सिगरेट बनाम विवेक : जहाँ दादाजी हारे और पोता इतिहास लिख गया

एक बुज़ुर्ग व्यक्ति हाथ में सिगरेट लिए खड़ा है और सामने एक बच्चा उसे गंभीरता से देख रहा है, पीढ़ियों के बीच आदत और विवेक का प्रतीकात्मक दृश्य

अनिल अनूप
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सिगरेट बनाम विवेक : जहाँ अनुभव और मासूम विवेक आमने-सामने आते हैं। यह व्यंग्य हँसाता भी है और भीतर तक ठहरने को मजबूर करता है।

मेरे एक मित्र हैं। रिटायर्ड शिक्षक।ऐसे शिक्षक कि अगर ये किसी को डाँट दें तो गलती खुद ही माफ़ी माँग ले।
पूरी उम्र इन्होंने अनुशासन पढ़ाया, चरित्र गढ़ा, नैतिकता पर भाषण दिए।
लेकिन नियति बड़ी शरारती होती है— इन्हें रिटायरमेंट के बाद एक ऐसा विषय पढ़ाना पड़ा जिसका सिलेबस इन्होंने कभी नहीं बनाया था—
🚬 “स्वयं का स्वास्थ्य”

अब ये सिगरेट पीते नहीं हैं। नहीं, नहीं…ये तो सिगरेट को सम्मान देते हैं। जेब से निकालते हैं ऐसे जैसे कोई विद्वान ग्रंथ निकाल रहा हो। सिगरेट जलाते समय चेहरे पर जो गंभीरता होती है, वो ऐसी कि लगे—
“अब कोई ऐतिहासिक निर्णय होने वाला है।”

पहला कश— आँखें आधी बंद। दूसरा कश— माथे पर चिंता की लकीर। तीसरा कश— खाँसी, जो पूरे मोहल्ले को सूचित कर देती है कि “हाँ, ज्ञान प्रज्वलित हो चुका है।”

अब इसी घर में एक और प्राणी रहता है—
पोता। उम्र 7–8 साल। इतना छोटा कि जूते के फीते बाँधने में समय ले, और बड़ा इतना कि दादाजी की आदत पहचान ले।
यह बालक सिगरेट की डब्बी को ऐसे देखता है जैसे रामायण में रावण को देखा जाता है— सम्मान के साथ नहीं, सावधानी के साथ।

वो चुपके से आता है, डब्बी उठाता है और उसे ऐसी जगह छुपाता है जहाँ दादाजी की पूरी विद्वता भी काम नहीं आती।

दादाजी खोज शुरू करते हैं। पहले हल्की खोज— “यहीं रखी थी…” फिर मध्यम खोज— “अरे कोई ले तो नहीं गया?”
और अंत में गंभीर खोज
“लगता है आज किस्मत नाराज़ है।”

तभी पोता सामने आता है। न कोई डर। न कोई अपराधबोध। और कहता है—
“दादाजी, सिगरेट पीने से आदमी मर जाता है।”

बस। यहीं पर पूरी शिक्षा व्यवस्था चारों खाने चित्त। जिस आदमी ने हज़ारों बच्चों को जीवन का पाठ पढ़ाया, आज उसी को एक बच्चा दो पंक्तियों में पाठ समझा गया।

मैं जब उनसे बात करता हूँ तो कहता हूँ—
“भाई, आप विचारों के चेन स्मोकर हैं, पर शरीर को तो माफ़ कर दीजिए।”
वो मुस्कुराते हैं। कहते हैं— “अब आदत पड़ गई है।”

हाँ! यही तो सिगरेट की असली जीत है—
आदत। ना स्वाद, ना शौक, ना स्टाइल— बस आदत। एक ऐसी आदत जो पहले दोस्त बनती है, फिर मालिक, और अंत में डॉक्टर का ग्राहक बना देती है।

