“अब प्रमाण देने की बारी आपकी है” – स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद
सियासी-धार्मिक भूचाल की शुरुआत उस वक्त हुई जब प्रयागराज माघ मेला छोड़ने के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने सरकार और प्रशासन पर लगातार तीखे बयान देने शुरू किए। उनका आरोप है कि माघ मेला के दौरान संतों, संन्यासियों और गुरुकुल में शिक्षा लेने आए विद्यार्थियों के साथ जो व्यवहार हुआ, वह न केवल प्रशासनिक असंवेदनशीलता को दर्शाता है, बल्कि सनातन परंपरा के प्रति सत्ता के दृष्टिकोण पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
वाराणसी की प्रेस कॉन्फ्रेंस और बयान का केंद्र
वाराणसी में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में शंकराचार्य ने कहा कि उनसे शंकराचार्य होने का प्रमाण पत्र मांगा गया था, जिसे उन्होंने प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, प्रमाण सही और प्रामाणिक पाए गए, इसलिए प्रशासन को उन्हें स्वीकार करना पड़ा। शंकराचार्य का कहना था कि यह प्रक्रिया ही दर्शाती है कि अब प्रमाण मांगने का समय समाप्त हो चुका है और असली सवाल अब सत्ता से होना चाहिए।
उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को यह प्रमाण देना चाहिए कि वे वास्तव में हिंदू हैं। यह बयान राजनीतिक आलोचना से कहीं आगे जाकर धार्मिक और वैचारिक विमर्श का रूप लेता दिखा। उनके इस कथन के बाद सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई और बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं।
40 दिन का अल्टीमेटम और ‘गो-भक्ति’ का सवाल
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि वे मुख्यमंत्री को 40 दिनों का समय दे रहे हैं। इस अवधि में मुख्यमंत्री को यह प्रमाण देना होगा कि वे वास्तव में गो-भक्त हैं। शंकराचार्य के शब्दों में, यदि यह प्रमाण नहीं दिया गया तो उन्हें नकली हिंदू, कालनेमि, पाखंडी और ढोंगी माना जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि सिर्फ दिखावे के लिए गेरुआ वस्त्र धारण कर लेना सनातन की सेवा नहीं है।
यह बयान सत्ता और संत के संबंधों पर नई बहस को जन्म देता है। सवाल यह भी उठता है कि गो-भक्ति और हिंदुत्व का प्रमाण कौन तय करेगा और उसकी कसौटी क्या होगी। यही कारण है कि यह विवाद सिर्फ राजनीतिक नहीं रह गया, बल्कि धार्मिक पहचान और नैतिक अधिकार के विमर्श में बदल गया है।
‘काम राक्षसों के, चोला साधुओं का’ — तीखा व्यंग्य
इससे पहले मीडिया से बातचीत में शंकराचार्य ने सरकार पर व्यंग्य करते हुए कहा था कि यहां लोगों के काम राक्षसों जैसे हैं और चोला साधुओं का पहने बैठे हैं। उनका कहना था कि संत कभी बंट नहीं सकते। जो लोग संत के नाम पर वेशधारी बनकर दिखाई देते हैं, वे अपने आप अलग हैं और उन्हें असली संत नहीं कहा जा सकता।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि ढोंगी संत और सच्चा संत हमेशा अलग होते हैं। प्रयागराज में जो लाठी चली, उसका निशाना सिर्फ असली संत नहीं थे, बल्कि गुरुकुल के छात्र, संन्यासी, ब्रह्मचारी, साध्वियां और बुजुर्ग भी उसकी चपेट में आए। ये सभी सनातन धर्म का अभिन्न हिस्सा हैं।
लाठीचार्ज और संत समाज की पीड़ा
शंकराचार्य का कहना है कि जिस समाज को इस घटना से पीड़ा नहीं हो रही, वे असली संत नहीं हो सकते। उनके अनुसार, जो सत्ता के सामने मौन साधे रहते हैं और अन्याय पर सवाल नहीं उठाते, वे ढोंगी संत हैं। इस बयान ने संत समाज के भीतर भी आत्ममंथन की स्थिति पैदा कर दी है।
माघ मेला जैसे आयोजन को केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक माना जाता है। ऐसे में वहां संतों और विद्यार्थियों पर लाठीचार्ज की घटना को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सरकार पर ब्राह्मण विरोधी होने का आरोप
शंकराचार्य ने सरकार पर ब्राह्मण विरोधी होने का भी गंभीर आरोप लगाया। उनका कहना है कि पहले संघर्ष की स्थिति में महिलाओं और बच्चों को नहीं छुआ जाता था, लेकिन अब हालात बदल गए हैं। उन्होंने दावा किया कि ब्राह्मण बच्चों को भी निशाना बनाया जा रहा है, जो सामाजिक संतुलन के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।
उनका आरोप है कि इस पूरी घटना के बाद भी किसी प्रशासनिक अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई। इससे यह संदेश जाता है कि सत्ता का नजरिया अब एक खास वर्ग के खिलाफ हो गया है। यही बात इस विवाद को और गंभीर बनाती है।
राजनीति, धर्म और सत्ता की त्रिकोणीय टकराहट
यह पूरा प्रकरण राजनीति, धर्म और सत्ता के बीच चल रही उस त्रिकोणीय टकराहट को उजागर करता है, जो अक्सर सार्वजनिक मंचों पर दिखाई नहीं देती। शंकराचार्य का सवाल सिर्फ मुख्यमंत्री तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उस व्यवस्था पर भी है जो धार्मिक पहचान को राजनीतिक लाभ का साधन बनाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बयान आने वाले दिनों में राजनीतिक विमर्श को और तीखा कर सकते हैं। साथ ही, संत समाज और सरकार के रिश्तों में नई दूरी भी पैदा हो सकती है।
आगे क्या?
अब सवाल यह है कि मुख्यमंत्री और सरकार इस चुनौती का जवाब किस रूप में देती है। क्या यह विवाद संवाद से सुलझेगा या फिर सियासी-धार्मिक टकराव और गहराएगा। फिलहाल इतना तय है कि शंकराचार्य के बयान ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि सत्ता और सनातन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।






