चित्रकूट की गौशालाओं में कागज़ों पर चारा भरपूर दिख रहा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में गौवंश भूख और उपेक्षा का शिकार हैं—फर्जी बिलों के सहारे करोड़ों के खेल की आशंका।
चित्रकूट जिले की गौशालाओं में फर्जी बिल और ‘कागजी चारा’ घोटाले का मामला तेजी से सुर्खियों में है, जहां सप्लायर, ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों और अधिकारियों की कथित मिलीभगत से बिना आहार आपूर्ति के ही लाखों रुपये के भुगतान किए जा रहे हैं, जबकि गौवंशों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा है, जिससे यह पूरा मामला सरकारी धन के दुरुपयोग और पशु संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
चित्रकूट जनपद में गौशालाओं के संचालन को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आ रही है। सरकार जहां गौवंशों के संरक्षण और भरण-पोषण के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं जमीनी स्तर पर यह व्यवस्था कागज़ी खेल बनकर रह गई है। सदर ब्लॉक कर्वी और मानिकपुर ब्लॉक की कई ग्राम पंचायतों में सप्लाई के नाम पर फर्जी बिलों का जाल बिछाकर सरकारी धन की बंदरबांट किए जाने के आरोप तेज हो गए हैं।
📄 कागज़ों में चारा, हकीकत में खाली नांद
ग्राम पंचायतों में भूसा, पशु आहार, साइलेज, गुड़, खारी और नमक जैसे जरूरी संसाधनों की आपूर्ति के कागज़ी रिकॉर्ड तो भरपूर हैं, लेकिन गौशालाओं में मौजूद पशुओं की हालत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि नांद खाली हैं और गौवंशों को पर्याप्त आहार नहीं मिल पा रहा।
🏢 सप्लायर फर्मों पर गंभीर आरोप
गुलजार इंटर प्राइजेज और सुमित्रा इंटर प्राइजेज बराह माफ़ी जैसे नाम इन दिनों चर्चा में हैं। आरोप है कि इन फर्मों द्वारा बिना वास्तविक सप्लाई किए ही फर्जी बिल और वाउचर के जरिए लाखों रुपये का भुगतान लिया जा रहा है। जांच में यह भी सामने आया कि कई फर्मों के पास खुद कोई भौतिक स्टॉक मौजूद नहीं है, फिर भी वे बड़े पैमाने पर सप्लाई दिखा रही हैं।
🤝 मिलीभगत का खेल: प्रधान, सचिव और अधिकारी सवालों के घेरे में
इस पूरे मामले में ग्राम प्रधान, पंचायत सचिव और पशु चिकित्सा अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आरोप है कि इनकी मिलीभगत से बिना सामग्री दिए ही भुगतान पास कराए जा रहे हैं। खंड विकास अधिकारी स्तर तक इस नेटवर्क की पहुंच होने की चर्चा है, जिससे मामला और गंभीर हो जाता है।
🚜 दोपहिया वाहन से भूसा सप्लाई? हैरान करने वाला खुलासा
रामनगर ब्लॉक से एक और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां आशावर माता ट्रेडर्स के नाम पर भूसे की सप्लाई दिखाई गई, लेकिन बिल में दोपहिया वाहन का नंबर दर्ज है। सवाल यह उठता है कि क्या बाइक से भूसे की ढुलाई संभव है? यह तथ्य ही पूरे सिस्टम की पोल खोलने के लिए काफी है।
🏚️ गौशालाओं में बदहाल हालात
सरकार की ओर से मिलने वाली धनराशि के बावजूद गौशालाओं में गौवंशों की स्थिति दयनीय बताई जा रही है। कई जगहों पर पशु कमजोर और बीमार नजर आ रहे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि कागज़ों पर हो रही व्यवस्थाएं जमीन पर लागू नहीं हो रही हैं।
💰 फर्जी बिलों के सहारे सरकारी धन की निकासी
सूत्रों के अनुसार, फर्जी बिल और वाउचर के जरिए लाखों रुपये का भुगतान किया जा रहा है। सप्लायर, अधिकारी और पंचायत स्तर के लोगों के बीच कथित कमीशनखोरी की भी चर्चा है। यह पूरा तंत्र सरकारी योजनाओं को कमजोर कर रहा है।
⚖️ प्रशासन की भूमिका पर उठते सवाल
जब इतने बड़े स्तर पर अनियमितताएं सामने आ रही हैं, तो प्रशासन की निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या यह सब अधिकारियों की जानकारी में हो रहा है या फिर यह सब उनकी अनदेखी का परिणाम है—यह जांच का विषय है।
📢 जांच और कार्रवाई की मांग तेज
स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं की गई, तो यह घोटाला और बड़ा रूप ले सकता है।

❓ FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)
क्या वास्तव में गौशालाओं में चारा नहीं पहुंच रहा?
स्थानीय स्तर पर कई जगहों से शिकायतें मिली हैं कि चारा कागज़ों में दिखाया जा रहा है, लेकिन वास्तविक आपूर्ति नहीं हो रही।
किन-किन लोगों पर आरोप लग रहे हैं?
सप्लायर फर्म, ग्राम प्रधान, पंचायत सचिव और कुछ अधिकारी इस मामले में संदेह के घेरे में हैं।
क्या इस मामले की जांच शुरू हुई है?
स्थानीय स्तर पर शिकायतें बढ़ने के बाद जांच की मांग की जा रही है, लेकिन आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है।
इसका असर किस पर पड़ रहा है?
सबसे अधिक असर गौवंशों पर पड़ रहा है, जिन्हें पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा है।


