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह सिर्फ एक परिवार का मामला नहीं रहेगा, बल्कि यह प्रशासनिक नैतिकता पर भी सीधा प्रश्नचिह्न होगा।

समाज के लिए चेतावनी बनता यह मामला

शादी में दिए ₹93 लाख और थार के बावजूद अगर लालच खत्म नहीं होता, तो यह साफ संकेत है कि समस्या सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक है। यह मामला उन सभी परिवारों के लिए चेतावनी है, जो बेटी की शादी में “जितना हो सके उतना दे देने” की सोच रखते हैं।

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विशेषज्ञ कहते हैं कि जब तक दहेज को सामाजिक स्वीकृति मिलती रहेगी, तब तक कानून भी अकेला कुछ नहीं कर पाएगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

क्या शादी के बाद दहेज मांगना अपराध है?

हाँ, शादी से पहले या बाद में किसी भी रूप में दहेज मांगना कानूनन अपराध है और इसके लिए सजा का प्रावधान है।

अगर आरोपी प्रभावशाली अधिकारी हो तो शिकायत कैसे करें?

ऐसे मामलों में महिला आयोग, न्यायालय या वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से शिकायत की जा सकती है।

क्या नकद और गाड़ी देना भी दहेज की श्रेणी में आता है?

जी हाँ, शादी से जुड़ा कोई भी लेन-देन, जो मांग के आधार पर हो, दहेज माना जाता है।

सवाल सिर्फ एक शादी का नहीं

शादी में दिए ₹93 लाख और थार के बाद भी फॉर्च्यूनर और कैश की मांग का यह मामला हमारे समाज के उस कड़वे सच को सामने लाता है, जहां लालच की कोई सीमा नहीं बची। यह घटना न केवल कानून प्रवर्तन तंत्र, बल्कि सामाजिक सोच की भी परीक्षा है। अगर ऐसे मामलों पर सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई, तो दहेज-प्रथा सिर्फ जारी ही नहीं रहेगी, बल्कि और अधिक निर्लज्ज होती चली जाएगी।

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