दूसरी ओर धर्म के मंच से ‘सरकार से बड़ा पद’ देने का प्रस्ताव—
क्या यह केवल आशीर्वाद है या भविष्य की भूमिका का संकेत?
सरकार ने जो पद दिया है उससे भी बड़ा कौन सा पद देंगे पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री को शंकराचार्य—यह सवाल इन दिनों उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक, राजनीतिक और धार्मिक बहस के केंद्र में है। बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट पद से इस्तीफा देने वाले पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री और ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बीच हुई फोन बातचीत का वीडियो सामने आने के बाद यह मुद्दा केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं रहा, बल्कि उसने धर्म, सत्ता, असहमति और वैचारिक टकराव के बड़े विमर्श को जन्म दे दिया है।
फोन कॉल जिसने बहस को हवा दी
सोमवार रात हुई यह फोन बातचीत उस समय सार्वजनिक चर्चा में आई, जब इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। वीडियो में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद प्रयागराज के माघ मेले में अपने शिविर से अलंकार अग्निहोत्री से बात करते दिखते हैं। बातचीत के दौरान शंकराचार्य कहते हैं कि सरकार ने जो पद उन्हें दिया था, उससे बड़ा पद वे धर्म के क्षेत्र में देने का प्रस्ताव रखते हैं।
यह वाक्य अपने आप में प्रतीकात्मक भी है और चुनौतीपूर्ण भी। एक संवैधानिक ढांचे में कार्यरत अधिकारी के लिए ‘सरकार से बड़ा पद’ क्या हो सकता है—यही सवाल अब बहस के केंद्र में है।
शंकराचार्य की प्रतिक्रिया: संवेदना और समर्थन
शंकराचार्य ने बातचीत में दोहरी भावना व्यक्त की। उन्होंने कहा कि एक ओर उन्हें दुख है कि अलंकार अग्निहोत्री ने वर्षों की मेहनत से प्राप्त पद एक झटके में छोड़ दिया, वहीं दूसरी ओर उन्होंने इसे सनातन धर्म के प्रति गहरी निष्ठा का उदाहरण बताया। शंकराचार्य के शब्दों में, “आपने जिस प्रकार धर्म के लिए स्टैंड लिया है, उससे समाज आह्लादित है।”
यहीं से यह स्पष्ट होता है कि यह बातचीत केवल व्यक्तिगत सहानुभूति नहीं थी, बल्कि एक वैचारिक समर्थन भी था।
अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा: कारण और पृष्ठभूमि
पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री ने अपने इस्तीफे में सरकार की नीतियों, विशेषकर नए UGC 2026 नियमों, को लेकर गहरे मतभेद जताए हैं। उन्होंने स्वयं को उत्तर प्रदेश सिविल सेवा 2019 बैच का राजपत्रित अधिकारी बताते हुए राज्यपाल को संबोधित पत्र में कहा कि प्रयागराज के माघ मेले के दौरान शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्यों के साथ हुई कथित मारपीट ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया।
इस्तीफे में उन्होंने लिखा कि बटुक ब्राह्मणों को जमीन पर गिराकर, उनकी शिखा पकड़कर घसीटा गया, जो न केवल शारीरिक हिंसा है बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक मर्यादा का भी उल्लंघन है।
‘ब्राह्मण विरोधी सोच’ का आरोप
अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पत्र में यह भी आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में लंबे समय से ब्राह्मण विरोधी अभियान चल रहा है। उन्होंने डिप्टी जेलर द्वारा एक ब्राह्मण कैदी की कथित पिटाई और मृत्यु का उल्लेख करते हुए कहा कि ये घटनाएं किसी एक प्रशासनिक भूल का परिणाम नहीं, बल्कि एक गहरी वैचारिक समस्या की ओर संकेत करती हैं।
उन्होंने स्पष्ट लिखा कि प्रयागराज की घटना ने एक साधारण ब्राह्मण की आत्मा को कंपा दिया है और ऐसे प्रकरण इस सरकार में होना चिंताजनक है।
‘सरकार से बड़ा पद’—अर्थ और संकेत
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि शंकराचार्य द्वारा प्रस्तावित ‘सरकार से बड़ा पद’ आखिर क्या है? क्या यह कोई औपचारिक धार्मिक पद है, या केवल नैतिक-सांस्कृतिक भूमिका का संकेत?
विशेषज्ञों का मानना है कि सनातन परंपरा में पद केवल प्रशासनिक नहीं होते, बल्कि प्रभाव, आचार और वैचारिक नेतृत्व से तय होते हैं। ऐसे में यह प्रस्ताव किसी संवैधानिक पद का विकल्प नहीं, बल्कि एक वैचारिक मंच प्रदान करने की पेशकश भी हो सकता है।
प्रशासन बनाम आस्था: बढ़ता टकराव
यह मामला उस व्यापक बहस को भी जन्म देता है, जिसमें प्रशासनिक दायित्व और व्यक्तिगत आस्था के बीच संतुलन का सवाल उठता है। क्या एक अधिकारी अपनी वैचारिक असहमति के चलते पद छोड़ सकता है? और यदि छोड़ता है, तो क्या उसे धार्मिक मंच से राजनीतिक-सामाजिक भूमिका मिलनी चाहिए?
इन सवालों के स्पष्ट उत्तर फिलहाल नहीं हैं, लेकिन इतना तय है कि यह प्रकरण आने वाले समय में और गहराएगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
क्या अलंकार अग्निहोत्री को कोई औपचारिक धार्मिक पद दिया जाएगा?
फिलहाल शंकराचार्य की ओर से किसी औपचारिक पद की घोषणा नहीं की गई है। यह प्रस्ताव अधिकतर वैचारिक और नैतिक समर्थन के रूप में देखा जा रहा है।
क्या यह मामला राजनीति को प्रभावित करेगा?
प्रशासन, धर्म और राजनीति के संगम के कारण इस मुद्दे के राजनीतिक असर से इनकार नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब यह चुनावी माहौल से जुड़ता है।
UGC 2026 नियमों से उनका विरोध किस स्तर का है?
अलंकार अग्निहोत्री ने इन नियमों को सामाजिक संतुलन के खिलाफ बताते हुए गंभीर आपत्ति जताई है, हालांकि सरकार की ओर से इस पर अभी विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं आई है।
सरकार ने जो पद दिया है उससे भी बड़ा कौन सा पद देंगे पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री को शंकराचार्य—इस प्रश्न का उत्तर फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि यह मामला केवल एक अधिकारी के इस्तीफे तक सीमित नहीं, बल्कि यह सत्ता, धर्म और असहमति के बीच उभरते नए समीकरणों का संकेत है।







