लखनऊ के सरोजिनी नगर क्षेत्र में निजी स्कूलों द्वारा कॉपी-किताब, ड्रेस और स्टेशनरी के नाम पर अभिभावकों से कथित वसूली का मामला सामने आया है। ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले गरीब परिवारों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है, जहां शिक्षा एक अधिकार के बजाय महंगा सौदा बनती जा रही है। प्रशासनिक निर्देशों के बावजूद इस तरह की गतिविधियों पर रोक नहीं लग पाना शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
लखनऊ। राजधानी के सरोजिनी नगर क्षेत्र, विशेषकर बन्थरा इलाके से एक बार फिर शिक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल सामने आए हैं। यहां के कई निजी विद्यालयों पर आरोप है कि वे अभिभावकों को कॉपी, किताब, ड्रेस और स्टेशनरी खरीदने के लिए मजबूर कर रहे हैं। इतना ही नहीं, इन वस्तुओं की कीमत बाजार से कई गुना अधिक बताई जा रही है।
ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले अभिभावक, जो पहले ही आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं, अब शिक्षा के नाम पर इस अतिरिक्त बोझ को ढोने को मजबूर हैं। शिक्षा का सपना, जो कभी उजाले का रास्ता था, अब उनके लिए आर्थिक संकट का कारण बनता जा रहा है।
📚 कॉपी-किताब के नाम पर अनिवार्य खरीद का दबाव
स्थानीय लोगों का आरोप है कि स्कूल प्रबंधन अभिभावकों को खुले तौर पर निर्देश देते हैं कि वे केवल निर्धारित दुकानों से ही कॉपी, किताब और यूनिफॉर्म खरीदें। यदि कोई अभिभावक बाहर से सस्ता सामान खरीदने की कोशिश करता है, तो बच्चों को कक्षा में प्रताड़ित किए जाने की शिकायतें भी सामने आई हैं।
इस तरह की अनिवार्यता ने अभिभावकों के सामने एक तरह की मजबूरी पैदा कर दी है। वे चाहकर भी विकल्प नहीं चुन पाते। परिणामस्वरूप, उन्हें ऊंची कीमत पर सामान खरीदना पड़ता है।
💰 हजारों की वसूली, गरीब परिवारों पर बोझ
ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले कई अभिभावकों ने बताया कि एक बच्चे की पढ़ाई के नाम पर उनसे हजारों रुपये वसूले जा रहे हैं। इसमें एडमिशन फीस, मासिक शुल्क के अलावा कॉपी-किताब और ड्रेस का खर्च अलग से जोड़ा जाता है।
एक अभिभावक ने कहा कि, “हम मजदूरी करके बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं, लेकिन स्कूल वाले हर साल नई किताबें और ड्रेस खरीदने को मजबूर करते हैं। पुरानी चीजें भी चल सकती हैं, लेकिन उन्हें मान्य नहीं किया जाता।”
🏫 शिक्षा विभाग की चुप्पी पर सवाल
जिलाधिकारी स्तर से भले ही समय-समय पर ऐसे मामलों में सख्ती के निर्देश दिए जाते रहे हों, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका असर दिखाई नहीं दे रहा है। शिक्षा विभाग की निष्क्रियता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि कई स्कूलों के संचालकों का प्रभाव इतना मजबूत है कि प्रशासनिक कार्रवाई भी ठंडी पड़ जाती है। यही वजह है कि खुलेआम हो रही इस वसूली पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।
🕸️ शिक्षा माफिया का जाल?
सूत्रों के अनुसार, क्षेत्र में कई निजी विद्यालय ऐसे लोगों के नियंत्रण में हैं जिनकी पहुंच स्थानीय स्तर से लेकर उच्च प्रशासन तक बताई जाती है। यह नेटवर्क इतना मजबूत है कि नियमों की अनदेखी के बावजूद इन संस्थानों पर कार्रवाई नहीं हो पाती।
यह भी आरोप है कि इन स्कूलों में कई जगह मानकों के अनुरूप शिक्षक नहीं हैं। कम वेतन पर स्थानीय बेरोजगार युवाओं, खासकर युवतियों को नौकरी देकर बच्चों को पढ़ाने का काम लिया जा रहा है।
👩🏫 कम वेतन पर शिक्षक, शिक्षा की गुणवत्ता पर असर
रिपोर्ट के अनुसार, कई स्कूलों में शिक्षकों को मात्र 3000 से 5000 रुपये तक का वेतन दिया जा रहा है। इतने कम वेतन में योग्य और प्रशिक्षित शिक्षक मिलना मुश्किल है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ रहा है।
इसका खामियाजा अंततः छात्रों को ही भुगतना पड़ता है। अभिभावक भारी फीस चुकाते हैं, लेकिन बदले में उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल पाती।
⚖️ नियम बनाम वास्तविकता
सरकार की ओर से स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि स्कूल किसी भी प्रकार की अनिवार्य खरीद के लिए अभिभावकों को बाध्य नहीं कर सकते। इसके बावजूद जमीनी हकीकत इन नियमों के उलट दिखाई देती है।
यह अंतर बताता है कि नियमों का पालन केवल कागजों तक सीमित है, जबकि वास्तविकता में स्थिति पूरी तरह विपरीत है।
❗ क्या होगी कार्रवाई?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन इस मामले में सख्त कदम उठाएगा? क्या इन स्कूलों की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी? और क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी?
यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो शिक्षा के नाम पर हो रही यह लूट आगे और भी बड़े रूप में सामने आ सकती है।
❓ FAQ: इस मामले से जुड़े अहम सवाल
प्रश्न: क्या स्कूल अभिभावकों को विशेष दुकान से सामान खरीदने के लिए बाध्य कर सकते हैं?
उत्तर: नहीं, नियमों के अनुसार ऐसा करना अवैध है।
प्रश्न: इस मामले में शिकायत कहाँ की जा सकती है?
उत्तर: अभिभावक जिला शिक्षा अधिकारी या जिलाधिकारी कार्यालय में शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
प्रश्न: क्या इस तरह की वसूली पर कार्रवाई हो सकती है?
उत्तर: हां, जांच में दोषी पाए जाने पर स्कूल के खिलाफ सख्त कार्रवाई संभव है।






