कब्रों वाला गाँव — यह शब्द किसी डरावनी कहानी या रहस्यमयी उपन्यास का हिस्सा नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में मौजूद एक वास्तविक गांव की सच्चाई है। यह गांव बाहर से देखने पर सामान्य ग्रामीण बस्ती जैसा लगता है, लेकिन इसकी चारदीवारी के भीतर जीवन और मृत्यु साथ-साथ सांस लेते हैं। यहां घर केवल रहने की जगह नहीं हैं, बल्कि वही अंतिम विश्राम स्थल भी बन चुके हैं। कब्रों वाला गाँव आज सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि व्यवस्था, संवेदनहीनता और सामाजिक उपेक्षा पर खड़ा एक जीवंत सवाल है।
आगरा जिले का छह पोखर गांव वह अनोखा लेकिन पीड़ादायक उदाहरण है, जहां कब्रिस्तान की जमीन न होने के कारण लोगों को अपने परिजनों को घर के भीतर ही दफन करना पड़ रहा है। यह मजबूरी किसी परंपरा से नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और भूमि संकट से जन्मी है।
कहां है यह कब्रों वाला गाँव?
कब्रों वाला गाँव आगरा से लगभग 30 किलोमीटर दूर, किरावली तहसील के अछनेरा क्षेत्र में स्थित छह पोखर गांव है। गांव तक पहुंचने वाली सड़कें, खेत-खलिहान और मकानों की बाहरी बनावट किसी भी अन्य ग्रामीण क्षेत्र जैसी ही दिखाई देती हैं। लेकिन जैसे ही कोई व्यक्ति गांव के भीतर प्रवेश करता है और घरों के आंगन, कमरों और रसोइयों की सच्चाई जानता है, तो वह सिहर उठता है। यही वजह है कि इस गांव को अब लोग ‘कब्रों वाला गाँव’ कहकर पुकारने लगे हैं।
हर घर में किसी अपने की कब्र
छह पोखर गांव में करीब 15 मुस्लिम परिवार निवास करते हैं। ग्रामीणों के अनुसार, गांव में उनके लिए कोई आधिकारिक या चिन्हित कब्रिस्तान उपलब्ध नहीं है। वर्षों से वे इस समस्या को लेकर संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन समाधान आज तक नहीं निकला। नतीजा यह हुआ कि जब किसी परिजन की मृत्यु होती है, तो उसे दफनाने के लिए घर के भीतर ही जगह बनानी पड़ती है। किसी के घर में मां दफन हैं, तो किसी के आंगन में पिता या जीवनसाथी। एक ही छत के नीचे जीवन की रोजमर्रा की हलचल और मृत्यु की शांति साथ-साथ मौजूद रहती है।
रसोई के पास कब्र, उसी आंगन में खेलते बच्चे
ग्रामीणों का कहना है कि कई घरों में कब्रें रसोई या बैठक के बिल्कुल पास बनी हुई हैं। जहां एक ओर चूल्हा जलता है, वहीं पास में किसी अपने की कब्र है। बच्चे उसी आंगन में खेलते हैं, जहां उनके माता-पिता या दादा-दादी दफन हैं। यह स्थिति न केवल भावनात्मक रूप से भारी है, बल्कि मानसिक दबाव भी पैदा करती है। गांव की महिलाएं बताती हैं कि रात के समय यह डर और गहरा हो जाता है, जब सन्नाटा और अंधेरा कब्रों की मौजूदगी को और ज्यादा महसूस कराता है।
मजबूरी है, कोई परंपरा नहीं
ग्रामीण इस बात पर जोर देकर कहते हैं कि घरों में दफनाने की यह प्रथा किसी धार्मिक रिवाज या परंपरा का हिस्सा नहीं है। यह पूरी तरह मजबूरी का नतीजा है। गांव के बुजुर्ग कहते हैं, “अगर हमारे पास कब्रिस्तान होता, तो कोई अपने घर में अपनों को क्यों दफनाता?” जमीन के स्वामित्व और सरकारी मान्यता की कमी ने उन्हें इस अमानवीय स्थिति में धकेल दिया है। कब्रों वाला गाँव इसलिए बना क्योंकि विकल्प खत्म हो चुके हैं।
रात होते ही क्यों बढ़ जाता है खौफ?
दिन में लोग किसी तरह अपनी दिनचर्या निभा लेते हैं, लेकिन रात का समय यहां सबसे कठिन होता है। कब्रों की मौजूदगी, सन्नाटा और रोशनी की कमी मिलकर डर का माहौल बना देती है। कई ग्रामीणों का कहना है कि बच्चे रात में अकेले सोने से डरते हैं। बुजुर्गों को मानसिक बेचैनी घेर लेती है। कब्रों वाला गाँव सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक त्रासदी की भी कहानी कहता है।
प्रशासन और व्यवस्था पर उठते सवाल
यह मामला सीधे-सीधे प्रशासनिक उदासीनता की ओर इशारा करता है। सवाल यह है कि क्या किसी भी नागरिक को मृत्यु के बाद सम्मानजनक अंतिम संस्कार का अधिकार नहीं मिलना चाहिए? क्या कब्रों वाला गाँव इस बात का प्रमाण नहीं है कि कुछ समुदाय आज भी बुनियादी अधिकारों से वंचित हैं? गांव वालों का कहना है कि उन्होंने कई बार अधिकारियों को अपनी समस्या बताई, लेकिन आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
दो गज जमीन का सवाल
कब्रों वाला गाँव एक ऐसे सवाल को जन्म देता है, जो समाज और सरकार दोनों से जवाब मांगता है — क्या इन परिवारों को अंतिम विदाई के लिए दो गज जमीन भी नसीब नहीं हो सकती? जब घर ही कब्रिस्तान बन जाए, तो जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा मिटने लगती है। छह पोखर गांव में जन्म, जीवन और मृत्यु — तीनों एक ही चारदीवारी में सिमट गए हैं।
कब्रों वाला गाँव: एक चेतावनी
यह गांव केवल एक स्थानीय खबर नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए चेतावनी है। अगर समय रहते समाधान नहीं निकला, तो कब्रों वाला गाँव भविष्य में ऐसे कई और गांवों की पहचान बन सकता है। यह कहानी बताती है कि विकास के दावों के बीच कुछ सच्चाइयां आज भी जमीन के नीचे दफन हैं — ठीक वैसे ही, जैसे इस गांव के लोग अपने अपनों को घरों में दफन करने को मजबूर हैं।






