चित्रकूट में बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं एक बार फिर जनआंदोलन का कारण बन गई हैं। वर्षों से उपेक्षित स्वास्थ्य ढांचे, जिला अस्पताल की सीमित क्षमताओं और गंभीर रोगियों के लिए समुचित इलाज के अभाव ने युवाओं को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है। इसी क्रम में चित्रकूट जिले में युवाओं ने कफन सत्याग्रह की शुरुआत कर सरकार से एकमात्र मांग रखी है—जिले में सरकारी मेडिकल कॉलेज की स्थापना।
जिला अस्पताल बना रेफर सेंटर, इलाज के लिए भटकते मरीज
चित्रकूट में बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिला अस्पताल अब इलाज का केंद्र न होकर केवल रेफर सेंटर बनकर रह गया है। गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों को यहां प्राथमिक उपचार के बाद कानपुर, लखनऊ, प्रयागराज या मध्यप्रदेश के सतना भेज दिया जाता है। सैकड़ों किलोमीटर की यह दूरी कई बार मरीजों के लिए जानलेवा साबित होती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क मार्ग की खराब स्थिति, एंबुलेंस सुविधाओं की कमी और समय पर विशेषज्ञ डॉक्टर न मिलने के कारण कई मरीज अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक विफलता को उजागर करती है बल्कि सरकार के स्वास्थ्य दावों पर भी सवाल खड़े करती है।
13 नवंबर 2025 का पैदल मार्च और प्रशासन की चुप्पी
चित्रकूट में बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं के खिलाफ पहली बड़ी आवाज 13 नवंबर 2025 को उठी थी, जब युवा व्यापारी नेता विनोद प्रिंस केशरवानी के नेतृत्व में शहीद पार्क एलआईसी तिराहे से पैदल मार्च निकाला गया। इस मार्च के बाद जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत से अवगत कराया गया था।
ज्ञापन में स्पष्ट रूप से बताया गया था कि जिला अस्पताल में न तो पर्याप्त डॉक्टर हैं और न ही आधुनिक जांच व इलाज की सुविधाएं। इसके बावजूद प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। यही प्रशासनिक उदासीनता बाद में कफन सत्याग्रह का कारण बनी।
01 फरवरी 2026 से शुरू हुआ कफन सत्याग्रह
प्रशासनिक अनदेखी से आहत युवाओं ने 01 फरवरी 2026 से शहीद पार्क एलआईसी तिराहे पर कफन सत्याग्रह की शुरुआत कर दी। प्रतीकात्मक रूप से कफन ओढ़कर किया जा रहा यह सत्याग्रह व्यवस्था की संवेदनहीनता पर करारा प्रहार है। यह आंदोलन यह बताने के लिए है कि अगर समय रहते इलाज नहीं मिला, तो कफन ही अंतिम विकल्प रह जाएगा।
इस सत्याग्रह में युवाओं के साथ-साथ व्यापारी, समाजसेवी और आम नागरिक भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी के जिलाध्यक्ष सहित कई संगठनों ने भी आंदोलन को समर्थन दिया है।
खून से लिखे पत्र, सरकार को चेतावनी
कफन सत्याग्रह के दौरान युवाओं ने शासन-प्रशासन का ध्यान आकर्षित करने के लिए खून से पत्र लिखकर मेडिकल कॉलेज की मांग की। युवा क्रांतिकारी साथी भूपेंद्र सिंह ने सत्याग्रह की अगुवाई करते हुए कहा कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि चित्रकूट के आम नागरिकों की जान बचाने के लिए है।
सत्याग्रहियों का कहना है कि जब तक चित्रकूट जिले में सरकारी मेडिकल कॉलेज की स्थापना के लिए ठोस और लिखित आश्वासन नहीं मिलता, तब तक यह आंदोलन अनिश्चितकालीन रूप से जारी रहेगा।
मेडिकल कॉलेज क्यों है चित्रकूट की जरूरत
चित्रकूट में बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं का स्थायी समाधान केवल सरकारी मेडिकल कॉलेज की स्थापना से ही संभव है। मेडिकल कॉलेज न केवल इलाज की सुविधाएं बढ़ाएगा, बल्कि विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता, आधुनिक जांच उपकरण और मेडिकल शिक्षा के नए अवसर भी पैदा करेगा।
इसके अलावा मेडिकल कॉलेज बनने से स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और क्षेत्र का समग्र विकास होगा। बुंदेलखंड जैसे पिछड़े क्षेत्र में यह संस्थान स्वास्थ्य के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक बदलाव का केंद्र बन सकता है।
जन आंदोलन बनता कफन सत्याग्रह
अब कफन सत्याग्रह केवल युवाओं तक सीमित नहीं रहा है। व्यापारी वर्ग, किसान, महिलाएं और बुजुर्ग भी इसमें सहभागिता कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि यह आंदोलन चित्रकूट की आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा हुआ है।
स्थानीय नागरिकों का मानना है कि अगर अब भी सरकार ने आंखें मूंदे रखीं, तो आने वाले समय में यह आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।
सरकार के लिए चेतावनी और अवसर दोनों
चित्रकूट में बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं अब केवल एक प्रशासनिक मुद्दा नहीं रहीं, बल्कि जनभावनाओं का सवाल बन चुकी हैं। कफन सत्याग्रह सरकार के लिए चेतावनी भी है और अवसर भी—चेतावनी इसलिए कि अनदेखी भारी पड़ सकती है, और अवसर इसलिए कि मेडिकल कॉलेज की स्थापना कर सरकार क्षेत्र के लाखों लोगों का विश्वास जीत सकती है।