सबसे मज़ेदार दृश्य तब होता है जब दादाजी पोते से छुपकर सिगरेट पीने की कोशिश करते हैं।
सोचिए ज़रा— जिस आदमी ने जीवन भर “छुपकर मत करो” पढ़ाया, आज वही देवताओं की तरह छुपकर धुआँ छोड़ रहा है।

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और पोता?
वो देख रहा है। समझ रहा है। सीख रहा है— लेकिन सिगरेट नहीं, ज़िम्मेदारी।

यही तो असली व्यंग्य है— बच्चा दादाजी की साँसें बचा रहा है, और दादाजी उसे “बड़े होकर समझना” सिखा रहे हैं।

🚬 सिगरेट की सबसे बड़ी चाल यही है
वो आपको तुरंत नहीं मारती, वो आपको
धीरे-धीरे अपने ही तर्कों से हराती है।

“एक से क्या होगा?”
“अब छोड़कर क्या फायदा?”
“इतनी उम्र हो गई…”

लेकिन सच ये है— सिगरेट कभी उम्र नहीं देखती, वो सिर्फ मौका देखती है।

और जब पोते आपकी जेब टटोलने लगें, तो समझ लीजिए— आपकी आदत नहीं, आपका उदाहरण खतरनाक हो गया है।

अगर यहाँ तक पढ़कर भी आपको हँसी नहीं आई, तो कोई बात नहीं। कम से कम धुएँ को एक पल के लिए सोचने का मौका तो मिला।

और अगर आज रात आप सिगरेट जलाने से पहले बस एक सेकंड रुक गए— तो समझिए ये व्यंग्य अपना काम कर गया।

हँसी ज़रूरी है, पर साँस उससे भी ज़्यादा।

अब बताइए भाई साहब— तब सिगरेट भी शिक्षक बन गई❓

आप सोच रहे होंगे कि बात यहीं खत्म हो गई। नहीं साहब। यहाँ से कहानी ने असली मोड़ लिया।

एक दिन दादाजी ने ठान लिया— “आज सिगरेट पीकर ही रहूँगा। पोता क्या कर लेगा?”
अब यह वही आत्मविश्वास है जो आदमी को
पर्ची काटने वाले से बहस करा देता है। दादाजी ने जेब बदली। कमरा बदला। यहाँ तक कि स्वेटर भी बदला— पर सिगरेट फिर भी नहीं मिली।
तभी पोता बोला— “दादाजी, आज आप नहीं पी सकते।” दादाजी चौंके—
“क्यों?”
बालक बोला— “क्योंकि आज मैंने आपकी सिगरेट पर छुट्टी घोषित कर दी है।”
अब देखिए दृश्य— एक रिटायर्ड शिक्षक एक सात साल के बच्चे से अनौपचारिक प्रतिबंध आदेश सुन रहा है।
दादाजी ने आख़िरी दाँव खेला— “तुम्हें पता है, दादाजी बहुत पढ़े-लिखे हैं।”
पोता बोला—क्ष“हाँ, तभी तो आपको समझाना पड़ रहा है।”
बस यहीं परक्षहँसी का वो ठहाका आता है जो पेट से निकलता है। अब दादाजी थोड़े भावुक हुए।
कहने लगे— “हमने ज़िंदगी में बहुत कुछ देखा है बेटा।”
पोता बोला— “इसीलिए तो मैं चाहता हूँ
आप आगे भी देखें।”
और सच मानिए— यह कोई भावुक सीन नहीं था, यह व्यंग्य का नॉकआउट पंच था।

