देवरिया जिले के भाटपार रानी और सलेमपुर में स्वच्छता व्यवस्था की जमीनी हकीकत सामने आई है, जहां कागज़ों में सफाई के दावों के बावजूद सड़कों, नालियों और बाजारों में कचरे का अंबार दिखाई देता है। इस तहकीकी रिपोर्ट में गुदरी बाजार, स्टेशन रोड, नहर किनारे और ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। कचरा प्रबंधन की कमी, नालियों की सफाई में लापरवाही और प्रशासनिक दावों के बीच अंतर साफ नजर आता है। यह रिपोर्ट स्वच्छ भारत मिशन के वास्तविक क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करती है और स्थानीय स्तर पर सुधार की जरूरत को रेखांकित करती है।
देवरिया… पूर्वांचल का वह जिला, जहां खेतों की हरियाली, कस्बों की हलचल और गांवों की सादगी एक साथ सांस लेती है। लेकिन इसी ज़मीन पर एक सवाल बार-बार सिर उठाता है—क्या स्वच्छता केवल योजनाओं के कागज़ों में है, या जमीन पर भी उसकी सांस चल रही है? इसी सवाल को लेकर हमारे सहयोगी इरफान अली लारी ने भाटपार रानी और सलेमपुर क्षेत्र का एक विस्तृत तहकीकी जायजा लिया। यह रिपोर्ट सिर्फ दृश्य नहीं, बल्कि उस सच्चाई का आईना है, जो अक्सर पोस्टर और प्रचार के पीछे छिप जाती है।
🧭 स्वच्छता की हकीकत: कागज़ बनाम ज़मीन
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देवरिया जिले में स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण और शहरी) के तहत शौचालय निर्माण, कचरा प्रबंधन और साफ-सफाई के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं। जिले में 90% से अधिक घरों में शौचालय निर्माण का दावा किया गया है। नगर निकायों में नियमित सफाई और कचरा उठान का दावा। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए योजनाएं लागू, लेकिन जब लारी टीम भाटपार रानी की गलियों में उतरी, तो तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती नजर आई।
🏙️ भाटपार रानी : बाजार चमकता, गलियां थकती हुई
भाटपार रानी कस्बा, जहां रोज़ सैकड़ों लोग खरीदारी के लिए आते हैं, पहली नजर में व्यवस्थित लगता है। मुख्य बाजार में सफाई दिखाई देती है, लेकिन जैसे ही अंदर की गलियों में कदम बढ़ते हैं, कहानी बदल जाती है। एक स्थानीय दुकानदार ने मुस्कुराते हुए कहा— “बाबू, सामने से सब बढ़िया दिखे ला… अंदर आईं त सच्चाई दिखी।”
🏙️ गुदरी बाजार से स्टेशन रोड तक सफाई की असमान तस्वीर
भाटपार रानी में स्वच्छता का जायजा लेते हुए इरफान अली लारी की टीम सबसे पहले गुदरी बाजार पहुंची। यहां सुबह के समय दुकानें खुल रही थीं, लेकिन सड़क किनारे रात भर का जमा कचरा अब भी मौजूद था। सब्जी मंडी के पास प्लास्टिक, सड़ी सब्जियों और पॉलिथीन का ढेर साफ-सफाई के दावों पर सवाल खड़ा करता दिखा। एक दुकानदार ने साफ शब्दों में कहा— “सुबह-सुबह ग्राहक आवे से पहिले अगर सफाई हो जाव त बढ़िया रहे, लेकिन कई दिन तक कूड़ा जस के तस पड़ा रहेला…” इसके बाद टीम स्टेशन रोड की ओर बढ़ी। यहां मुख्य सड़क तो अपेक्षाकृत साफ दिखी, लेकिन अंदर की गलियों में नालियां जाम थीं। कई जगहों पर पानी ठहरा हुआ था, जिसमें मच्छरों का जमाव साफ नजर आया।
🌧️ वार्ड नंबर 7 और 11 : नालियों में कचरे की परत
