एबीवीपी की पृष्ठभूमि, सपा की साइकिल और योगी को चुनौती—मनोज तिवारी का सियासी सफ़र भारतीय राजनीति के उन विरले अध्यायों में शामिल है, जहाँ मंच, माइक और भीड़ से निकला एक कलाकार सत्ता की गलियों तक पहुँचता है। भोजपुरी गीतों और फिल्मों के ज़रिये लोकप्रियता हासिल करने वाले मनोज तिवारी की राजनीतिक यात्रा किसी पारंपरिक प्रशिक्षण या वंशवादी विरासत की देन नहीं रही, बल्कि यह एक ऐसा सफ़र है, जो प्रयोगों, भूलों, सीख और वैचारिक बदलावों से होकर गुज़रा।
समाचार सार: एबीवीपी की छात्र राजनीति से निकलकर समाजवादी पार्टी की साइकिल पर सवार होना, फिर योगी आदित्यनाथ जैसे जननेता के सामने चुनाव लड़ना और अंततः भाजपा के बड़े चेहरे के रूप में स्थापित होना—मनोज तिवारी की राजनीति कई विरोधाभासों और अनुभवों की कहानी कहती है।
भोजपुरी मंच से सियासत तक का अप्रत्याशित सफ़र
1 फरवरी 1971 को जन्मे मनोज तिवारी का प्रारंभिक जीवन कला और संघर्ष के मेल से बना रहा। औपचारिक राजनीतिक शिक्षा या संगठनात्मक प्रशिक्षण के बिना उन्होंने भोजपुरी गायन और सिनेमा के माध्यम से अपनी पहचान बनाई। ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने बिना किसी बड़े फिल्मी घराने के सहारे भोजपुरी सिनेमा में जगह बनाई, राजनीति में भी उनका प्रवेश किसी तयशुदा योजना का हिस्सा नहीं था।
एबीवीपी की पृष्ठभूमि और वैचारिक आधार
मनोज तिवारी का नाम जब पहली बार राजनीतिक संदर्भों में लिया गया, तो यह तथ्य सामने आया कि वे एबीवीपी से जुड़े रहे हैं। छात्र राजनीति के इस अनुभव ने उन्हें संगठन, अनुशासन और विचारधारा का प्रारंभिक पाठ पढ़ाया। हालांकि, यह जुड़ाव उनके राजनीतिक भविष्य की दिशा तय नहीं कर पाया, लेकिन उनके भीतर राजनीति को देखने-समझने की दृष्टि अवश्य विकसित हुई।
फिल्मी सेट से सपा की साइकिल तक
मनोज तिवारी के राजनीतिक जीवन का सबसे रोचक मोड़ तब आया, जब वे अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म ‘गंगा’ की शूटिंग में व्यस्त थे। उसी दौरान समाजवादी पार्टी के तत्कालीन महासचिव अमर सिंह वहाँ पहुँचे। अचानक हुए इस मिलन ने तिवारी की ज़िंदगी की दिशा बदल दी। अमर सिंह ने उन्हें राजनीति में आने का प्रस्ताव दिया और सपा की साइकिल पर सवार कर सीधे चुनावी मैदान में उतार दिया।
योगी आदित्यनाथ के सामने चुनाव और आत्ममंथन
सबसे दिलचस्प तथ्य यह रहा कि मनोज तिवारी, जिनके भीतर योगी आदित्यनाथ के प्रति सम्मान था, उन्हें उन्हीं के खिलाफ गोरखपुर से चुनाव लड़ना पड़ा। स्वयं मनोज तिवारी के अनुसार, यह उनके लिए मानसिक रूप से सबसे कठिन क्षण था। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें दो दिन में ही यह अहसास हो गया था कि वे गलत जगह खड़े कर दिए गए हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि वे एक समय चुनावी मैदान से भागने की कोशिश तक कर चुके थे, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें वहीं टिके रहने को मजबूर किया। अंततः यही हार उनके लिए राजनीति की सबसे बड़ी सीख बन गई—जनता से जुड़ाव, निरंतरता और ज़मीन पर काम का महत्व।
हार से संसद तक: राजनीतिक परिपक्वता का दौर
गोरखपुर की हार के बाद मनोज तिवारी का राजनीतिक सफ़र रुका नहीं। समय के साथ उन्होंने अपनी दिशा बदली और 2014 में भाजपा के टिकट पर उत्तर पूर्वी दिल्ली से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुँचे। इसके बाद से वे लगातार चुनाव जीतते आ रहे हैं, जो उनकी बदली हुई राजनीतिक रणनीति और जनस्वीकार्यता को दर्शाता है।
कला, लोकप्रियता और राजनीति का संगम
राजनीति से पहले मनोज तिवारी ने लगभग एक दशक तक भोजपुरी गायक के रूप में काम किया। 2003 में ‘ससुरा बड़ा पैसा वाला’ जैसी फिल्मों ने उन्हें घर-घर पहचान दिलाई। इसके बाद फिल्मों, टीवी कार्यक्रमों और रियलिटी शो के ज़रिये उन्होंने अपनी लोकप्रियता को विस्तार दिया, जो बाद में राजनीति में उनके लिए एक मजबूत आधार बनी।
एक असामान्य लेकिन शिक्षाप्रद राजनीतिक यात्रा
एबीवीपी की पृष्ठभूमि, सपा की साइकिल और योगी को चुनौती—मनोज तिवारी का सियासी सफ़र यह दिखाता है कि भारतीय राजनीति केवल वंश या संगठन तक सीमित नहीं है। यह सफ़र प्रयोगों से भरा है, जहाँ गलतियाँ भी सीख में बदल जाती हैं और हार भविष्य की जीत की नींव रखती है।







