अमिताभ ठाकुर की रिहाई को लेकर लंबे समय से चल रही कानूनी उलझनें अब लगभग समाप्त होती दिख रही हैं। देवरिया जिला जेल में बंद पूर्व आईपीएस अधिकारी
अमिताभ ठाकुर
को लखनऊ की अदालत से एक बड़ी राहत मिली है। तालकटोरा थाना मामले में पहले ही जमानत मिलने के बाद अब लखनऊ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय ने उनके विरुद्ध जारी
वारंट बी को भी वापस करने का आदेश दे दिया है। इस न्यायिक फैसले के बाद उनकी रिहाई का रास्ता काफी हद तक साफ हो गया है।
लखनऊ कोर्ट का आदेश: वारंट बी निराधार माना गया
लखनऊ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय में हुई सुनवाई के दौरान अमिताभ ठाकुर की ओर से अधिवक्ता दीपक कुमार ने जोरदार बहस करते हुए कहा कि अभियुक्त की व्यक्तिगत उपस्थिति की मांग पूरी तरह अनावश्यक है। उन्होंने दलील दी कि संबंधित मामले में पहले ही सक्षम न्यायालय से जमानत मिल चुकी है और ऐसे में वारंट बी का कोई औचित्य नहीं बनता।
सुनवाई के दौरान पुलिस की ओर से वारंट बी के आधार पर रिमांड की मांग की गई, लेकिन अदालत ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह वारंट बी निराधार है और इसे तत्काल प्रभाव से वापस किया जाना चाहिए। इसी आदेश के साथ अमिताभ ठाकुर की रिहाई से जुड़ी सबसे बड़ी कानूनी बाधा भी समाप्त हो गई।
क्यों अटका था रिहाई का मामला?
दरअसल, अमिताभ ठाकुर के खिलाफ वर्ष 2025 के सितंबर महीने में लखनऊ के तालकटोरा थाना में धोखाधड़ी से जुड़ा एक मुकदमा दर्ज किया गया था। इस मुकदमे में उनके ऊपर भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468, 471 और 120-बी के तहत आरोप लगाए गए थे। आरोप यह था कि देवरिया औद्योगिक संस्थान में प्लाट आवंटन के दौरान अनियमितता और धोखाधड़ी हुई है।
इस मामले में अमिताभ ठाकुर को देवरिया जेल भेजा गया और वे 10 दिसंबर से न्यायिक हिरासत में थे। देवरिया सीजेएम कोर्ट से उन्हें जमानत मिल चुकी थी, लेकिन बाद में केस का ट्रांसफर तालकटोरा थाना से गोमती नगर विस्तार थाना कर दिया गया। यहीं से वारंट बी की प्रक्रिया शुरू हुई, जिसने उनकी रिहाई को तकनीकी तौर पर रोक दिया।
वारंट बी क्या होता है और इसका महत्व
आम पाठकों के लिए यह समझना जरूरी है कि वारंट बी कोई गिरफ्तारी वारंट नहीं होता। यह दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 267 के तहत जारी किया जाने वाला एक अदालती आदेश होता है। इसके माध्यम से किसी जेल में पहले से बंद आरोपी को किसी अन्य मामले में पेशी या पूछताछ के लिए अदालत में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया जाता है।
अमिताभ ठाकुर के मामले में वारंट बी का उपयोग उनकी व्यक्तिगत उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए किया गया था, लेकिन चूंकि उन्हें पहले ही जमानत मिल चुकी थी और उनकी हिरासत किसी अन्य अदालत के आदेश पर थी, इसलिए न्यायालय ने इसे अनावश्यक और निराधार माना।
अधिवक्ताओं की दलील और न्यायिक दृष्टिकोण
अमिताभ ठाकुर के अधिवक्ता प्रवीण द्विवेदी ने बताया कि अदालत ने मामले की पूरी पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि केवल औपचारिकता के लिए किसी व्यक्ति को जेल में रोके रखना न्यायसंगत नहीं है। उन्होंने कहा कि वारंट बी की वापसी के बाद अब उनकी रिहाई लगभग तय मानी जा सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों का भी मानना है कि यह आदेश न्यायिक संतुलन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे यह संदेश भी जाता है कि तकनीकी प्रक्रियाओं का दुरुपयोग कर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को अनावश्यक रूप से बाधित नहीं किया जा सकता।
तबीयत बिगड़ी, मेडिकल कॉलेज में भर्ती
इधर, इसी बीच शनिवार को देवरिया जिला जेल में अमिताभ ठाकुर की तबीयत अचानक बिगड़ गई। उन्हें पेट में तेज दर्द की शिकायत हुई, जिसके बाद जेल प्रशासन ने एहतियातन उन्हें देवरिया मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया। वहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा है।
अमिताभ ठाकुर ने स्वयं बताया कि पिछले चार-पांच दिनों से उन्हें लगातार पेट दर्द की समस्या हो रही थी। जांच के लिए ब्लड सैंपल लिया जा चुका है और रविवार को सीटी स्कैन प्रस्तावित है। मेडिकल कॉलेज में उन्हें पूरी सुरक्षा व्यवस्था के बीच रखा गया है।
रिहाई के बाद क्या होंगे अगले कदम?
लखनऊ कोर्ट द्वारा वारंट बी वापस किए जाने के बाद अब कानूनी तौर पर अमिताभ ठाकुर की रिहाई में कोई बड़ी बाधा शेष नहीं बची है। माना जा रहा है कि सभी औपचारिकताएं पूरी होते ही उन्हें जेल से रिहा कर दिया जाएगा। हालांकि, उनकी स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए यह प्रक्रिया डॉक्टरों की सलाह के अनुसार आगे बढ़ाई जाएगी।
रिहाई के बाद यह मामला एक बार फिर सार्वजनिक और कानूनी बहस का विषय बन सकता है, क्योंकि इसमें प्रशासनिक प्रक्रियाओं, ट्रांसफर किए गए मुकदमों और वारंट बी के उपयोग जैसे पहलुओं पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
कुल मिलाकर, अमिताभ ठाकुर की रिहाई से जुड़ा यह घटनाक्रम केवल एक व्यक्ति की आज़ादी का मामला नहीं है, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और संतुलन का भी प्रतीक है। लखनऊ कोर्ट का यह फैसला आने वाले समय में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु के रूप में देखा जा सकता है।






