भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का नाम लेकर रचा गया ऐसा खेल, जिसने एक परिवार को तोड़ दिया

डीग जिले के जनूथर पुलिस थाने का भवन, जहां नौकरी के नाम पर धोखाधड़ी मामले में कार्रवाई की गई

हिमांशु मोदी की रिपोर्ट
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भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का नाम लेकर रचा गया ऐसा खेल भरतपुर संभाग के डीग जिले में एक परिवार के लिए भरोसे के टूटने, आर्थिक नुकसान और मानसिक आघात की कहानी बन गया। सरकारी नौकरी पाने की उम्मीद, परिचय की नजदीकियां और संस्थान के नाम की विश्वसनीयता—इन तीनों को हथियार बनाकर जिस तरह एक सुनियोजित धोखाधड़ी को अंजाम दिया गया, उसने न केवल एक युवक के सपनों को तोड़ा बल्कि पूरे परिवार को वर्षों तक चलने वाली पीड़ा में धकेल दिया।

🔎 सौम्य संकेत :

नकली भरोसा, असली संस्थान का नाम और वर्षों तक चलता रहा इंतज़ार—आख़िर कैसे एक नौकरी का सपना परिवार के लिए सबसे बड़ी चोट बन गया?

📍 एक शिकायत से खुली परतें

इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ, जब डीग जिले के क़स्बा जनूथर थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम तरोडर निवासी 32 वर्षीय अशोक कुमार ने पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में उन्होंने बताया कि उनके परिचित व्यक्ति ने उनके भतीजे को entity[“organization”,”भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान”,”indian agricultural research body”] (ICAR) में नौकरी दिलाने का भरोसा दिया था। यही भरोसा धीरे-धीरे एक सुनियोजित छल में बदलता चला गया।

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👤 जान-पहचान कैसे बनी कमजोरी

अशोक कुमार के अनुसार, आरोपी रवि कुमार पुत्र सुंदर सिंह जाट, निवासी अंधियार, तहसील मांट, जिला मथुरा, अक्सर उनके गांव आता-जाता था। गांव में नियमित आवाजाही, पारिवारिक बातचीत और व्यवहारिक निकटता के कारण किसी को भी उस पर शक नहीं हुआ। यही परिचय इस पूरे घटनाक्रम की सबसे मजबूत कड़ी साबित हुआ।

💼 नौकरी का सपना और विश्वास की कीमत

आरोपी ने दावा किया कि उसके पास ऐसे संपर्क हैं, जिनके जरिए वह हरेंद्र को ICAR में नौकरी दिलवा सकता है। उसने चयन प्रक्रिया, परीक्षा और नियुक्ति को लेकर इतनी आत्मविश्वास भरी बातें कहीं कि परिवार को यह प्रस्ताव वास्तविक लगा। धीरे-धीरे बातचीत पैसों तक पहुंची और नौकरी की ‘गारंटी’ के नाम पर एक बड़ी रकम की मांग रखी गई।

📅 भरोसे की तारीखें और पुख्ता दावे

5 दिसंबर 2021 को आरोपी स्वयं गांव तरोडर आया। उसने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नौकरी तय है और प्रक्रिया बस औपचारिकता भर है। इसी भरोसे पर अशोक कुमार ने नकद और ऑनलाइन माध्यम से चरणबद्ध तरीके से रकम सौंप दी। उस समय किसी ने यह नहीं सोचा कि भरोसे की यह डोर आगे चलकर सबसे बड़ा पछतावा बन जाएगी।

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📄 फर्जी दस्तावेज़, असली भ्रम

भरोसा और गहरा करने के लिए आरोपी ने अशोक कुमार के व्हाट्सएप पर ICAR भर्ती से जुड़ा एक कथित एडमिट कार्ड भेजा। यही नहीं, परीक्षा दिलवाने की पूरी कहानी भी रची गई। परिवार को लगा कि सब कुछ संस्थागत प्रक्रिया के तहत हो रहा है, जबकि असल में हर कदम झूठ की बुनियाद पर रखा गया था।

⏳ इंतज़ार लंबा होता गया

परीक्षा के बाद जब महीनों तक कोई परिणाम नहीं आया और नौकरी की कोई सूचना नहीं मिली, तो परिवार में बेचैनी बढ़ने लगी। पूछने पर हर बार नई तारीख, नई वजह और नई उम्मीद दी जाती रही। यही वह दौर था जब भरोसा और संदेह आपस में टकराने लगे।

📞 सच का सामना

29 अप्रैल 2025 को फोन पर हुई बातचीत ने इस पूरे मामले की परतें खोल दीं। बातचीत के दौरान आरोपी ने स्वीकार किया कि उसने छल-कपट और बेईमानी की नीयत से पैसे लिए थे। उसने साफ कहा कि न तो कोई नौकरी लगी है और न ही वह रकम लौटाने वाला है। इस स्वीकारोक्ति ने परिवार को भीतर तक तोड़ दिया।

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⚖️ पुलिस जांच और गिरफ्तारी

इसके बाद जनूथर थाने में बीएनएस की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया। पुलिस ने जांच शुरू की और आरोपी को वांछित घोषित किया। बाद में उसे गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस अब यह भी जांच कर रही है कि कहीं इस तरह के अन्य मामलों में भी आरोपी की भूमिका तो नहीं रही।

🚨 बड़ा सवाल: कब टूटेगा यह जाल?

सरकारी संस्थानों के नाम पर नौकरी दिलाने का झांसा देना कोई नया अपराध नहीं है। बेरोज़गारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की कठिनता और सूचनाओं की कमी ऐसे अपराधों के लिए ज़मीन तैयार करती है। यह मामला उसी कड़वी सच्चाई की एक और मिसाल है।

🛑 सबक जो नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता

विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी सरकारी नौकरी में न तो निजी व्यक्ति के माध्यम से चयन होता है और न ही पैसों का लेन-देन। अभ्यर्थियों और उनके परिवारों को चाहिए कि वे केवल आधिकारिक वेबसाइट, अधिसूचना और सार्वजनिक सूचनाओं पर ही भरोसा करें।

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