उस दिन के बादक्षदादाजी ने सिगरेट छोड़ी नहीं, पर सिगरेट ने पहली बार दादाजी को परेशान करना शुरू किया।
अब सिगरेट जलाते हैं तो पोते की आवाज़ सुनाई देती है। खाँसते हैं तो पोते का चेहरा दिखता है। और डब्बी खोलते हैं तोक्षलगता है जैसे कोई अपराध कर रहे हों।
यहीं से सिगरेट की ताक़त टूटती है। क्योंकि सिगरेट शरीर से नहीं, तर्क से लड़ती है।क्षऔर जब तर्क हारने लगें, तो आदत भी घबराने लगती है। एक दिन दादाजी बोले—
“आज मन नहीं कर रहा।”
बस! यही पहला दिन होता है जिससे सिगरेट डरने लगती है।
मैंने उनसे कहा— भाई, अब आप सिगरेट नहीं पी रहे, आप उसे नज़रअंदाज़ कर रहे हैं।”
और जो चीज़ नज़रअंदाज़ हो जाए, उसका अंत तय होता है। अब घर का हाल देखिए— पोता विजयी है। दादाजी सोच में हैं।
और सिगरेट… किसी दराज़ में पड़ी है, बिल्कुल वैसे जैसे पुराने पाठ्यक्रम की किताबें।
यह ब्यंग्य यहाँ इसलिए खत्म नहीं होता
कि हँसी आ गई। यह इसलिए खत्म होता है
क्योंकि एक दिन आप खुद को किसी बच्चे की नज़र से देखने लगते हैं।
🚬 और सिगरेट को
किसी दुश्मन की तरह नहीं, एक गलती की तरह देखने लगते हैं। अगर इस पूरे लेख में आप हँसे भी और कहीं चुप भी हो गए— तो समझ लीजिए मज़ा रुक नहीं गया था…
वो अंदर उतर गया था।
अब आख़िरी पंक्ति सुनिए और यहीं पर मज़ा पूरा होगा
सिगरेट छोड़ना मुश्किल नहीं होता, मुश्किल ये मानना होता है कि एक बच्चाक्षहमसे ज़्यादा समझदार हो सकता है। धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा। न कोई क्रांति हुई,
न कोई संकल्प दिवस मनाया गया।
बस इतना हुआ कि दादाजी की सिगरेट अब
पहले जैसी बेफ़िक्र नहीं रही। पहले सिगरेट जेब में रहती थी— अब जेब सिगरेट से बचने लगी। पहले दादाजी घड़ी देखते थे— “चलो, एक कश हो जाए।” अब कश घड़ी देखकर डरता था— “कहीं पोता न आ जाए।”
एक दिन दादाजी सिगरेट लेकर बालकनी में खड़े थे। पूरा माहौल तैयार— शाम, ठंडी हवा, पहाड़ों की शांति। जैसे ही लाइटर जला— पीछे से आवाज़ आई—
“दादाजी, आप फिर वही कर रहे हैं?”
अब देखिए, यह कोई डाँट नहीं थी। यह तो सीधा आईना था। दादाजी ने सिगरेट बुझा दी। कोई भाषण नहीं दिया। कोई सफ़ाई नहीं दी। बस बोले— “आज छोड़ देते हैं।”
और यही वो पल होता है जब सिगरेट पहली बार हार मानने लगती है। अब दादाजी ने एक नया खेल शुरू किया— खुद से ही बहस। “आज नहीं पिया तो क्या हुआ?”
“कल पी लेंगे।” “कल भी नहीं पिया तो?” “तो परसों।” और इसी परसों में सिगरेट का साम्राज्य धीरे-धीरे ढहने लगा।
सबसे मज़ेदार बात ये हुई कि अब पोता सिगरेट की डब्बी छुपाता नहीं था।
क्योंकि अब छुपाने लायक कुछ बचा ही नहीं था।
एक दिन पोते ने मासूमियत से पूछा— “दादाजी, आपने छोड़ दी?”
दादाजी बोले— “नहीं बेटा, बस अब उसे ज़रूरी नहीं समझता।”
वाह! यह वाक्य किसी डॉक्टर ने नहीं लिखा, किसी विज्ञापन ने नहीं सिखाया—
यह तो पोते की चुप्पी से निकला ज्ञान था।
अब दादाजी पहले जैसे ही थे— सोच गहरी,
टिप्पणी तीखी, लेखन दमदार। बस एक फर्क था—