भाटपार रानी के वार्ड नंबर 7 (नई बस्ती क्षेत्र) में नालियों की स्थिति बेहद खराब पाई गई। नाली के ऊपर प्लास्टिक और कचरे की परत जमी हुई थी, जिससे पानी का बहाव रुक गया था। वहीं वार्ड नंबर 11 (कस्बा अंदरूनी मोहल्ला) में लोगों ने बताया कि “बरसात में पानी घर में घुस जाला… सफाई महीना में एकाध बार होखेला।” यह केवल एक मोहल्ले की समस्या नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की लापरवाही का संकेत है।
🏡 सलेमपुर: नहर किनारे और बस स्टैंड के आसपास गंदगी
सलेमपुर क्षेत्र में टीम ने बस स्टैंड के पीछे का इलाका देखा, जहां कचरा खुले में फेंका जा रहा था। यहां कोई स्थायी कचरा संग्रहण केंद्र नहीं मिला। एक स्थानीय युवक ने कहा— “डस्टबिन त लगल बा, लेकिन उठान ना होखे… त लोग कूड़ा बाहर फेंक देला।” इसके बाद टीम सलेमपुर नहर किनारे (पश्चिमी छोर) पहुंची। यहां हालात और भी चिंताजनक थे। नहर के किनारे प्लास्टिक, घरेलू कचरा और पशुओं का गोबर एक साथ जमा था। यह स्थिति सीधे तौर पर जल प्रदूषण और स्वास्थ्य खतरे को बढ़ाती है।
🚮 ग्राम सभा उदाहरण: पिपरा और बनकटा
सलेमपुर ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले पिपरा ग्राम सभा में कचरा निस्तारण की कोई व्यवस्थित व्यवस्था नहीं मिली। घरों के बाहर कूड़े के छोटे-छोटे ढेर दिखाई दिए। वहीं बनकटा क्षेत्र में लोगों ने बताया कि “कचरा उठावे वाला गाड़ी कभी-कभार आवेला… बाकी दिन लोग खुदे निस्तारण करे के मजबूर बा।”
“जब गुदरी बाजार से लेकर सलेमपुर नहर किनारे तक एक ही कहानी दोहराई जाए, तो यह समस्या किसी एक मोहल्ले की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की बन जाती है।”
📊 आंकड़ों की परत
नगर पंचायत के रिकॉर्ड के अनुसार, प्रतिदिन लगभग 3 से 5 टन कचरा उत्पन्न होता है। लेकिन नियमित उठान 60–70% तक ही सीमित, यानी करीब 30–40% कचरा सड़कों या नालियों में ही रह जाता है।
🌧️ नालियों की कहानी
भाटपार रानी की कई नालियां ऐसी हैं, जहां पानी से ज्यादा कचरा बहता दिखता है। एक बुजुर्ग ने कहा— “पानी त बहेला, लेकिन गंदगी ओही जगह ठहर जाला… बदबू से जीना मुश्किल हो जाला।”
🧠 जागरूकता बनाम आदत
स्वच्छता केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, यह सामाजिक व्यवहार का भी हिस्सा है। लोग कचरा सड़क पर फेंकते हैं, प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग करते हैं, नालियों में कूड़ा डालने की आदत रखते हैं। एक युवक ने कहा— “सरकार साफ करे, हम फिर गंदा कर देतानी… ई भी सही नइखे।”
🌱 समाधान की दिशा
स्थायी कचरा प्रबंधन व्यवस्था, स्थानीय निगरानी समिति, निरंतर जन-जागरूकता अभियान, सख्त जुर्माना और सफाईकर्मियों की संख्या बढ़ाना—ये कुछ ऐसे कदम हैं जो बदलाव ला सकते हैं।
🪞 निष्कर्ष
इरफान अली लारी की यह तहकीकी रिपोर्ट केवल एक निरीक्षण नहीं, बल्कि एक सवाल है—क्या हम सच में स्वच्छता चाहते हैं, या केवल उसका दिखावा? भाटपार रानी से सलेमपुर तक यह साफ दिखता है कि सफाई केवल झाड़ू से नहीं, सोच से शुरू होती है।
❓ FAQ
प्रश्न: देवरिया में स्वच्छता की सबसे बड़ी समस्या क्या है?
उत्तर: कचरा प्रबंधन की कमी और नालियों की सफाई का अभाव।
प्रश्न: क्या सरकारी योजनाएं लागू हैं?
उत्तर: हां, लेकिन क्रियान्वयन अधूरा है।
प्रश्न: समाधान क्या हो सकता है?
उत्तर: जागरूकता, निगरानी और संसाधनों का सही उपयोग।






