डॉ. प्रमोद कुमार सेठिया द्वारा लिखित पुस्तक ‘गिजुभाई बधेका – संचयन’ भारतीय शिक्षा-विमर्श में एक ऐसे महापुरुष के विचारों को पुनः जीवंत करती है, जिनकी प्रासंगिकता समय के साथ कम नहीं हुई, बल्कि और अधिक गहरी होती चली गई। यह पुस्तक केवल गिजुभाई बधेका के जीवन का परिचय नहीं देती, बल्कि उनके उन शैक्षिक प्रयोगों और विचारों का समग्र संकलन प्रस्तुत करती है, जो आज लगभग एक सदी बाद भी भारतीय शिक्षा प्रणाली के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं।
दुनिया जिन्हें स्नेहपूर्वक ‘मूँछों वाली माँ’ के नाम से जानती है, गिजुभाई बधेका ने शिक्षा को भय, दंड और रटंत से मुक्त कर आनंद, स्वतंत्रता और सृजनशीलता से जोड़ने का साहसिक प्रयास किया। यह पुस्तक उनके उसी दृष्टिकोण का विस्तार है, जो बच्चों को केवल परीक्षा-उत्तीर्ण करने वाला नहीं, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनाने की कल्पना करता है।
पुस्तक में गिजुभाई बधेका की जीवन-यात्रा को सारगर्भित रूप में प्रस्तुत किया गया है। 15 नवंबर 1885 को गुजरात के वल्लभीपुर में जन्मे गिजुभाई पेशे से वकील थे, किंतु अपने पुत्र के जन्म के बाद जब उन्होंने तत्कालीन शिक्षा-पद्धति को निकट से देखा, तो उसके भीतर छिपी कठोरता और भय ने उन्हें भीतर तक विचलित कर दिया। बच्चों पर मारपीट, रटंत और दबाव आधारित शिक्षा को देखकर उन्होंने वकालत छोड़ शिक्षा के क्षेत्र को अपना कर्मक्षेत्र बनाया।
भावनगर की दक्षिणामूर्ति संस्था को उन्होंने अपनी प्रयोगशाला बनाया, जहाँ ‘बाल देवो भव’ केवल नारा नहीं, बल्कि व्यवहार बना। पुस्तक में उनके समस्त साहित्य और शैक्षिक प्रयोगों को श्रेणीवार प्रस्तुत किया गया है, जिससे यह ग्रंथ केवल अध्ययन-सामग्री नहीं, बल्कि संदर्भ-ग्रंथ का रूप ले लेता है।
वर्तमान शिक्षा प्रणाली के संदर्भ में इस पुस्तक की उपयोगिता और भी बढ़ जाती है। आज जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लागू है, तब गिजुभाई के विचार उसके मूल में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। वर्तमान समय में शिक्षा बच्चों के लिए एक बोझ बनती जा रही है, जहाँ अंकों की दौड़ और प्रतिस्पर्धा ने बचपन की सहजता को छीन लिया है। ऐसी स्थिति में गिजुभाई का ‘आनंदमयी शिक्षण’ शिक्षा का मानवीय विकल्प प्रस्तुत करता है।
गिजुभाई मानते थे कि शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि बच्चे को स्वावलंबी, निर्भय और सृजनशील बनाना है। वे रटंत पद्धति के विरोधी थे और ‘करके सीखने’ पर बल देते थे। उनका मानना था कि जब बच्चे को उसकी रुचि और क्षमता के अनुसार सीखने की स्वतंत्रता मिलती है, तभी वास्तविक अधिगम संभव होता है।
शिक्षकों के लिए यह पुस्तक एक अनिवार्य मार्गदर्शिका के रूप में सामने आती है। गिजुभाई ने शिक्षक को तानाशाह नहीं, बल्कि मित्र और मार्गदर्शक के रूप में देखा। वे कहते थे कि शिक्षक को बच्चों के कार्यों में सहभागी बनना चाहिए। आज की कक्षाओं में जहाँ अनुशासन का अर्थ अक्सर चुप्पी और डर से लिया जाता है, वहाँ गिजुभाई का ‘स्व-अनुशासन’ का विचार अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है।
वे शारीरिक दंड के सख्त विरोधी थे और मानते थे कि भय के वातावरण में बच्चा न तो सीख सकता है और न ही सृजन कर सकता है। आधुनिक शिक्षा-मनोविज्ञान भी इस तथ्य की पुष्टि करता है कि भयमुक्त वातावरण ही सार्थक शिक्षा की नींव है।
पुस्तक में गिजुभाई की चर्चित कृति ‘दिवास्वप्न’ का उल्लेख विशेष रूप से किया गया है, जो आज के पाठ्यक्रम सुधारों के लिए एक ब्लूप्रिंट की तरह है। उन्होंने दिखाया कि इतिहास, भूगोल और व्याकरण जैसे विषयों को कहानियों, गीतों और नाटकों के माध्यम से कैसे रोचक बनाया जा सकता है। डिजिटल युग में बच्चों की एकाग्रता बढ़ाने के लिए यह दृष्टि आज भी उतनी ही उपयोगी है।
अभिभावकों के लिए भी यह पुस्तक एक नई चेतना जगाती है। गिजुभाई मानते थे कि घर बालक की पहली और सबसे प्रभावशाली पाठशाला है। उन्होंने माता-पिता को सलाह दी कि वे बच्चों पर अपनी इच्छाएँ थोपने के बजाय उन्हें सुनें, समझें और समय दें। बढ़ते मानसिक तनाव के दौर में यह भावनात्मक सहयोग बच्चों के व्यक्तित्व-निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक है।
गिजुभाई का बाल-दर्शन स्वच्छता, स्वास्थ्य और सामाजिक जिम्मेदारी तक विस्तृत है। वे मानते थे कि स्वच्छता शिक्षा का पहला पाठ है। आज के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ जैसे कार्यक्रमों की सफलता के लिए गिजुभाई की यह सोच अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
पुस्तक में लेखक ने गिजुभाई के विचारों की गांधी जी से तुलना, स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वानर सेना और मांजर सेना के माध्यम से बच्चों को जागरूक करने के प्रसंग तथा गिजुभाई के शैक्षिक संकल्प-पत्र और दस सूत्रीय शपथ को भी सम्मिलित किया है। साथ ही, लेखक ने अपने शैक्षिक जीवन के अनुभवों के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि गिजुभाई के विचार आज भी शिक्षकों को दिशा देने की क्षमता रखते हैं।
संक्षेप में कहा जाए तो डॉ. प्रमोद कुमार सेठिया की यह पुस्तक गिजुभाई बधेका के शैक्षिक दर्शन को वर्तमान समय की जटिलताओं के समाधान के रूप में प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक याद दिलाती है कि शिक्षा केवल सूचनाओं का भंडार नहीं, बल्कि आत्म-विस्तार और चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया है। यदि हम सचमुच चाहते हैं कि बच्चा हँसते हुए स्कूल आए और गुनगुनाते हुए घर लौटे, तो गिजुभाई के इन प्रयोगों को अपनी कक्षाओं और घरों में स्थान देना ही होगा।
पुस्तक: गिजुभाई बधेका संचयन
लेखक: डॉ. प्रमोद कुमार सेठिया
विधा: आलेख / शैक्षिक संकलन
पृष्ठ: 84
मूल्य: ₹100