अब लेखन के बीच खाँसी नहीं आती थी।
अब जब हम बात करते, तो मैं पूछता— “सर, सिगरेट?” वो मुस्कुरा कर कहते— “अब वो मेरे पाठ्यक्रम में नहीं है।” और यही तो इस पूरी कहानी का सार है— हम जीवन भर दूसरों को पाठ पढ़ाते रहते हैं, पर असली परीक्षा घर के आँगन में होती है।
जहाँ कोई डिग्री नहीं पूछता, कोई अनुभव नहीं गिनता— बस यह देखता है कि आप जैसा कहते हैं, वैसा जीते भी हैं या नहीं।
🚬 सिगरेट की सबसे बड़ी हार
फेफड़ों में नहीं होती, वो घर में होती है—
जब बच्चे आपसे उम्मीद करने लगते हैं। और सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि जिस आदत को हम “अपना निजी मामला” कहते हैं, वही आदत हमारे सबसे प्रिय लोगों का
सबसे बड़ा डर बन जाती है। अगर आपने यहाँ तक पढ़कर खुलकर हँसा है— तो बढ़िया।
और अगर हँसते-हँते कहीं चुप हो गए— तो उससे भी बढ़िया। क्योंकि अच्छा व्यंग्य वही होता है जो हँसाकर थोड़ी देर के लिए
सिगरेट से पहले खुद को याद दिला दे।
अंतिम पंक्ति अब सच में अंतिम
सिगरेट छोड़ने के लिए लोहे का इरादा नहीं चाहिए, बस इतना काफ़ी है कि घर में कोई ऐसा हो
जो आपसे ज़्यादा आपकी ज़िंदगी चाहता हो।
अब हँसी के बाद, एक ज़रूरी ठहराव
यहाँ आकर हँसी अपने आप धीमी हो जाती है। इसलिए नहीं कि व्यंग्य कमज़ोर पड़ गया, बल्कि इसलिए कि बात अब मज़ाक की सीमा से जीवन की सीमा को छूने लगती है।
सच यह है कि सिगरेट कोई तात्कालिक शौक नहीं है। यह एक ऐसी आदत है जो धीरे-धीरे शरीर से पहले परिवार की उम्मीदों को खोखला करती है।
जब कोई बच्चा अपने दादा की जेब टटोलता है, तो वह केवल सिगरेट नहीं ढूँढ रहा होता— वह अपने भविष्य की साँसें सुरक्षित करना चाहता है।
जब कोई बुज़ुर्ग खुद को यह कहकर ढाढ़स बंधाता है कि “अब छोड़ने से क्या होगा”, तो असल में वह अपने अनुभव को ही अपने ख़िलाफ़ गवाही बना रहा होता है।
सिगरेट का सबसे बड़ा नुकसान
यह नहीं कि वह फेफड़ों को खराब करती है। सबसे बड़ा नुकसान यह है कि वह आदमी को अपने ही प्रियजनों के सामने कमज़ोर साबित कर देती है।
आज अगर यह लेख आपको हँसाता हुआ यहाँ तक लाया है, तो उसका उद्देश्य पूरा हो चुका है। अब आगे का निर्णय लेख का नहीं,
आपका है। क्योंकि हर सिगरेट जो आप आज नहीं जलाते, वह किसी बच्चे की एक निश्चिंत साँस बन जाती है। और याद रखिए— सिगरेट छोड़ना किसी लत से लड़ना नहीं है, यह उन लोगों से वफ़ादारी निभाना है जो आपको ज़िंदा देखना चाहते हैं। यहीं पर व्यंग्य रुकता है, और ज़िम्मेदारी शुरू होती है।

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  1. केवल कृष्ण पन्गोत्रा

    बहुत बढ़िया लेख एवं व्यंग्य भी। अनिल अनूप जी हार्दिक सराहना के पात्र हैं।
    कोई भी सिगरेट पीने वाले, जिसको पोता-पोतियां सिगरेट पीने से मना करते हैं, को यह लेख उनके ऊपर ‘हमला’ करता हुआ दिखाई देता है
    (केवल कृष्ण पनगोत्रा स्वतंत्र लेखक-पत्रकार जम्मू-कश्मीर)

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